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Tuesday, 15 May 2018

राज़ी: लगा दे दाँव पर दिल.


पसंद आयी फ़िल्मों की ख़ास बात यह होती है कि उनका एक टुकड़ा फ़िल्म के ख़त्म होने के बाद भी साथ चलता रहता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। वैसे तो जैसा कहते हैं कि ‘कलेजा मूँह में आ गया’ वैसी फ़ीलिंग तो राज़ी देखते हुए कई सीन में हुई पर एक सीन ऐसा था जो अभी तक साथ चल रहा है। वह सीन जहाँ इक़बाल और सेहमत दोनों आमने सामने एक दूसरे का सच जानने के बाद मिलते हैं। दोनों एक दूसरे से प्यार तो करते हैं पर दोनों की नज़र में ही वतन पहले आता है। यहाँ विकी का किरदार इक़बाल सेहमत से पूछता है कि “क्या अब तक जो हमारे बीच था उसमें कुछ भी सच था?” यह किसी भी इंसान के होने पर सवाल है। उसकी मान्यताओं पर सवाल है। उसके जीए हुए पर सवाल है। हम जो जी लेते हैं हमारी पहचान का हिस्सा होता जाता है। हमारी मान्यताएँ, हमारी बेवक़ूफ़ियाँ, हमारे प्रेम, हमारी नफ़रतें... सबकुछ। फ़र्ज़ करें हमें एक दिन यह पता चले कि जो भी हमने जिया वह सिर्फ़ इसलिए कि कोई ऐसा चाहता था कि हम वैसा ही जिए या महसूस करें जैसा वो चाहता है। क्या वह हमारे होने पर सवाल नहीं है।

मैं एक भारतीय हूँ और देशभक्ति की थोड़ी समझ भी है। बचपन में देशभक्ति गाने सुन कर रोयें खड़े होते आए हैं और स्कूल में बड़े ज़ोरों शोरों के साथ १५ अगस्त और २६ जनवरी की तैयरियाँ करी हैं। पर अब तक जहाँ मुझे फ़िल्म देखते हुए बार बार सेहमत की बेहतरी की चिंता थी कि इसे कुछ ना हो, वह उस सीन में आकर पलट गयी। यहाँ पर आकर मैंने ख़ुद को इक़बाल के साथ खड़ा पाया। दोनों मुल्कों की लड़ाई में खिंची हुई लकीर इक़बाल और सेहमत के बीच खिंच गयी थी। यह लक़ीर जितनी बाहर थी उतनी ही दोनों के अंदर तक उतरती गई। इक़बाल के लिए ज़्यादा बुरा इसलिए भी लगा क्योंकि शायद वो इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। कम से कम सेहमत को अपना मोहरा होने का पता था। इक़बाल ने तो बस भरोसा किया था सेहमत का अपने रिश्ते पर भरोसा कर के।
“क्या अब तक जो उनके बीच था उसमें कुछ भी सच था?” बार बार कानों में गूँजता हुआ अंदर तक उतरता रहा। ऐसे सवाल तो हमने भी कई बार अपनी ज़िंदगी की कहानियों को लेकर किए हैं ना...? एक दौर जी लेने के बाद पीछे पलट कर देखा है और यह सवाल गूंजा है कि “जो जी लिया वो कितना सच था”। कितना मुश्किल होता है यह मान लेना या इस बात का एहसास होना कि हम एक झूठ को सच मान रहे थे। शायद इसी वजह से हमारे पास अलग अलग वक़्त पर हमारे जी जिए हुए सच के अलग अलग संस्करण होते हैं, जिसे हम यह सोचकर तैयार करते हैं कि जो जिया गया वो जीने लायक था। यह हमारी ख़ुद से एक अरेंज्मेंट है। पर इक़बाल को अपनी कहानी के और संस्करण तैयार करने का मौक़ा भी नहीं मिला।


प्यार सेहमत को भी था, यह हमें एक दर्शक के नज़रिए से पता है पर इक़बाल की ज़िंदगी एक सच, झूठ और जाने क्या के बीच लटकती हुई ख़त्म हो जाती है। उसकी कहानी ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होती।

राज़ी दो मुल्कों की कहानी नहीं है। मेरे लिए यह कहानी एक दो ऐसे लोगों के क़रीबी रिश्ते की कहानी है जिसमें राजनीति दख़ल देती है। एक हिंदुस्तानी होने के नाते यह अच्छा लगता है कि पाकिस्तान की हमारे मुल्क पर हमले का मनसूबा कामयाब नहीं होता पर एक इंसान के नाते मैं चाहता था कि काश, इक़बाल और सेहमत के रिश्ते में वो वक़्त ना आया होता जहाँ इक़बाल को यह पूछना पड़ा कि ““क्या अब तक जो हमारे बीच था उसमें कुछ भी सच था?”

