Friday, 29 December 2017

आश्चर्य का टुकड़ा

जीवन के आश्चर्य इतने सूक्ष्म है कि अगर रोज़मर्रा की जिंदगी में ज़रा सा रुका कर इनपर गौर ना करें तो वो गायब हो जाएँ। ये सारे आश्चर्य हमारे आसपास ही रह रह कर पनपते रहते हैं।

कल रात बांद्रा में शो था| अक्सर शो के बाद घर लौटते हुए लेट हो जाता हूँ| घर पहुँचते पहुँचते बारह बज जाना अब एक आम बात हो गई है| आज कल निधि (मेरी छोटी बहन) भी पूना गई हुई है तो वापस लौटने पर घर पर कोई नहीं था| दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोल कर घुसना पड़ा| आज अपने कमरे में पहुँचते ही ट्यूबलाइट जलाई और फिर तीन सेकंड के अंदर झट कर के बंद कर दी| अभी कमरे में बाहर से आने वाली हल्की हल्की रोशनी मुझे ठीक लग रही थी| मेरे कमरे में एक बड़ी सी खिड़की है जो स्लाइड कर के खुलती है। अगर परदों को किनारे कर दिया जाए तो आस पास की बिल्डिंगों से इतनी रोशनी कमरे में जाती है कि किताब पढ़ना छोड़ कर बाकी  के काम किए जा सकते हैं। मैंने ट्यूबलाइट बंद कर दी।

थोड़ी देर में हाथ मुँह धोने के बाद मैं अपने बिस्तर पर पीठ को तकिये से टेक लगा कर बैठ गया...बाहर की तरफ़ झाँकता हुआ| मेरी खिड़की पर सफ़ेद पर्दा हल्का हल्का हिल रहा था| इसके हिलने के साथ ही थोड़ी और रोशनी कमरे के अन्दर आती हुई मेरे पैरों पर पड़ रही थी| आस पास सब शांत था। धीरे धीरे पूरे दिन की थकान को आराम मिलने लगा और जो ख़याल पूरे दिन इधर उधर  भागते रहते हैं अपनी जगह बनाने लगे।

ऐसे ही ख़यालों के जगह बनाने के क्षण में अचानक मुझे 'आश्चर्य' दिखा| हाँ आश्चर्य... मेरी खिड़की पर लटकता हुआ सफ़ेद पर्दा| हाँ वो आश्चर्य है। उसको देखकर मैं थोड़ी देर उसे ही देखता रहा और एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर फैल गई| यह आश्चर्य ही था| मैंने फिर नज़र घुमा कर पूरे कमरे को देखा... वाह! कमाल है'आश्चर्य पूरे कमरे में बिख़रा हुआ है...' मैंने ख़ुद से बात की और ख़ुद से ही स्वीकृति भी दे दी। 

यह आश्चर्य इसलिए था कि मुझे पता भी नहीं चला और मैं अपनी उस दुनिया के अन्दर था जिसकी मैंने कभी कल्पना मात्र की थी। दरअसल बात ऐसी है कि १०१३- २०१५ तक बैंगलोर में अपने एक दोस्त और बहन के साथ एक छोटे से घर में रहते हुए जब मैं एक बार नींद से उठा तो अचानक अपने सामने बड़े सामान का ढेर पाया| घर भरा हुआ था। दो (दरअसल डेढ़) छोटे छोटे कमरों में घर के तीन लोगों का कम सामान भी बहुत ज़्यादा लगता था। ऐसा लगता था कि मेरे ख़याल उन सामानों से टकराकर कमरे की फ़र्श पर गिर रहे हो। उनके लिए घर में जगह ही नहीं थी ऐसा लगता था। मुझे याद है, ऐसा ख़याल आने के बाद ही मैंने दो पन्नों पर इसके बारे में लिखा भी था और लिखते हुए सोचा था कि कभी शायद मेरा एक कमरा होगा जो एकदम ख़ाली होगा। उसमें मेरे ख़याल किसी चीज़ से टकराकर गिरेंगे नहीं। मैं उसकी दीवारें सफ़ेद रखूँगा, कमरे में सामान एकदम कम होगा, एक लम्बी खिड़की होगी दीवार के साइज़ की जिसको स्लाइड कर के खोला जा सकता होगा (मैं कभी रात में बैठ कर उसपर चाय पियूँगा), और खिड़की पर जो परदे होंगे वो भी सफ़ेद होंगे। गुलज़ार साब भी शायद इसीलिए हमेशा सफ़ेद पजामे-कुर्ते में दिखते हैं शायद। उन्हें भी ऐसा लगता होगा शायद... पर ये सब कब और कैसे होगा इसका मुझे बिल्कुल पता नहीं था। बस बैठे बैठे सोच लिया था और सोचने में कोई पैसे थोड़े ही लगते हैं। 

