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Thursday, 2 September 2021

"Writing a Fable. Writing about a Fable"


अभी जहाँ बैठा हूँ उस  कैफ़े का नाम है "लीपिंग विंडोज़"। यहाँ  पहुँचने से बहुत पहले से इस जगह को जानता हूँ मैं। इसके बारे में पहली बार साल दो हज़ार चौदह में पता चला था। पता चला था कि मुंबई में फ़िल्मों में काम करने वाले तमाम लोगों का अड्डा है ये जगह। इसकी कुछ एक फ़ोटोज़ भी देखी थीं मैंने। कुछ एक फ़ोटोज़ देखकर ही इसके होने की पूरी कल्पना में लगातार करता। कैसा होगा उन सबका जीवन जो इस कैफ़े के अंदर बैठकर रचते होंगे? इसके आसपास रहने वाले लोगों का जीवन कैसा होगा? कितना मज़ा आता होगा ना आराम से बैठे बैठे कॉफ़ी पीते हुए अपना एक संसार रचना। जो लोग यहाँ आते होंगे वो कहाँ से आते होंगे और फिर कहाँ जाते होंगे? और जब एक साथ इतने सारे कलाकार एक ही छत के नीचे काम करते होंगे तो कैसा होगा माहौल? यह सारे सवाल और जाने क्या क्या मेरी कल्पना के हिस्सा थे।

मैं जब मुंबई आ गया तब भी इस कैफ़े के बाहर खड़े रहकर इसके अंदर बैठने की कल्पना करता रहता। बाहर से अंदर की तरफ़ झाँकता कि एक नज़र देख लूँ कि कौन सा कलाकार अंदर बैठा है। यह कैफ़े बस कैफ़े नहीं पर मेरी फ़ेबल का हिस्सा था जिसके अंदर कला का एक संसार बसता था। अब जब मैं इसके बाहर खड़े होकर इसे देखता तब मुझे यह ख़याल भी नहीं आता कि क्या मैं इसके अंदर जा सकता हूँ? शायद ख़याल आता होगा पर मेरे पास उतने पैसे थे नहीं कि यह ख़याल बहुत देर तक टीक पाए। 

मेरी कल्पना में बहुत सारी कहानियाँ इस कैफ़े से निकली हैं। मैं चाहता था उस अंदर की दीवारों और इसके रंग को देखना जिसकी मैंने बस कल्पना मात्र ही की थी। मैं जब पहली बार अंदर आया तो थोड़ा असहज भी था। कोई दोस्त ही लेकर आया था मुझे यहाँ पहली बार या फिर मैं किसी से काम के सिलसिले में मिला था। मुझे याद नहीं। बात सिर्फ़ पैसों की नहीं थी। बात काम की भी थी। क्या मैं वैसा काम करने के क़ाबिल हूँ कि मैं इस कैफ़े में बैठकर बड़ी सहजता से अपना काम कर पाऊँ? क्या मेरे दिमाग़ के अंदर जो दुनिया है उसको इस जगह पर आकार मिलेगा कि कस्मक़स भी चलती रहती। 

सिर्फ़ यह कैफ़े ही नहीं, इसके आसपास का पूरा यारी रोड और वर्सोवा का इलाक़ा ही मुझे मेरी किसी फ़ेबल से निकला हुआ लगता है। मैंने अपने पसंदीदा कलाकारों और लेखकों के क़िस्से इसी हिस्से से सुने हैं। एक एक मोड़ और एक एक मोड़ से मुड़कर निकलने वाली सम्भावनाएँ जादुई हैं। गली से गुज़रते हुए खेलती हुई बिल्लियाँ और आराम करते कुत्ते, ये पीपल का पेड़ जो मेरे सामने हवा में हिल रहा है, यहाँ साइकल पर चलते लोग, यह मंदिर-मस्जिद का मोड़ और कई सारे कैफ़ेज़, ये सब मेरी काल्पनिक कहानी का हिस्सा रहे हैं जिसे मैं अब जीने लगा हूँ। मैंने यहाँ के कई घरों में अपने कई फ़ेवरेट कलाकारों के होने की कल्पना तब की है जब वो मेरे दोस्त नहीं थे। अभी भी वो कल्पना कहीं ना कहीं झूलती रहती है।