Thursday, 28 December 2017

Bombay Times के साथ बातचीत। English

समीर (मेरी पहली फ़िल्म) को लेकर बॉम्बे टाइम्स से एक बातचीत हुई। वैसे तो ये नया सा है पर अपनी तहरफ से सब सवालों के जितने ईमानदार जवाब हो सकते थे देने की कोशिश करी है। कुछ ऊपर नीचे हो गया हो तो उसके लिए माफ़ी। बाक़ी जो जो सवाल या उनके जवाब हैं वो लिंक में हैं। पढ़िए और अपने विचार साझा करिए। स्वागत रहेगा। :)



 Click here to read the interview

Monday, 21 November 2016

एक सोशल एक्सपेरिमेंट

इस बार इस विडियो में दो अजनबी मिलते हैं, पहले एक दूसरे की फेसबुक प्रोफाइल देखते हैं फिर बताते हैं कि उन्हें वो प्रोफाइल देखने के बाद उस व्यक्ति के बारे में क्या लगा. उसके बाद दोनों जब सामने मिलते हैं तो क्या होता है? जानने के लिए विडियो देखिए. इन दोनों में से एक मैं था.


Friday, 30 September 2016

कहानी: लत

हमारा नाम मोहम्मद मोजिद खान है. उमर इस साल अगस्त में सैतालिस हो जाएगी. धंधे से दर्जी हैं. यही एक काम हमको आता है और अब तक यही काम करते हुए ज़िन्दगी कट रही है. जब हमारी उमर कोई पचीस छब्बीस साल की थी तब भी हम इसी दानापुर में ही एक टेलरिंग दुकान में काम किया करते थे. घर से दुकान पहुँचने में पैदल आधा घंटा लगता था. हम घर से सुर्ती रगड़ते निकलते और रास्ता भर रगड़ते. जब दुकान पहुँचते तो मूंह में डाल लिया करते. अब सुर्ती ऐसी चीज़ है ना कि उसको जितना रगडा जाए उतना मज़ा देती है और सुर्ती का नशा वैसे भी कोई नशा नहीं है. ये तो बस एक मनोरंजन है.

तो एक रोज़ ऐसे ही हम अपनी धुन में मस्त सुर्ती रगड़ते दुकान की तरफ चले जा रहे थे. एकाएक एक ठो मारुती गाडी आकर हमारे बगल में रुकी. गाडी के अन्दर कोई बीस साल का लौन्डा बैठा था. उसको देख कर हम भी रुक गए. हमको लगा शायद कोई पता वाता पूछे. पर वो गाडी से निकला और सामने आकर के खड़ा हो गया, बोला “थोडा सुरती हमको भी दो ना यार.” हमको बड़ा वैसा सा लगा कि ये आदमी जिसका कपडा लत्ता एकदम टीपटॉप है, मारुती में चलने वाला... भाई ये हमसे सुर्ती क्यों मांग रहा है. पर हमने उस दिन उसको कुछ कहा नहीं. अपने सुर्ती में से ही एक हिस्सा निकल के उसको दे दिया. वो उसको होठ के नीचे दबाया और निकल लिया. अब उस दिन के बाद तो वो रोज हमको उसी टाइम उसी जगह पर मिलने लगा. रोज मिलता, सुर्ती लेता, कुछ कुछ बात बनाता और चला जाता. कभी कभी हमको दस बीस रूपया देने की भी कोशिश करता, पर हमने हर बार उसको मना कर दिया. उसका पैसा कभी लिया नहीं. हाँ हम हर बार यह ज़रूर सोचते कि भाई ये जितना पैसा हमको दे रहा है, उतना में कितना सुर्ती खरीद ले, लेकिन ये हमसे मांग के क्यों खाता है. पर धीरे धीरे हमको पता चल गया कि किसी किसी का ऐसे मांग कर खाने का ही आदत होता है.