पर अभी इस क्षण में जब मैं अपने कमरे में बैठा हूँ मैं वही तो जी रहा हूँ। मैं उस ख़याल की हक़ीक़त में बैठा हुआ हूँ जो कभी यूँ ही सोच लिया था। वो मेरे जीवन में कब का घट  चुका था जिसे मैंने आज देखा है। यह आश्चर्य ही तो है। मैं ख़ुद ही ख़ुद में मुस्कुरा दिया। होंठों के विस्तार ने ख़ुशी का विस्तार किया और कमरे की रोशनी के साथ साथ अंदर भी एक रोशनी उतर गई और मन ही मन मैंने कहा कि 'यार 'आश्चर्य' होते तो हैं, पर बड़े सूक्ष्म। जिन्हें रुककर ना देखो तो घट कर निकल जाते हैं। यह सोचते हुए मैंने खिड़की का सफ़ेद पर्दा पूरी तरह से एक तरफ़ किया, खिड़की को स्लाइड किया, कमरे के अंदर हल्की ठंडी हवा और आने लगी... कुछ सेकेंड वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं किचन की तरफ़ बढ़  गया, चाय बनाने। अपने आश्चर्य के दूसरे हिस्से को थोड़ा और जीने...

Thursday, 28 December 2017

Bombay Times के साथ बातचीत। English

समीर (मेरी पहली फ़िल्म) को लेकर बॉम्बे टाइम्स से एक बातचीत हुई। वैसे तो ये नया सा है पर अपनी तहरफ से सब सवालों के जितने ईमानदार जवाब हो सकते थे देने की कोशिश करी है। कुछ ऊपर नीचे हो गया हो तो उसके लिए माफ़ी। बाक़ी जो जो सवाल या उनके जवाब हैं वो लिंक में हैं। पढ़िए और अपने विचार साझा करिए। स्वागत रहेगा। :)



 Click here to read the interview

Wednesday, 4 October 2017

'पहला' कुछ भी हो हमेशा ख़ास रहेगा... पहला होने की वजह से नहीं उंसके लिए किए हुए इंतज़ार की वजह से... दो साल पहले मुंबई आने के बाद का पहला काम था ये. ढेर सारे संकोच, सेल्फ डाउट और सीनियर्स के भरोसे के साथ इस फ़िल्म पर काम किया था. आज जब नदी से जाने कितना पानी निकल चुका है और मैं कहीं और खड़ा हूँ, यह फ़िल्म दो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल के बाद सिनेमाघरों में पहुँची है. ज़्यादातर प्रतिक्रियाएं सकारात्मक हैं. 

वैसे तो अपना लिखा ही अब ठीक से याद नहीं पर सीमा बिस्वास, पीयूष मिश्रा, स्वानंद (दादा) किरकिरे और ज़ीशान के साथ एक ही पोस्टर पर ख़ुद का नाम एक साथ देखना एक अनुभव है जो कल्पना और यथार्थ को धुंधला कर जाता है. इस वक़्त पीछे पलट कर देखने का एक सुख है सरसरा सा... और आगे और बेहतर काम करने की चाह. आगे आने वाले काम इससे बेहतर हो सकते हैं पर पहला...पहला तो यही है. 😊
सबका शुक्रिया. 