मैं इस इलाक़े में नहीं रहता। यहाँ से सोलह सत्रह किलोमीटर दूर रहता हूँ। पर आजकल मेरा काम इधर ही है तो कुछ दिनों से एक दोस्त के घर पर इधर ही रह रहा हूँ। लीपिंग विंडोज़ तीन सौ मीटर की दूरी पर है जो इस पूरे इलाक़े को मेरे लिए एक सूत्र में बाँधता है। जब कभी पूरे दिन काम करके एकदम भर जाता हूँ तो यहीं की सड़कों पर ख़ुद को ख़ाली करने निकल पड़ता हूँ। दौड़ते हुए कई बार मैंने ख़ुद को ख़ुद से यह कहते हुए पाया है कि मैं एक फ़ेबल में जी रहा हूँ। वो सारे सुख कहें तो कहानी, जिसकी मैंने लगातार कल्पना करी थी, मैं उसका एक किरदार बन चुका हूँ।

यहाँ कुछ लोग मुझे जानते हैं। मेरे काम को जानते हैं। मुझे लगता है वो मुझे पसंद भी करते हैं। कहीं से कहीं जाते हुए अक्सर मिल जाते हैं। सर हिला कर और पलकें झपकाकर हम लोग एक दूसरे को हेल्लो कहते हैं। मैं यहाँ नहीं रहता फिर भी यहाँ रहता हूँ। आजकल एक हफ़्ते से दीपक (डोबरीयाल) भाई रोज़ वॉक करते हुए मिल जाते हैं। हम एक बार एक दूसरे को दौड़ते हुए ही हेल्लो कहते हैं और अपने अपने संसार में चले जाते हैं। यहाँ जीते हुए, इस वाक्य को लिखते हुए जीवन बहुत ही सुंदर लग रहा है। कल रात मेरे writers room का आख़िरी दिन था और मैं उसके बाद आकाश के साथ दौड़ने गया। हम पाँच किलोमीटर दौड़े। पसीने ले लथपथ। मज़ा आया। हमने अपनी दौड़ लीपिंग विंडोज़ से शुरू करके लीपिंग विंडोज़ पर ही ख़त्म की थी। मैंने रात के अंधेरे में लीपिंग की फ़ोटो खिंची। यह फ़ोटो वर्सोवा इलाक़े की नहीं मेरी फ़ेबल की फ़ोटो थी। आज जब बड़े दिनों बाद यहाँ आने का मौक़ा मिला तो सोचा मुझे ये यहाँ दर्ज कर लेना चाहिए। जिस टेबल पर मैं बैठा हूँ मैंने उसकी फ़ोटो खिंची और Instagram पर डालकर लिखा "Writing a Fable. Writing about a Fable"। 

 हाँ मैं अपनी फ़ेबल ही जी रहा हूँ।

Tuesday, 12 June 2018

तीन साल मुम्बई और एक छोटी सी बात

आज ही के दिन तीन साल पहले पहली बार मुंबई आया था। बारिश होकर बस रुकी ही थी। फिल्में और कहानियों में पढ़ी हुई मुम्बई को ट्रेन की खिड़की से देख रहा था। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाई-वे पर भागते हुए ऑटो में यह तलाश कर रहा था कि इस शहर में मेरी जगह कहाँ होगी? अब तक का जिया हुआ सब पीछे हो गया था और अब एक नई डायरी पर नई कहानी लिखनी थी... हाथ काँप रहे थे। पिछले तीन सालों का सफर काफी उतार चढ़ाव से भरा पर उम्मीद से ज़्यादा मजेदार रहा है। इस शहर में सबके अनुभव अलग होते हैं, पर मेरे अनुभव के हिस्से में यह बात आती है कि आजतक कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने किसी से मदद माँगी और उसने मना किया हो। इस शहर के संघर्ष में लोग कभी संघर्ष नहीं हुए। कई सारे खूबसूरत दोस्त दिए हैं इस शहर ने जो अपनी व्यस्तताओं के बावजूद मेरे लिए तैयार खड़े होते हैं, हौसला बढ़ाते हैं। और मैं इस बात से खुश रहता हूँ कि ये सब मेरे दोस्त हैं... मुंबई ने छोटी छोटी खुशियों को बटोरना सिखाया, काम करना सिखाया और शुरूआती दिनों में कुछ निराशाएँ देकर यह भी सिखाया है कि 'निराशा' हमेशा रहने वाली चीज़ नहीं है। 

