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Thursday, 2 September 2021

"Writing a Fable. Writing about a Fable"


अभी जहाँ बैठा हूँ उस  कैफ़े का नाम है "लीपिंग विंडोज़"। यहाँ  पहुँचने से बहुत पहले से इस जगह को जानता हूँ मैं। इसके बारे में पहली बार साल दो हज़ार चौदह में पता चला था। पता चला था कि मुंबई में फ़िल्मों में काम करने वाले तमाम लोगों का अड्डा है ये जगह। इसकी कुछ एक फ़ोटोज़ भी देखी थीं मैंने। कुछ एक फ़ोटोज़ देखकर ही इसके होने की पूरी कल्पना में लगातार करता। कैसा होगा उन सबका जीवन जो इस कैफ़े के अंदर बैठकर रचते होंगे? इसके आसपास रहने वाले लोगों का जीवन कैसा होगा? कितना मज़ा आता होगा ना आराम से बैठे बैठे कॉफ़ी पीते हुए अपना एक संसार रचना। जो लोग यहाँ आते होंगे वो कहाँ से आते होंगे और फिर कहाँ जाते होंगे? और जब एक साथ इतने सारे कलाकार एक ही छत के नीचे काम करते होंगे तो कैसा होगा माहौल? यह सारे सवाल और जाने क्या क्या मेरी कल्पना के हिस्सा थे।

मैं जब मुंबई आ गया तब भी इस कैफ़े के बाहर खड़े रहकर इसके अंदर बैठने की कल्पना करता रहता। बाहर से अंदर की तरफ़ झाँकता कि एक नज़र देख लूँ कि कौन सा कलाकार अंदर बैठा है। यह कैफ़े बस कैफ़े नहीं पर मेरी फ़ेबल का हिस्सा था जिसके अंदर कला का एक संसार बसता था। अब जब मैं इसके बाहर खड़े होकर इसे देखता तब मुझे यह ख़याल भी नहीं आता कि क्या मैं इसके अंदर जा सकता हूँ? शायद ख़याल आता होगा पर मेरे पास उतने पैसे थे नहीं कि यह ख़याल बहुत देर तक टीक पाए। 

मेरी कल्पना में बहुत सारी कहानियाँ इस कैफ़े से निकली हैं। मैं चाहता था उस अंदर की दीवारों और इसके रंग को देखना जिसकी मैंने बस कल्पना मात्र ही की थी। मैं जब पहली बार अंदर आया तो थोड़ा असहज भी था। कोई दोस्त ही लेकर आया था मुझे यहाँ पहली बार या फिर मैं किसी से काम के सिलसिले में मिला था। मुझे याद नहीं। बात सिर्फ़ पैसों की नहीं थी। बात काम की भी थी। क्या मैं वैसा काम करने के क़ाबिल हूँ कि मैं इस कैफ़े में बैठकर बड़ी सहजता से अपना काम कर पाऊँ? क्या मेरे दिमाग़ के अंदर जो दुनिया है उसको इस जगह पर आकार मिलेगा कि कस्मक़स भी चलती रहती। 

सिर्फ़ यह कैफ़े ही नहीं, इसके आसपास का पूरा यारी रोड और वर्सोवा का इलाक़ा ही मुझे मेरी किसी फ़ेबल से निकला हुआ लगता है। मैंने अपने पसंदीदा कलाकारों और लेखकों के क़िस्से इसी हिस्से से सुने हैं। एक एक मोड़ और एक एक मोड़ से मुड़कर निकलने वाली सम्भावनाएँ जादुई हैं। गली से गुज़रते हुए खेलती हुई बिल्लियाँ और आराम करते कुत्ते, ये पीपल का पेड़ जो मेरे सामने हवा में हिल रहा है, यहाँ साइकल पर चलते लोग, यह मंदिर-मस्जिद का मोड़ और कई सारे कैफ़ेज़, ये सब मेरी काल्पनिक कहानी का हिस्सा रहे हैं जिसे मैं अब जीने लगा हूँ। मैंने यहाँ के कई घरों में अपने कई फ़ेवरेट कलाकारों के होने की कल्पना तब की है जब वो मेरे दोस्त नहीं थे। अभी भी वो कल्पना कहीं ना कहीं झूलती रहती है।