एक दिन जब वो हमको फिर से कुछ रुपया देने लगा, हम फिर से उसको मना कर दिए. तो कहने लगा “ ठीक है पैसा नहीं लोगे तो चलो तुमको जहाँ जाना है वहाँ तक छोड़ दें.” हम मारुती की तरफ देखे. इससे पहले हम कभी मारुती गाडी अन्दर से नहीं देखे थे. तो उसको मना नहीं किए और यही हमसे एक बड़ी गलती हुई. साला वो हमारा दुकान देख लिया. अब रोज़ कभी दुपहरिया तो कभी शाम को आ जाए, और लगे गप्प हाँकने. पर पैसा के मामला में वो आदमी दिलदार था, जब भी आए जवान कुछ ना कुछ खर्च करे. धीरे धीरे उसका और हमारा जमने लगा. वो भी अपने परिवार के बारे में हमको बताया हम भी अपना बीवी बच्चा के बारे में उससे बात करते. तब कुछ साल पहले ही हम बाप बने थे, इक्कीस साल की उमर में. वो दानापुर से ही ग्रेजुएशन किया था. उसके बाबू जी वहीँ कैंट में काम करते थे. खूब पैसा वाला था और यह दिखता भी था. हम उससे एक दिन पूछे कि “भाई बाबूजी का तो ठीक है. पर तुम को क्या करना है जिंदगी में?” ये सुन के वो हमको ध्यान से देखा और एकदम गंभीर हो के बोला “हमको… हमको जिंदगी में मजा लेना है.” और बोल के हँस पड़ा.

हम दोनों का दोस्ती कुछ महीना का हो गया था. अब हम उसके लिए अलग से सुर्ती रगड़ कर उसको देने लगे थे. एक दिन वो हमसे कहने लगा कि “मोजिद भाई, तुमसे हमारा मन लगता है, तुम बाकी लौन्डों की तरह बकचोदी नहीं काटते. एक काम करो हमारे बंगले में आ के रहो. हमारे यहाँ कई सारा कमरा ऐसे ही खाली पड़ा हुआ है.” हमने उसकी बात पर सोचा. उस वक़्त हम किराये के मकान में रहते थे. तो हमें उसकी बात भी ठीक लगी कि भाई वहाँ रहेंगे तो दो पैसा का बचत ही होगा. तो हम उसी हफ्ता में उसके बंगले के एक कमरे में शिफ्ट हो गए. अब उसका और हमारा टाइम ज्यादा साथ में बीतने लगा. रोज़ शाम को अब जब हम अपना दर्जी का काम कर के आते तो उठाना बैठना उसी के साथ होता. रात में खाना खा के हम अपना सुर्ती रगड़ते और वो पीता ‘शराब अंग्रेजी’. एक दिन हमको पीने के लिए [पूछा भी. पहले तो हम उसको मना किए लेकिन ये कह के वो हमको थोडा सा एक गिलास में ढार के दिया कि “आज हमको तुम्हारे सुर्ती का एहसान चुकाने दो भाई.” हम उस दिन पहला बार शराब पिए. ये शराब उसके बाबू जी को कैंट में मिलती थी. हमको थोडा देर बाद एकदम मज़ा आ गया. थोडा कडवा लगा था शुरू में पर थोडा देर बार शरीर एकदम रिलैक्स हो गया. अब जो है, हमको लगने लगा कि साला क्या चीज़ है शराब! हमको एकदम नया दुनिया में लेके गया. उस वक़्त तो एकदम ऐसा लगा जैसे दुनिया जहान का सारा टेंशन साइड लाइन हो गया…