इसी शहर ने 'सॉरी' और 'थैंक यू' बोलना सिखाया और बोला कि "Don't be a lazy writer, अपने दुःख से बाहर भी देख, एक बड़ी दुनिया है लिखने के लिए..." काम को लेकर अलग अलग तरह के एक्सपेरिमेंट करने का मौका बस यही शहर दे सकता था। सो किया और कर रहा हूँ... दिल्ली से बैंगलोर जाना और बैंगलोर से मुंबई आना मेरी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण यात्राएँ हैं। 

आज फिर बारह जून है, आज फिर मैं ट्रेन से वापस मुम्बई आ रहा हूँ, आज फिर बारिश के आसार हैं। मुंबई लौटना अब घर लौटने जैसा लगता है। कहानी तो अभी भी चल रही है पर अब हाथ नहीं काँपते, अब संधर्ष यह है कि जो भी लिखूँ पूरी ईमानदारी से लिख पाऊँ। पहली बार जब लोकल की टिकट ली थी तो कुछ सोचकर वो संभाल कर रख ली थी। वह सिलसिला अभी भी चल रहा है। आज तीन साल बाद इन टिकटों में मेरी इस शहर की सारी यात्राएँ मौजूद हैं और इनके अंदर इतनी कहनियाँ, जिसको सोचो तो लगता है कई जीवन जी लिये हों। उम्मीद है यह शहर उन सारी यात्राओं का मौका देगा जिसकी मुझे उम्मीद नहीं पर ज़रूरत ज़रूर है।

Tuesday, 9 January 2018

आजकल: नौकरी छोड़ने के बाद एक महीना

साल की पहली किताब पढ़कर ख़त्म कीकुछ एक हफ़्ता और पाँच या छः सिटिंग्स मेंमेरी स्पीड के हिसाब से ये किताब जल्दी ख़त्म हो गईसमझ में भी आई और कई दोस्तों को मैंने रेकमेंड भी कर दीफिर कल दूसरी किताब पढ़ना शुरू किया और ऐसा लगा जैसे इस किताब के पन्नों पर स्पीड ब्रेकर लगे हों। ऐसा होता है ना जैसे क़रीब क़रीब पूरा पन्ना पढ़ गए और समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है, कुछ वैसा। दो तीन बार उसी पन्ने को ठीक से समझ समझ कर पढ़ने की कोशिश करी। पर...पर...पर। पर कुछ मेरे अंदर ही था जो लगातार अपनी धुन पकड़े हुआ था, वो अपनी ही स्पीड में चल रहा था। मैं उसे कुछ देर अपने साथ लेकर चलता पर वो कुछ देर के बाद अपनी स्पीड में भाग जाता...निकल जाता हाथ से। बीच बीच में यह ख़याल भी आता कि ‘रात के एक बज गए हैं अब सो जाना चाहिए क्योंकि सुबह नौ बजे अंधेरी पहुँचना है। उसके लिए सुबह सात बजे तो उठना पड़ेगा। नींद भी पूरी होनी चाहिए नहीं तो पूरे दिन चीडचीडे रहोगे...’