मैं इस इलाक़े में नहीं रहता। यहाँ से सोलह सत्रह किलोमीटर दूर रहता हूँ। पर आजकल मेरा काम इधर ही है तो कुछ दिनों से एक दोस्त के घर पर इधर ही रह रहा हूँ। लीपिंग विंडोज़ तीन सौ मीटर की दूरी पर है जो इस पूरे इलाक़े को मेरे लिए एक सूत्र में बाँधता है। जब कभी पूरे दिन काम करके एकदम भर जाता हूँ तो यहीं की सड़कों पर ख़ुद को ख़ाली करने निकल पड़ता हूँ। दौड़ते हुए कई बार मैंने ख़ुद को ख़ुद से यह कहते हुए पाया है कि मैं एक फ़ेबल में जी रहा हूँ। वो सारे सुख कहें तो कहानी, जिसकी मैंने लगातार कल्पना करी थी, मैं उसका एक किरदार बन चुका हूँ।

यहाँ कुछ लोग मुझे जानते हैं। मेरे काम को जानते हैं। मुझे लगता है वो मुझे पसंद भी करते हैं। कहीं से कहीं जाते हुए अक्सर मिल जाते हैं। सर हिला कर और पलकें झपकाकर हम लोग एक दूसरे को हेल्लो कहते हैं। मैं यहाँ नहीं रहता फिर भी यहाँ रहता हूँ। आजकल एक हफ़्ते से दीपक (डोबरीयाल) भाई रोज़ वॉक करते हुए मिल जाते हैं। हम एक बार एक दूसरे को दौड़ते हुए ही हेल्लो कहते हैं और अपने अपने संसार में चले जाते हैं। यहाँ जीते हुए, इस वाक्य को लिखते हुए जीवन बहुत ही सुंदर लग रहा है। कल रात मेरे writers room का आख़िरी दिन था और मैं उसके बाद आकाश के साथ दौड़ने गया। हम पाँच किलोमीटर दौड़े। पसीने ले लथपथ। मज़ा आया। हमने अपनी दौड़ लीपिंग विंडोज़ से शुरू करके लीपिंग विंडोज़ पर ही ख़त्म की थी। मैंने रात के अंधेरे में लीपिंग की फ़ोटो खिंची। यह फ़ोटो वर्सोवा इलाक़े की नहीं मेरी फ़ेबल की फ़ोटो थी। आज जब बड़े दिनों बाद यहाँ आने का मौक़ा मिला तो सोचा मुझे ये यहाँ दर्ज कर लेना चाहिए। जिस टेबल पर मैं बैठा हूँ मैंने उसकी फ़ोटो खिंची और Instagram पर डालकर लिखा "Writing a Fable. Writing about a Fable"। 

 हाँ मैं अपनी फ़ेबल ही जी रहा हूँ।

Friday, 29 December 2017

आश्चर्य का टुकड़ा

जीवन के आश्चर्य इतने सूक्ष्म है कि अगर रोज़मर्रा की जिंदगी में ज़रा सा रुका कर इनपर गौर ना करें तो वो गायब हो जाएँ। ये सारे आश्चर्य हमारे आसपास ही रह रह कर पनपते रहते हैं।

कल रात बांद्रा में शो था| अक्सर शो के बाद घर लौटते हुए लेट हो जाता हूँ| घर पहुँचते पहुँचते बारह बज जाना अब एक आम बात हो गई है| आज कल निधि (मेरी छोटी बहन) भी पूना गई हुई है तो वापस लौटने पर घर पर कोई नहीं था| दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोल कर घुसना पड़ा| आज अपने कमरे में पहुँचते ही ट्यूबलाइट जलाई और फिर तीन सेकंड के अंदर झट कर के बंद कर दी| अभी कमरे में बाहर से आने वाली हल्की हल्की रोशनी मुझे ठीक लग रही थी| मेरे कमरे में एक बड़ी सी खिड़की है जो स्लाइड कर के खुलती है। अगर परदों को किनारे कर दिया जाए तो आस पास की बिल्डिंगों से इतनी रोशनी कमरे में जाती है कि किताब पढ़ना छोड़ कर बाकी  के काम किए जा सकते हैं। मैंने ट्यूबलाइट बंद कर दी।