अब हम दोनों का रात में खाने के बाद पीना रोज का धंधा हो गया. कभी कभी दिन में सिर थोडा पकड़ता था लेकिन चाय वाय पीने के बाद ठीक हो जाता था. कुछ टाइम बाद उसने अपने बाबू जी से पैरवी लगा के हमको वहीँ कैंट में टेलरिंग का काम भी दिलवा दिया. बोला कि “जब तुमको टेलरिंग ही करना है तो यहाँ करो यहाँ पैसा भी अच्छा मिलेगा.” पैसा सच में दुकान से अच्छा था. तो अब हम दुकान का नौकरी छोड़ के वहीँ बटालियन का कपडा सीने लगे. फौजी लोग का वर्दी. धीरे धीरे वहाँ काम इतना होने लगा कि हम रात रात भर काम करने लगे. तब भी जो है काम पूरा ना पड़े. काम बढ़ता जाता था टेलर बढ़ते नहीं थे. टेंशन बहुत ज्यादा और अब इस टेंशन में हम शराब पीना और ज्यादा कर दिए. लेकिन कुछ दिनों के बाद हमको लग गया कि इतना काम तो हमसे ना हो पाएगा. फिर एक दिन खीझ के हम वो काम भी छोड़ दिए. उसी रात वो हमारा दोस्त हमको बताया कि उसकी नौकरी मद्रास (जो अब चेन्नई है) में लग गई है. वो कुछ दिन बाद मद्रास चला गया और हम अपना परिवार ले के उसके बंगला से बाहर एक मकान किराया पर ले लिए. फिर से पुराना टेलरिंग दुकान पर काम करने लगे.
लेकिन उसके जाने से एक बात यह खराब हुआ कि अब हमको फ्री का शराब नहीं मिलता. पर आदत हो गई थी पीने की. तो हम अब रोज़ शाम को घर आते हुए शराब का एक छोटा वाला बोतल भट्टी से खरीदने लगे. रास्ते में खोल लेते और घर आते आते ख़तम कर देते. धीरे धीरे शराब का खर्चा चालीस रुपया से बढ़ के नब्बे रुपया हो गया. थोड़े दिन में ही हमको ये बात पता चल गई कि हमारा दो सौ रुपया रोज के कमाई में हम इतना खर्च नहीं कर पाएँगे. लेकिन हमको शराब तो चाहिए था. तो अब हम प्लास्टिक वाला पाउच मारने लगे. लेकिन पाउच कहाँ बराबरी करे अंगरेजी शराब का. उसमे ना तो अंगरेजी वाला मज़ा था ना अंगरेजी वाला नशा. लेकिन क्या करें…? तो अब हम उसका मात्रा बढ़ा दिए. वो मात्रा बढती ही गई और धीरे धीरे खर्चा फिर से उतना ही पहुँच गया.

शुरू शुरू में तो हमारी बीवी समझ जाती थी कि हम पी के आ रहे हैं, लेकिन कुछ कहती नहीं थी. पर अब हमारी हालत ऐसी हो गई कि अब साला रे... हमको सुबह उठते उठते चाहिए. और जब एक बार शुरुआत ही उसी चीज़ से हो गई तो अब दिन भर चाहिए. अब हमारा सुबह, दोपहर, शाम सब एक हो गया.

धीरे धीरे आदत और बिगड़ी. कोई मोहल्ला का आदमी कोई रिश्तेदार, कोई जानकार हमको मना भी करता तो हम उसको गरियाने लगते. हमको लगता ये हमको क्यों बोल रहा है? इसके पैसा का थोड़े पी रहे हैं हम. हम पूरे दिन धुत्त रहते. टेलरिंग का काम भी छूट गया. हम हर शाम को भट्टी पर चले जाते और पीते रहते. उस वक़्त तो ऐसा लगता था कि हमारे नस में खून के जगह दारु बहने लगा है. घर में न बच्चा का ख्याल है ना बीवी का. हर टाइम बस एक ही बात का रट लगा हुआ है कि पीना है... पीना है. जबकि ऐसी बात नहीं है कि हमको पता नहीं चल रहा था कि हमारी ज़िन्दगी किस तरफ जा रही है लेकिन उसके ऊपर हमारा कोई कंट्रोल नहीं था. हम अपना कण्ट्रोल साला दारु के हाथ में दे दिए थे.

घर का हालत बिगड़ता जा रहा था. हम सब देख रहे थे अपने सामने खुद को बर्बाद होते हुए अपना घर बर्बाद होते हुए. इसी हमारे बच्चे का स्कूल में एडमिशन हुआ. स्कूल जिनका था वो जानने वाले थे तो उन्होंने उसका कोई पैसा नहीं लिया. बस बोला कि आप लोग इसके कॉपी किताब और ड्रेस का खर्चा देख लीजिएगा. पर जब हम अपना हिसाब लगाए तो पता चला कि घर में उतना पैसा है ही नहीं. अब हमारे पीने से पैसा बचे तब तो कुछ और काम हो. हमने अपने दोस्त लोग से इस बारे में बात किए, लेकिन वो सब उधार देने से मना कर दिया. दरअसल बात ये थी कि जब कोई बेवडा आदमी पैसा माँगता है तो लोग को लगता है कि बहाना बना रहा है. इसका तो ये शराब पी जाएगा. भले ही उसका सच में कुछ ज़रूरी काम हो. लकिन कोई उसके बात को पर्तियाता नहीं है. धीरे धीरे समाज उसका बहिष्कार करने लग जाता है. तो हमको भी किसी ने उस दिन पैसा नहीं दिया. ये बात हमको कहीं ना कहीं लग गई.