Monday, 31 July 2017

मेरे प्रिय लेखक.

तुम मेरे प्रिय लेखक हो। मुझे लगता था मैं ये तुमसे कभी नहीं कहूँगा क्योंकि हमारे यहाँ ज़िंदा लोगों को सम्मान देने की परंपरा थोड़ी कम है। यहाँ एक लेखक को सम्मान पाने के लिए सबसे पहले मरना पड़ता है या ग़रीब होना पड़ता है...तुम इन दोनों में कहीं खड़े नहीं दिखते। खैर मैं उस तरफ ना जाते हुए बात को तुम तक ही रखता हूँ। जब से तुम्हे पढ़ना शुरू किया मेरे लिए साहित्य का एक नया दरवाज़ा खुला...दरवाज़ा नहीं एक खिड़की, मेरे अंदर की खिड़की। तुम्हारा लिखा पढ़कर ऐसा लगता जैसे ये मेरी ही बात है। मैं हर रोज़ किसी रिचुअल की तरह तुम्हे पढ़ने लगा...इतना पढ़ा कि मेरी लिखावट में तुम दिखने लगे। लोगों ने कहा कि मेरा लेखन बेहतर हुआ है। कुछ वक्त तक यह बात अच्छी लगती पर धीरे धीरे मैं इससे बोर हो गया। लोग मेरे लिखे कि तारीफ़ करते तो मुझे लगता कि ये तो तुम्हारी तारीफ़ हो रही है। हाँ मुझे तारीफ़ पसंद है।
फिर बीच में एक वक्त ऐसा भी आया कि मैं तुम्हारी सोशल मीडिया प्रोफाइल को देखकर तुम्हे जज करने लगा। इसकी वजह यह रही होगी कि वो आदमी मुझे उस आदमी से बिल्कुल अलग लगा जिसका लिखा पढ़कर मुझे यह समझ नहीं आता था कि मैं भर गया हूँ या ख़ाली हो गया। मैंने तुम्हे अनफॉलो कर दिया।
इस बीच मैंने काफी कुछ नया पढ़ा, देखा,सीखा और लिखा। मेरी ज़िंदगी भी एक दौर से गुज़रते हुए एक दूसरे पड़ाव की तरफ़ बढ़ रही थी। तुम भी मेरे लिए अलग आदमी थे। तुम तक ना लौटने की सारी वजहें मेरे पास थीं। मैं अपनी सोच के दायरे से तुम्हे अभी भी जज कर रहा था...भयंकर।
पर एक दिन जब ठीक ठीक पता नहीं कि मैं खाली पड़ा था या बहुत भरा हुआ था, मेरे अंदर तुम्हारे लेखन तक पहुँचने की तलब उठी। मैंने तुम्हे फिर से पढ़ा और इसबार... इसबार भी तुमने मुझे चमत्कृत किया। मैंने इसबार तुम्हे कुछ और करीब से समझा। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे खुद से बात हो गई हो...
जानते हो अब जब भी तुम्हारी कोई तस्वीर देखता हूँ या तुम्हारा लिखा हुआ पड़ता हूँ...उसके पीछे झांक कर देख पाता हूँ। जिस बात के लिए ये सोचता था कि 'भक, ये ऐसे कैसे?' अब लगता है कि 'हाँ ये बिल्कुल हो सकता है...यही तो है।' मैं खुश हूँ... तुम्हारे ज़रिए मैं शायद अपने होने वाले कल से मिलता हूँ। मैं किसी घर की तरह तुम्हारे लिखे तक वापस आता हूँ।
लगता है अब तुम्हे थोड़ा समझने लगा हूँ। क्योंकि मेरी ज़िंदगी भी थोड़ी आगे तो बढ़ी ही है।
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Tuesday, 6 June 2017

फिर से...