थोड़ी देर में हाथ मुँह धोने के बाद मैं अपने बिस्तर पर पीठ को तकिये से टेक लगा कर बैठ गया...बाहर की तरफ़ झाँकता हुआ| मेरी खिड़की पर सफ़ेद पर्दा हल्का हल्का हिल रहा था| इसके हिलने के साथ ही थोड़ी और रोशनी कमरे के अन्दर आती हुई मेरे पैरों पर पड़ रही थी| आस पास सब शांत था। धीरे धीरे पूरे दिन की थकान को आराम मिलने लगा और जो ख़याल पूरे दिन इधर उधर  भागते रहते हैं अपनी जगह बनाने लगे।

ऐसे ही ख़यालों के जगह बनाने के क्षण में अचानक मुझे 'आश्चर्य' दिखा| हाँ आश्चर्य... मेरी खिड़की पर लटकता हुआ सफ़ेद पर्दा| हाँ वो आश्चर्य है। उसको देखकर मैं थोड़ी देर उसे ही देखता रहा और एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर फैल गई| यह आश्चर्य ही था| मैंने फिर नज़र घुमा कर पूरे कमरे को देखा... वाह! कमाल है'आश्चर्य पूरे कमरे में बिख़रा हुआ है...' मैंने ख़ुद से बात की और ख़ुद से ही स्वीकृति भी दे दी। 

यह आश्चर्य इसलिए था कि मुझे पता भी नहीं चला और मैं अपनी उस दुनिया के अन्दर था जिसकी मैंने कभी कल्पना मात्र की थी। दरअसल बात ऐसी है कि १०१३- २०१५ तक बैंगलोर में अपने एक दोस्त और बहन के साथ एक छोटे से घर में रहते हुए जब मैं एक बार नींद से उठा तो अचानक अपने सामने बड़े सामान का ढेर पाया| घर भरा हुआ था। दो (दरअसल डेढ़) छोटे छोटे कमरों में घर के तीन लोगों का कम सामान भी बहुत ज़्यादा लगता था। ऐसा लगता था कि मेरे ख़याल उन सामानों से टकराकर कमरे की फ़र्श पर गिर रहे हो। उनके लिए घर में जगह ही नहीं थी ऐसा लगता था। मुझे याद है, ऐसा ख़याल आने के बाद ही मैंने दो पन्नों पर इसके बारे में लिखा भी था और लिखते हुए सोचा था कि कभी शायद मेरा एक कमरा होगा जो एकदम ख़ाली होगा। उसमें मेरे ख़याल किसी चीज़ से टकराकर गिरेंगे नहीं। मैं उसकी दीवारें सफ़ेद रखूँगा, कमरे में सामान एकदम कम होगा, एक लम्बी खिड़की होगी दीवार के साइज़ की जिसको स्लाइड कर के खोला जा सकता होगा (मैं कभी रात में बैठ कर उसपर चाय पियूँगा), और खिड़की पर जो परदे होंगे वो भी सफ़ेद होंगे। गुलज़ार साब भी शायद इसीलिए हमेशा सफ़ेद पजामे-कुर्ते में दिखते हैं शायद। उन्हें भी ऐसा लगता होगा शायद... पर ये सब कब और कैसे होगा इसका मुझे बिल्कुल पता नहीं था। बस बैठे बैठे सोच लिया था और सोचने में कोई पैसे थोड़े ही लगते हैं। 

पर अभी इस क्षण में जब मैं अपने कमरे में बैठा हूँ मैं वही तो जी रहा हूँ। मैं उस ख़याल की हक़ीक़त में बैठा हुआ हूँ जो कभी यूँ ही सोच लिया था। वो मेरे जीवन में कब का घट  चुका था जिसे मैंने आज देखा है। यह आश्चर्य ही तो है। मैं ख़ुद ही ख़ुद में मुस्कुरा दिया। होंठों के विस्तार ने ख़ुशी का विस्तार किया और कमरे की रोशनी के साथ साथ अंदर भी एक रोशनी उतर गई और मन ही मन मैंने कहा कि 'यार 'आश्चर्य' होते तो हैं, पर बड़े सूक्ष्म। जिन्हें रुककर ना देखो तो घट कर निकल जाते हैं। यह सोचते हुए मैंने खिड़की का सफ़ेद पर्दा पूरी तरह से एक तरफ़ किया, खिड़की को स्लाइड किया, कमरे के अंदर हल्की ठंडी हवा और आने लगी... कुछ सेकेंड वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं किचन की तरफ़ बढ़  गया, चाय बनाने। अपने आश्चर्य के दूसरे हिस्से को थोड़ा और जीने...