उसी दिन जब हम शाम को भट्टी पर बैठ के पी रहे थे तो हमारे अन्दर से एक आवाज़ आई. अब देखिए, आपको कोई और बताए ना बताए लेकिन आपका अंतर्मन आपको बताता है कि बाबू तुम सही कर रहे हो कि गलत. उस दिन हम खुद सोचे कि हम जो है... कर क्या रहे हैं? अपने आप से सवाल किए और फिर अपना नाम ले के सोचे कि मोहम्मद मोजिद खान, आज जितना पीना है उतना पी लो, और अगर आज के बाद तुम शराब को हाथ भी लगाया तो एक बाप का औलाद नहीं... उस दिन वहीं बैठ के हम खूब पिए. रोज से ज्यादा पिए पर ये सोच के कि आज आखिरी बार पी रहे हैं.

अब क्या है कि अगर कोई और आपको कुछ समझाए तो बात समझ नहीं आती है लेकिन उस दिन हमको ये बात एकबाएके समझ में आ गई थी. अगला दिन से हम शराब को हाथ भी नहीं लगाए. मन तो बहुत करता था कि थोडा पी लेते हैं, पी लेते हैं. लेकिन हमने कहा ‘नहीं’, जब एक बार मन बना लिए तो उसपर अटल रहना है. पर यह काम बहुत मुश्किल था. थोडा थोडा देर पर तलब उठता, चिडचिडापन होता, बेचैनी होता. हम ही जानते हैं हम उससे कैसे पार पाए. पर अब जब हमको शराब पीने का तलब लगता तो हम चाय पीने लगे. भट्टी के आस पास से गुज़रते तो दौड़ के पार कर जाते कि हमको इसके सामने ज्यादा देर रहना ही नहीं है. अपने पास फ़ालतू पैसा रखना भी छोड़ दिए. अब जब हम रात में घर जाते तो हमारी बीवी को पता चल जाता कि ये पहले जैसा हालत में अब घर नहीं आता. फिर एक दिन उसने हमसे इसके बारे में पूछा कि “आजकल पी के नहीं आते..?” तो हम इसका जवाब उसको दे नहीं पाए बस यही बोले कि “छोडो वो सब फालतू बात, नींद आ रहा है.” उसके बाद से हमारी उससे इस बारे में कभी बात नहीं हुई. धीरे धीरे हमारी भी आदत छूटने लगी. गली मुहल्ला में भी धीरे धीरे लोगों को पता चलने लगा कि हम शराब छोड़ दिए हैं. बीवी भी खुश थी, कहती नहीं थी पर हम जानते हैं वो खुश थी.

इस शराबी बेवडे की स्थिति में हम तीन साल रहे थे. जीवन नरक हो गया था. लगता था कि हमारा बच्चा जो बड़ा हो रहा है उसके सामने क्या संस्कार दे रहे हैं हम. लेकिन महसूस तब हुआ जब खुद महसूस किए. इसी बीच वो मारुती वाला हमारा दोस्त एक दो बार दानापुर आया, हम उससे मिले भी, कहे कि “ये क्या आदत डलवा के मद्रास चले गए तुम” तो वो हँसने लगा. कहने लगा “हम तो अभी भी रोज का दो पेग ही पीते हैं, तुमको ऐसा आदत कैसे धर लिया?” हम उसको कुछ नहीं बोले. खैर अब तो उस बात को बहुत साल हो गया. तब से हम शराब को हाथ भी नहीं लगाए. अब अपनी टेलरिंग की दुकान खोल ली है, अपना काम करते हैं. पर दुकान अभी भी घर से वही आधा घंटा के दूरी पर ही रखे हैं. सुबह सुबह घर से दुकान सुर्ती रगड़ते हुए पहुँचते हैं, रास्ते भर रगड़ते जाते हैं और जब दुकान पहुँचते हैं तो मूंह में डाल लेते हैं. क्योंकि सुर्ती ऐसी चीज़ है ना कि उसको जितना रगडा जाए उतना मज़ा देती है और सुर्ती का नशा वैसे भी कोई नशा नहीं है ये तो बस एक मनोरंजन है.