दो दिन पहले अचानक बैठे बैठे एक तस्वीर दिखाई दे गई. ये तस्वीर मेरे टुकड़ों में लिखे हुए, लिख कर छोड़े हुए और रह रह कर जिए हुए के नोट्स से बनी थी. एक एहसास सा था कि वो सब जो मैंने टुकड़ों में जिया है किसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है. यह सब मुझे नाटक लग रहा था. मेरा सारा लिखा हुआ जो किसी नाम या चेहरे के तहत अपनी पहचान नहीं पा सकता, उसे नाटक में अपना घर दिखना शुरू हुआ. मैंने नाटक लिखने का सोचा.

मैंने बंगलोर में रहते हुए भी कुछ नाटक लिखे थे. यह छोटे छोटे तिनके जोड़कर एक घोसला बनाने जैसा है. कहाँ कब कैसे क्या काम आ जाए कहा नहीं जा सकता. इस नाटक का आईडिया  मैं शानी को पिछले शुक्रवार एक बार में बताया था. उसे यह बहुत पसंद आया. उसने कहा कि यह तो पूरी फिल्म का आईडिया है और काफी अच्छा है, काम कर इसपर. इससे मेरी हिम्मत बढ़ी पर मैं इसे अभी फिल्म की तरह नहीं लिखूंगा. मैं इसे नाटक की तरह ही लिख रहा हूँ, इसमें मेरे पास एक ऐसा स्पेस है जहाँ मैं अपने एक्सपेरिमेंट कर सकता हूँ. मुझे इसे बनाने के लिए किसी प्रोडूसर के ऊपर आश्रित होने की ज़रुरत नहीं है.

किसी भी नए काम को करने और उसके होने के बीच की जो दूरी है वो कुछ ऐसी होती है जिसे शायद मैं ठीक से बयान ना कर पाऊं. खुद से इतने सारे सवाल और इतने सारे संदेह खुद पर कि लगता है जो मैंने कहना शुरू किया था क्या वह ठीक उसी इमानदारी से कह पाऊंगा?  क्या जो मैं कह रहा हूँ जब लोगों के सामने लेकर जाऊँगा तो उन्हें वही समझ आएगा जो मैं कहना चाहता था...? ऐसे ही बहुत सारे सवाल हर बार मेरे पास आते हैं. इस रास्ते में मैं अपने ही अन्दर बैठे हुए उन कई सारे व्यक्तियों से मिलता हूँ जो अक्सर मुझे ऐसे नहीं दीखते. इनको मैंने काम पर रखा है क्या? मैं कई बार इनसे बात करते हुए डरता भी हूँ कि पता नहीं क्या कैसा बोल दें... लिखने लगूं तो क्या लिखवा दें? इसलिए इनपर संदेह है पर मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि इनसे मिलना भी एक रोमांचक अनुभव है. 

लगभग ढाई साल बाद फिर से किसी नाटक को लेकर बैठा हूँ. इन ढाई सालों में मैं एक इंसान और लेखक के तौर पर अपने अन्दर आये हुए बदलावों को देख पा रहा हूँ. एक एक परत उतार कर देखने जैसा है ये. हाँ, इसका एक  पहलू यह भी है कि इसे लिखते हुए कई बार मुझे ये लगा कि मैं इसे अपने पसंदीदा लेखकों के जूते पहन कर लिख रहा हूँ. ये जूते मेरे पैरों के आकार से थोड़े बड़े हैं. थोडा अपना है तो थोडा माँगा हुआ का एहसास है. किसी नए रिश्ते की शुरुवात सा एक अटपटापन भी है, जो वक़्त के साथ साथ अपना हिस्सा बन जाएगा. पर सब अपनी शुरुवात ऐसे ही करते हैं शायद और शायद यही एक रास्ता भी है कि जो रास्ता पता है उसपर चलते जाओ और जब चलना आ जाए तो अपने जूते पहनकर अपने रास्ते पर निकल पड़ो.

इस पोस्ट को लिखने का बस ये ही एक मकसद था कि अपने नाटक कि शुरुवात को चिन्हित कर सकूं. नाटक पूरा कर के फिर से मिलूंगा और बात करूंगा कि यह सफ़र कैसा रहा. 