Saturday, 28 May 2016

जानकी पुल पर इस महीने पाँच कविताएँ छपी है. पढने के लिए लिंक पर जाएँ.
प्रभात रंजन जी का बहुत बहुत शुक्रिया.

यहाँ क्लिक करें


Thursday, 25 June 2015

एक पन्ना : रात की चाय

कभी गौर किया है तुमने ? रात के कुछ ढलने के बाद कई बार एक तलब चढ़ती है… चाय या कॉफ़ी पीने की । ये वो तलब होती है जब चाय या कॉफ़ी में से कुछ भी मिल जाये तो काम हो जाता है । तुम्हारे पास ऑप्शन ढूंढने के कोई हालात बचते ही नहीं । जो भी सामने आता है वो तुम स्वीकार करते हो, या कहो कि उसमें घुल लेते हो । अक्सर रात के बारह बजने के आस पास या उसके बाद मेरी भी यह इच्छा तीव्र हो जाती है । कई बार दोस्तों के साथ या अकेले एक प्याली चाय या कॉफ़ी ढूंढने निकल पड़ता हूँ । बैंगलोर के कई चौराहों, नुक्कड़ और गलियों में कुछ दूकानदार स्ट्रीट लैंप की पीली रौशनी के नीचे अपनी साइकिल पर चाय के थरमस के साथ सिगरेट और चकली लिए अक्सर खड़े होते हैं । और उनके आस पास होती है, दस से पंद्रह लोगों की भीड़, चाय या सिगरेट पीते हुए । सब अपनी बाइक और गाड़ियों को रोक कर चाय का लुत्फ़ ले रहे होते हैं । मैं उन्हीं में से किसी एक नुक्कड़ पर चाय पीने निकल जाता हूँ … जहाँ भी मिल जाए । बैंगलोर की हल्की ठंढी रातों में किसी बंद दूकान की सीढ़ियों या किसी फूटपाथ पर बैठ कर समय को गुज़रते हुए देखना मुझे पसंद है । 


खैर बात हो रही थी चाय की... दरअसल रात की चाय को बस 'चाय' कहना अपराध होगा...लेखन की भाषा में कहूँ तो बड़ा ही फ्लैट होगा । रात की चाय एक टोकन है कुछ और वक़्त खरीदने के लिए… नींद की आगोश में जाने से पहले अगर रात थोड़ी और जी जा सके इसकी सम्भावना लिए हर चाय की प्याली आती है । भले ही देर रात गली नुक्कड़ पर बिकने वाली चाय हो या घर में देर रात बनाई हुई मेरी कॉफ़ी । ये सभी एक टोकन हैं, जो मुझे थोड़ी और देर जगाने में मदद करते हैं । मुझे रात पसंद है, रात में बाहर निकलो तो ऐसा लगता है आसमान मानों एक बड़ा सा तंबू तना हो और टिमटिमाते तारे ऐसे जैसे उस तंबू में लगी छोटी छोटी लाइट्स, और रात के इस वक़्त इस तम्बू के नीचे चल रही बहुत सी कहानियों को थोड़ा ठहराव मिलता दिखता है… एक कहानी शुरू होकर अपने एक मोड तक आती दिखती है, जैसे दिन के पाँव दुःख गए हो और वो रात के पीछे छुप कर थोड़ी देर आराम करना चाहता हो । मुझे यह सब देखना बहुत पसंद है, अलग अलग किरदारों को देखना, उनको गढ़ना, उनके बारे मे सोचना ये सब उसी तंबू के तले होते हैं | मैं रात में सोना बस मजबूरी से करता हूँ। मैं कभी अपनी छत पर बैठे बैठे पूरी रात, रात के साथ सफर करना चाहता हूँ, तब तक, जब तक रात सरकते-सरकते सुबह ना बन जाये… पर ऐसा मुमकिन नहीं हो पाता । पर मेरी कॉफ़ी का मग या प्याली की चाय मुझे कुछ और देर जागने में मदद करते हैं , इसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ । मेरे लिए दिन और रात के अलग अलग वक़्त पर गटके गए प्यालों का अलग अलग मतलब है । 
खैर अभी अभी बाहर से आया हूँ , आज कोई चायवाला नहीं मिला । मैं अनायास ही लगभग तीन किलोमीटर का सफर कर के खाली हाथ वापस आ गया । रसोई में जाकर देखा तो थोड़ा दूध बचा हुआ था … जैसे मेरे लिए ही छोड़ा गया हो । रात के एक बज रहे हैं … और मैं अपनी कॉफ़ी बना रहा हूँ ।