Monday, 13 June 2016

डिअर भावना.

एक देश के रूप में हमने हमेशा से ही दिखने से ज़्यादा ना दिखने वाली चीजों को महत्त्व दिया है, परवाह ज़्यादा की है. जीवित से ज़्यादा पूज्य वो है जो मृत है. जो हमें दिखता नहीं वो देवतुल्य हो जाता है जैसे कोई बात समझ ना आने पर गहरी बात... हमारी बात बात पर आहात होती 'भावना' भी ऐसी ही अदृश्य शक्ति का उदाहरण है. ऐसी सारी अदृश्य शक्तिओं के बचाव के लिए किए जाने वाले यत्न पुरखों के नाम पर किया जाने वाला वो पिंडदान है जिसपर कोई भी सवाल नहीं उठाता बस कर देते हैं. इसकी बात करो तो सारे जीवित मुद्दों को एक तरफ करते हुए अचानक 'भावना' सर्वोपरि हो जाती है. आहात भावना का मानना हमारे और लोकतंत्र की मौलिक ज़रुरत बन जाता है. पर हमें पता नहीं कि भावना का इस बारे में क्या कहना है. वो सोचती क्या है?...तो यह चिठ्ठी एक कोशिश है उससे बात शुरू करने की उसे समझने की कि इसके बाद उन मुद्दों पर भी बात की जा सके जो ज़िंदा है, जो ज़रूरी हैं...जो दिखते हैं.


"देखिए दोस्त मिहिर देसाई द्वारा निर्देशित, मेरे द्वारा लिखी हुई 'डिअर भावना' स्वानंद किरकिरे साब की अद्वितीय आवाज़ में."


अपडेट: मेरे पसंदीदा फ़िल्मकार अनुराग कश्यप को डिअर भावना पसंद आई और उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इसे शेयर किया .





Saturday, 28 May 2016

जानकी पुल पर इस महीने पाँच कविताएँ छपी है. पढने के लिए लिंक पर जाएँ.
प्रभात रंजन जी का बहुत बहुत शुक्रिया.

यहाँ क्लिक करें


Sunday, 3 April 2016

कहानी-संभावनाएँ. www.thelallantop.com पर.

जिस टेबल पर वो दोनों बैठे थे वहाँ आस पास कोई भी नहीं था। कल्चरल वेन्यू होने के बावजूद आज कैफ़े वाला एरिया बिल्कुल खाली था। इसकी एक वजह थी वीक डे का होना और दूसरी यह कि जो थोड़े लोग आज आये थे वे भी अपने अपने इवेंट में बिजी हो गए थे। यहाँ कैफ़े में हरकत के नाम पर कैफेटेरिया में एक औरत कॉफ़ी बना रही थी और दूसरी तरफ लम्बी टेबल जिसपर खूब सारी पुरानी किताबों का ढेर रखा होता, एक बिल्ली करवटें बदल रही थी। इक्का दुक्का लोग पतली बाँस की बनी दीवार के पीछे थोड़ी देर खड़े होते, सिगरेट फूंकते और फिर ऐसे निकल जाते जैसे वहाँ किसी को जानते ही नहीं। पूरे कैफ़े में अलग अलग बल्बों की पीली रौशनी, कैफ़े में बिखरने वाली रात को और गाढ़ा बना रही थी। युग और अनु ऐसे ही किसी एक बल्ब के नीचे बैठे कुछ देर से बातें कर रहे थे। दोनों आज दूसरी बार मिल रहे थे। पहली बार भी यहीं मिले थे, एक इवेंट के दौरान ही, और अब मिलने का बहाना फिर से एक ऐसा ही इवेंट था। बहाना इसलिए, क्योंकि इवेंट तो हॉल में बंद दरवाज़े के अंदर कब का शुरू हो चुका था। पर दोनों इस बात को जानते हुए भी इग्नोर कर रहे थे। उनकी अपनी दुनिया और बाकी की दुनिया के घटने के बीच कुछ था तो बस एक दरवाज़ा। लकड़ी का मोटा, भारी दरवाज़ा। जिसे युग की एक आँख ने लगातार बंद कर के रखा हुआ था। उसे डर था कि उसके आँख हटाते ही वो दरवाज़ा खुल जाएगा और अन्दर की दुनिया उसकी इस दुनिया में घुसपैठ कर बैठेगी। जितनी देर भी हो सकता था वो अनु के साथ इसी दुनिया में रहना चाहता था।  