Monday, 8 May 2017

बिखरे पन्नों से भाग-4

मैं एक भूकंप से निकल रहा हूँ, जिंदा हूँ पर दबा हुआ वहीँ कहीं. मैं ये सब बोल कर किसी को बता सकता हूँ, बाँट सकता हूँ. उससे राहत तो मिलती है पर उस ढहे हुए घर के मलबे में मेरे गुज़ारे हुए वक़्त का कुछ सामान अभी भी आँखों के सामने दीखता है. ये वो घर था जो मैंने जीवन की एक छोटी सी ख़ाली जगह में बनाया था. वो अचानक भरभरा कर गिर गया. जब दोस्तों से हर रात घंटों इस बारे में बातें हो जाती है तो मुझे हल्का लगता है, उस हल्केपन में नींद आ जाती है. पर उस ख़ाली जगह का एहसास मेरी नींद में अभी भी कायम है. मैं आजकल अपने सपनों में घूमता रहता हूँ. ऐसी ऐसी जगहें चला जाता हूँ जहाँ पहले कभी नहीं गया और शायद असल जिंदगी में वो जगहें होंगी भी नहीं. पर मुझे वहां अपने जाने पहचाने लोग ही मिलते हैं. सारे दोस्त, रिश्तेदार... उनसे मैं वैसे ही पेश आता हूँ जैसे असल जिंदगी में. यह सब लोग वहाँ क्या कर रहे हैं? मैं वहाँ क्या कर रहा हूँ? इन सारे मिलने वाले लोगों के बीच आज कल एक आदमी भी मिलता है, जिसे मैं मेरे सपनों में मिलने वाला आदमी कहता हूँ. उसकी कद काठी सुडौल है, उम्र कोई पैतालीस के आस पास, उसने पूरी दाढ़ी रखी हुई है. उसका लम्बा कोट और चेहरे का रौब देखकर वो किसी फ़ौज का रिटायर्ड आदमी लगता है पर वो फ़ौज का नहीं है मैं उसे जानता हूँ. वो मेरे ठीक सामने आ कर खड़ा हो जाता है. मैं उसके पास अपने भूकंप की कहानी बताने जाता हूँ,बताते बताते हल्का रोता हुआ... नहीं रोता नहीं, रुआंसा होता हूँ. मैंने उससे कुछ तीन या चार लाइन ही बोल पता हूँ कि वो मुझे रोक देता है. कहंता है “चुप हो जा मैं तेरी कहानी जानता हूँ” और यह बोल कर वो मुझे चुप करा देता है, मैं उसे चुपचाप थोड़ी देर के लिए देखता रहता हूँ. उसके कोट की गर्मी से मुझे थोड़ी राहत मिलती है. मैं उसके सामने रोना चाहता हूँ तभी वो सपने वाला दृश्य बदल जाता है. इस बदले हुए दृश्य में कुछ भी पहले जैसा नहीं है. मैं भी थोड़ी देर रुककर कुछ और करने लगता हूँ.


पर यह सपने में मिलने वाला आदमी कौन है? यह ख्याल थोड़ी देर साथ रहकर अचानक गायब हो जाता है. यह जान कर कहीं ना कहीं अच्छा लगता है कि वो मुझे समझता है. जानता है मुझे भी और उस ख़ाली जगह को जो धीरे धीरे कर के एक घर में तब्दील हो गई थी. वो उस भूकंप को भी जानता है जो हर बार मेरे ख़ाली जगह पर बनाए हुए घर को ढाह कर चला जाता है. 

Friday, 7 April 2017

बिखरे पन्नों से भाग-३

बड़े दिनों से ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा. वजह यह नहीं थी कि लिखने को कुछ था नहीं, बल्कि  मैं इतना कुछ जिए जा रहा था कि ढंग से बैठ कर उन सारे अनुभवों को लिख पाना मुमकिन नहीं हो पाया.
पिछले कुछ महीनों से जीवन उलझा हुआ था. अब वहां से निकल इसने अपनी रफ़्तार फिर से पकड़ी है. जीवन के उलझे वक़्त ने हमेशा एक गहरे एहसास को किसी अखबार की तरह खोल कर मेरे सामने रख दिया है. इस बार यह एहसास है भीड़ से डर का. भीड़ डरा देती है मुझे. क्योंकि भीड़ सारी एक जैसी होती है चाहे वो गली चौराहे की हो, किसी एक कमरे की हो या फिर सोशल मीडिया की हो. मेरे लिए भीड़ अब बस भीड़ है. भीड़ मेरे कान में अपना मुंह डाले खड़ी है.