© Neeraj Pandey

Sunday, 19 April 2015

मेरी बेचैनी

(A piece written a year ago at write club, from where I got my Theatre thing started in Bangalore, Have a look)Death bed monologue for scene.
ज़िंदगी को परत दर परत उधेड़ता, बेचैन, आज इसकी आख़िर परत तक आ पहुँचा हूँ. पर वो शोर आज भी थमा नहीं है.शरीर ने कब का साथ देना छोड़ दिया था पर दिमाग़ की बेचैनी और तलाश रुकने का नाम नहीं लेती | कहीं का कहीं वो शोर सन्नाटा बन कर मेरे ज़हन में चीखें मारता है. ये दो चट्टानों के बीच से गुज़रती हुई, चिंघाड़े मारती हुई, हवा का शोर शायद ये मेरी मौत के साथ ही दफ़न हो |...या फिर शायद कभी नहीं |मैं आज अपनी मरन्शैया पर लेटा अपनी ज़िंदगी को फिल्म की तरह रीवैइंड कर कर देख रहा हूँ की वो कौन सा पल था जब ये बेचैनी शुरू हुई थी. उसका भी कोई निशान नहीं मिलता |ज़िंदगी की कड़ियों  को जोड़ते जोड़ते मैं खुद ही उलझ गया, और मैं भी उन्हे सुलझाने के लिए अलग अलग तरीके तलासता रहा, सरकारी नौकरी मे होने के बावजूद , पैंटिंग किया, सोशियल वर्क किया, दुनिया भी घूमा पर बेचैनी जस की तस | हर बार नई खोज एक नशे की तरह काम करती और नशा उतरते ही मैं फिर से बेचैन |हर बार ज़िंदगी को समझने के लिए ज़िंदगी की एक परत उधेड़ता तो फिर नई परत दिखाई पड़ती, पर कुछ वक़्त बाद उसका भी रंग वही, पहले जैसा |ऐसा भी नहीं है की इस परत दर परत ज़िंदगी को समझने मे मैं अकेला था ,सब तो था मेरे पास, पर फिर ये बेचैनी क्यों?इसका जवाब तो इस जन्म मे नहीं मिला, और शायद इस सवाल को करने का ये सही वक़्त भी नहीं है. क्या नहीं था मेरे पास मेरी बीवी थी, बच्चे थे, दोस्त थे, पैसा था. सब कुछ था पर एक बेचैनी के साथ |पर यह शोर शायद थोड़ा कम ज़रूर है, शायद तूफान से पहले का सन्नाटा.क्या पता फिर से कोई नई परत खुलने वाली है |बेचैन रहने की ऐसी आदत पड़ी है तो लगता है मर कर भी चैन नहीं आएगा |मेरी  बेचैनी शायद मेरी कब्र के उपर लगे उसे पेंड के फल में फलेगी,शायद मेरी कब्र के मिट्टी की खुश्बू ले जाती उस हवा में बहेगी , या फिर शायद उस मिट्टी में जो बरसात का पानी एक जगह से दूसरी जगह बहा कर ले जाएगा उसके साथ भटकेगी| कभी वो ही बारिश का पानी नदी से मिल आएगा तो कभी वही नदी समंदर से |मेरी बेचैनी और भी व्यापक होगी, बेचैन तो मैं रहूँगा |
© Neeraj Pandey

Saturday, 20 December 2014

रंगीन बादलों के ख्वाब

बाग़ में खेलते हुए रंगीन बादलों को देख 
हैरान होता था वो। 
उडते पंछी आदर्श थे उसके,
वो छुना चाहता था आसमान,
गढ़ना चाहता था बादल। 