“मैं कुछ और... दस पंद्रह दिनों के लिए ही यहाँ हूँ”  अनु ने बातों ही बातों में अपना सर बाएं कंधे की तरफ झुकाते हुए कहा और फिर चुप हो गई। युग जो अब तक काफी खुश था, अनु की इस बात से  उसकी ख़ुशी की आँख में अचानक एक तिनका गिर पड़ा। वो यह सुनने के लिए तैयार नहीं था।  उसके दोनों होठ अभी भी अपनी जगह पकड़ कर वैसे ही बैठे हुए थे पर आखें कुछ और ही हो गई थीं। थोड़ी देर तक वो इधर उधर की बातें करता हुआ खुद को और अनु को भी यही बताता रहा कि शायद उसे फर्क नहीं पड़ता। पर जब मन के अन्दर की सारी गांठे खुल गई तो उससे रहा नहीं गया “दुबारा आओगी?” उसने पूछा। दरअसल वो पूछना चाहता था “दुबारा आओगी ना...” पर इस वक़्त कुछ सोच कर उसने सिर्फ इतना ही पूछा “दुबारा आओगी?”। शायद उस ‘...ना’ में उसे एक हक़ के छुपे होने की आहट महसूस हुई थी। वो हक़ जिसके बारे में उसे पता नहीं था कि वो उसका है भी या नहीं। क्या वो यह उसे कह सकता था या फिर नहीं... इसी कशमकश में ‘...ना’ कहीं पीछे छूट गया था।


(पूरी कहानी नीचे दिए हुए link पर पढ़ी जा सकती है)
http://www.thelallantop.com/bherant/ek-kahani-roz-neeraj-pandeys-story-sambhavnaayen/

Tuesday, 1 March 2016

इंडियरी मार्च में प्रकाशित...'डियर भावना'



डियर भावना,कैसी हो? अभी भी कहीं आहत तो नहीं हो तुम? तुम्हारे बारे में सोचा तो थोड़ी चिंता हुई, सोचा मिल कर तुमसे बातकरूँ। ढूँढने की भी कोशिश की पर तुम मिली नहीं। मैं नहीं जानता तुम कैसी दिखती हो, तुम्हारी उम्र क्या है या तुम कहाँ रहती हो। मुझे कुछ भी पता नहीं। पर पिछले कुछ सालों से जब तुम्हारे बारे में सुन रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, देख रहा हूँ मुझे लगता है तुम एक बच्ची हो। एक ऐसी बच्ची जिसकी उम्र वक़्त के साथ और कम होती चली जा रही है। और यह भी मेरी चिंता की वजह है। इसलिए इस उम्मीद के साथ लिख रहा हूँ कि अगर कहीं तुम्हें ये चिट्ठी मिले तो मैं अपनी बात तुम तक पहुँचा सकूँगा।उदाहरण के लिए तुम महेंद्र सिंह धोनी वाली घटना को ले लो। कुछ दिनों पहले मैंने सुना, तुम धोनी की वजह से आहत हुई थी। पहली बार तो मुझे लगा कि इसमें ज़रूर ही धोनी की कोई बदमाशी रही होगी। यह सोच कर मैंने थोड़ी जाँच पड़ताल भी की, पता चला धोनी इस मामले में बिल्कुल सूफ़ी है| मैंने वो लेख पढ़ा भी और वो फोटो भी देखी, जिसको लेकर इतना बवाल हुआ था। उसमें धोनी का चेहरा फोटोशॉप कर के लगाया हुआ है, और जहाँ तक मुझे लगता है धोनी फोटोशॉप तो नहीं जानता। नहीं, नहीं मैं धोनी की तरफदारी नहीं कर रहा, अरे मैं तो क्रिकेट भी नहीं देखता| और मुझे भी तुम्हारी तरह अमीर लोगों से थोड़ी परेशानी ही रहती है।...

(पूरा लेख नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है.)
http://indiaree.com/magazines/examples/magazine.php?lang=Hindi&issue=022016&Submit=+Read+