मेरे कई दोस्तों ने जीवन के अलग अलग पड़ावों पर मुझे मेरी वैचारिकता की पहचान बताई है, जिसके बारे में मुझे खुद नहीं पता था. 'नीरज देखो तुम ऐसा सोचते हो तो इसका मतलब है तुम ये होऔर मैंने भी अक्सर हाँ में सर हिला दिया. मेरे पास उस वक़्त उनकी बात ना मानने की कोई वजह नहीं थी और उसे अपनी पहचान का हिस्सा मान हमेशा ही संजोने की कोशिश की. मैं जब भी किसी समूह का हिस्सा बना हूँ बड़े प्यार से उसने मुझे अपनाया है. पर वक़्त के कुछ गुजरने के बाद मुझे एहसास होता है कि यहाँ जिस वैचारिकता का वादा था वो तो ये है ही नहीं. शायद मैं वो नहीं हूँ जो मेरे सामने घटता हुआ मुझे दीखता है. धीरे धीरे, परत दर परत जब वही बातें बार बार होने लगती हैं , घिस कर वो मुझे वो शोर लगती हैं. अपने मायने खो बस किसी रिकॉर्ड की तरह बजती हुई.

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि उन बातों का कोई मतलब नहीं है या वो व्यर्थ हैं, यह बस इतना है कि वो मेरी बात नहीं है. मैं या तो उसे पूरी तरह से समझ नहीं पाता या कुछ और है जो मैं समझता हूँ. यह समूहों का तालाब जिसे मैं गहरा मान कर उतरता हूँ वो बस मेरे पाँव ही भिगा पाता है. मेरे शरीर का एक बड़ा हिस्सा अभी भी वैसा ही सूखा है. "मैं यह तो नहीं" का एक मुरझाया सा विचार मुझतक आता है और असहज कर जाता है. मैं सहज होने की कोशिश करता हुआ और असहज होता जाता हूँ. मैं ऐसी जगह बहूत देर तक नहीं रह पाता. मुझे डर लगता है कि मैं बस अगले ही क्षण कुछ ऐसा बोल दूंगा कि सामने वाले लोग बिदक जाएंगे. क्योंकि उनको मुझसे कुछ उम्मीदें हैं कि इसे ऐसी नहीं ऐसी बात करनी चाहिए. पर शायद नहीं... मैं वो हूँ ही नहीं जो वो मुझे अब तक समझ रहे थे या जो मैं खुद को समझ रहा था. मुझे खुद नहीं पता मैं क्या हूँ.


हाँ, इतना जनता हूँ कि मैं अपने संबंधों में बहुत डरपोक आदमी हूँ. मैं जब भी किसी कनफ्लिक्ट में पड़ता हूँ, बहस करता हूँ तो एक लड़ाई मेरे अन्दर भी तन जाती है, जो सामने सबकुछ ख़त्म होने के बाद भी बहुत देर तक चलती रहती है. मुझमें जिरह या बहस करने की ऊर्जा नहीं है. मुझे यह ख्याल ही अब किसी जोंक के खून चूसने सा लगता है. मैं अपनी ऊर्जा किसी कंस्ट्रक्टिव चीज़ के लिए बचा कर रखना चाहता हूँ. यह बस अपनी जगह बचने जैसा है. जिसके लिए ज़रूरी है एक समूह का हिस्सा बनकर उसमें रहते हुए भी ना रहना. अब अगर सामने वाला जब पूरी बात सुने या समझे कुछ भी बोलता है तो बस हंस कर रह जाता हूँ. मेरी हंसी बस एक अल्पविराम है जिसे लगा कर मैं उस कहानी को आगे बढ़ा देता हूँ.क्योंकि अभी मैं अपने जीवन को किसी क्रांति की तरह नहीं बल्कि किसी गीत की तरह जीना चाहता हूँ.