नौकरी छोड़े एक महीने से थोड़ा ज़्यादा हुआ है। पुराने  ऑफ़िस की कुछ ज़्यादा याद नहीं आ रही क्योंकि अभी उसका ज़्यादा स्कोप है नहीं। मेडिटेशन भी वैसा ही चल रहा है, रोज़ सुबह चालीस मिनट...जैसा पहले चल रहा था। बाहर की दुनिया भी वैसी ही है जैसी थी और अगर सच बोल दूँ तो शायद पहले से बेहतर ही है...पर अंदर कुछ है जो थोड़ा बदला बदला सा लगता है। जल्दी में रहता है। यह लाइन लिखते हुए भी उसने जल्दी दिखाई। ऊपर देखा तो लगा बस इतना ही लिखा। कहाँ की जल्दी है ये...? कहाँ जाना है मुझे...? और सबसे बड़ा सवाल क्यूँ है ये?

शायद इसका जवाब मेरे नौकरी छोड़ने में ही है। शायद... पर अभी ठीक ठीक तो नहीं कह सकता। मुंबई के शुरुआती दिनों जैसे अब पैसों और काम की क़िल्लत थी वैसी अब नहीं है (इस बात का शुक्रिया है)। अक्सर व्यस्त ही रहता हूँ। सपने भी काम के ही आते हैं पर शायद अब मैं सब समेटने में लगा रहता हूँ। जो भी आस पास दिखता है सबकुछ। लोग, जगहें, बातें, काम... पूरा दिन। एक साथ कई काम कर रहा हूँ और दिमाग़ एक से दूसरे काम पर स्विच होता रहता है। दिन के जैसे तीन या चार साँचे हों कि ये इसका, ये इसका और इस वाले में में ये करूँगा...

ब्रश करते हुए नहाने के बारे में सोचता हूँ...नहाते हुए मेडिटेशन के बारे में... और मेडिटेट करते हुए दुनिया भर के ख़याल (जिनका ज़्यादातर हिस्सा काम से जुड़ा होता है) आता रहता है। यह शायद दिन को अच्छे से इस्तेमाल करने की होड़ है या बस एक लालच कि सब समेट लूँ। एक दिन में कितना जिया जा सकता है? एक दिन हमें कितना कुछ दे सकता है? इन सवालों के कोई पुख़्ता जवाब नहीं है। यह जानते हुए कि सब ठीक है और आगे भी ठीक ही होगा मैं ‘आज’ पर ऐसे झपटता हूँ जैसे इसे कल के लिए बचा कर रख लूँ। मैंने ख़ुद को बैठे बैठे कई बात पैर हिलते हुए पकड़ है और फिर ख़ुद से पूछा है ‘किस बात की जल्दी है?’ फिर ख़ुद को ही खींच कर वहाँ वापस ले कर आता हूँ। जैसा अभी किया, बिल्कुल अभी अभी।

ख़ैर, नौकरी छोड़ कर फ़्रीलान्स करने से जीने का तरीक़ा और इसके समीकरण बदले तो हैं। यह घर बदलने जैसा है। पुराने घर का कोना कोना पता था। अंधेरे में भी चल कर जाओ तो फ़र्श कहाँ ऊँचा है कहाँ नीचा है, कहाँ मोड़ है सब दिमाग़ में छपा था। अब घर बदल कर नए घर में आए हैं। सालों से किराए के घर में रहने की ऐसी आदत पड़ी है कि इसके दरवाज़े पर अपनी नेम प्लेट लगाते हुए भी डर रहे हैं। इस नए घर में जगह ज़्यादा है तो ज़रा भटक जाने की संभावना भी उतनी ही है। नए घर और परिवेश में आदमी को ख़ुद से ख़ुद को पालना होता है... यह बात भी इसी उम्र में समझ में आ रही है। वाह! यह एक नयी शुरुआत की घबराहट हो सकती है या फिर ख़ुद के कल को सुरक्षित करने के लिए दिमाग़ द्वारा दिए जाने वाले संकेत... पता नहीं। पर अभी इसी के साथ रहना है और इंतज़ार करना है कि कब इस नए घर से थोड़ी जान पहचान हो जाए। इसके फ़र्श का उतार चढ़ाव, मोड़ समझ में आ जाएँ। तब जाकर ख़ुद के दिमाग़ में चलने वाली रेस को थोड़ा आराम मिलेगा शायद और अगली किताब को उसी स्पीड में पढ़ पाउँगा जिस स्पीड में वो मेरे सामने ख़ुद को खोलना चाहती है।