Tuesday, 7 February 2017

बिखरे पन्नों से: भाग २

कई दिनों का सोया वो फिर से जाग गया जैसे अधकची नींद में था. झट कर के ऐसे उसने अपनी उपस्थिति दर्ज की जैसे वो कभी सोया था ही नहीं. वो एक घाव सा था, जिसे फिर से छेड़ दिया गया हो... बहता हुआ घाव, बज्ज कर के फूटता हुआ... जैसे एक लकीर सा खून फूटता हुआ बह पड़ता है, बिल्कुल वैसे. उसने उसे छूकर देखने की कोशिश की पर छू नहीं सका, वो उसकी नज़रों से गायब हो चुका था पर उसकी टीस अभी भी वैसे ही मौजूद थी.

उसने उसके आसपास दीवारें बांध रखीं हैं... उन्हीं का एक ईंट निकल आया हो जैसे और कोई शीतलहर अन्दर तक अपने पूरे दबाव के साथ घुस रही हो, सायं सायं करते और शरीर छेद कर हड्डियों तक पहुँच रही हो. उसमे कट-कटाते दांत जोर से भींच लिए थे. वो खड़ा था वहीँ और इंतज़ार कर रहा था इसके गुज़र जाने का... पर कब तक.

हैरानी की बात यह थी कि इसे हुए, घटे, गुज़रे एक वक़्त होने को है, पर अभी अभी यह अचानक ऐसे कौंध गया जैसे अभी भी वहीँ कहीं छिपा हो. इस कौंधने वाली टीस से उसे हिला कर रख दिया था. उसने टीस के चेहरे पर गौर से देखा जैसे उसका सच देखने की कोशिश करता हो... वह सोचने लगा “मुझे सच्चाई कुछ और दिखती है. जानता हूँ वो वैसा नहीं जैसा दिखता है, या फिर वो वैसा ही है जैसा दिखता है...पर मैं ही उसे वैसा नहीं देख पाता? मैं अपनी कल्पना में ही रहता हूँ क्या? क्या मैं हमेशा अपनी कल्पना में ही था? क्या कल्पना और सच में भेद नहीं कर पाता? क्या हम सच और कल्पना को किसी सूप में फटककर अलग अलग नहीं कर सकते? कि ये रही कल्पना और ये रहा सच. जीवन कितना सरल हो जाता...पर शायद नहीं, पता नहीं ”

अब हर बार उसे देखते हुए जब सच दिखता है तो वो अपनी कल्पना की एक लकड़ी तोड़कर व्यावहारिकता की आग में डाल देता है, हर बार... बार बार... वो धूं धूं कर के जल उठती हैं. ये वो लकड़ियाँ हैं जिनसे वो अपना घर बना सकता था. जिन्हें उसने एक सुखद भविष्य की कल्पना करते हुए इक्कठा किया था. अब जलते हुए इनके पोरों के जलने पर चट्ट चट्ट की आवाज़ आती है. उनकी जलने की चट्ट की आवाज़ उसके अन्दर भी टूटती है. उस लकड़ी के जल जाने के बाद भी देर तक इनका धुँआ दूर ऊँचाई तक उठता दिखता है. उसके धुएँ में गुज़रे वक़्त की ख़ुशबू है, जो इसे बार बार जगाती है. वो कब ख़त्म होगा? शायद आखिरी लकड़ी के टूटकर पूरी तरह जलने तक. उस आखिरी लकड़ी के जलने में भी जाने कितनी चट्ट चट्ट की आवाज़ें और जाने कितना धुँआ शामिल होगा, वो सब उसे वहीँ खड़े रहकर सुनना होगा, देखना होगा और जीना होगा. पर अभी...  उसे भी पता नहीं ऐसी कितनी लकड़ियाँ अभी भी उसके पास जिंदा बाकी पड़ी हैं...