तरीका?  उसे पता कहाँ था । 

उसके सपनों से अनजान,
जीवन की ज़रूरतों ने बतलाया उसे 
कि ये पेड़ ऊपर तक जाता है। 

आसमान पाने की चाहत में, 
चढ़ता रहा वो उसी पेड़ पर,
पर ऊपर जाकर हैरान हुआ,
धोखा हुआ था उसके साथ,
छाला गया था वो ।
पेड़ की अपनी सीमाएं थीं, 
बंट जाता था वो शाखाओं में,
कुछ टूटी, पतली, निर्बल तो कुछ सूखी ।  

एक-एक पाँव संभलकर रखता है अब वो
ज़मीन पर गिरने के डर से, 
आसमान का स्वप्न तो कब का
जीवन बचाने के यत्न का शिकार हो चूका है |  

© Neeraj Pandey

Tuesday, 18 November 2014

पुर्ज़े

वो मशीन के हर पुर्ज़े को 
कसता है अक्सर बड़ी तरकीबों से ।  
पेंच चढ़ाता है । 
और एहसास दिलाता है उन्हें कि 
वो उस मशीन का एक हिस्सा हैं बस । 

पसंद किसी पुर्जे को नहीं
इस तरह से कसा जाना । 
अपना राग खोकर 
किसी और की धुन पर गाना । 

पर कहता है वो बिन कसे 
पुर्ज़े ठीक से काम नहीं करते।  

वो नहीं चाहता उनका अपना अस्तित्व  हो, 
वो नहीं चाहता कि पुर्ज़े बागी हो जायें । 

© Neeraj Pandey

Saturday, 15 November 2014

तुम्हारा खुदा

तो कहते हो तुम तुम्हारा खुदा है कोई |
हाँ...  देखा है मैंने उसे अक्सर अलग अलग अवतारों में,
तुम्हारी शक्ल पर दिखता है
और आदत बनकर साथ ही रहता है |
कभी तुम्हारी ज़रूरतों में,
तो कभी तुम्हारे डर में
उसे पनपते और बढ़ते हुए अक्सर देखा है मैनें |

तुम्हारे आँख, नाक, कान तो
सही ग़लत का स्वाद  नहीं चख पाते अब,
बस उसकी घंटी सुनकर
वक़्त बेवक़्त,
जय जयकार करने लगते हो तुम,
वो ही तुम्हारी
इन्द्रियों का इंद्र बन बैठा है अब |

देखा है मैंने उसे अक्सर अलग अलग अवतारों में
तुम्हारी शक्ल पर दिखता है वो
तुम्हारी आदत बनकर.

8 घंटों की नींद, बड़बड़ करता टीवी,
LIC की किश्त और बेतुके बयानों ने
तुम्हें इतना खोखला बना डाला है
की हर नयी शक्ल से परहेज़ होने लगा है तुम्हे,
एक जैसे सबके चेहरे तलाशते
तुम बन चुके हो एक बांझ सोच
और चपटी ज़ुबान के मालिक
जो जन्म लेने से पहले ही कहीं दफ़न हो चुकी है |

अपने आका की तरकीबों पर
कोई सवाल न उठाना
मूक बनकर मान लेने की फितरत 
ही तुम्हारे जीने का मूल मंत्र है|

कसाइयों की  हाँ में हाँ मिलाकर
तुमने कत्ल होने से बचाया खुद को
और बस बंधे हुए हो उसी कसाई खाने में
नैतिकता के नाम पर,
इसके अलावा कुछ और तो नहीं
जो खुद सा हो।

तुम्हे नथुने से पकड़ कर घसीटता
हर रोज़ दीखता है  मुझे
हाँ  मैने भी देखा है उसे अक्सर अलग अलग अवतारों मे,
तुम्हारी शक्ल पर दिखता है वो 

© Neeraj Pandey

Thursday, 16 October 2014

बुल्डोज़र



अपने किये पर शर्मिन्दा है शायद,
और आत्मग्लानि से भरा हुआ भी।
तभी तो अपना सर झुका
चुपचाप खड़ा है
मैदान के उस कोने में।
जिसकी छाती से सारे पेड़ उजाड़
खोदा था उसके गर्भ तक इसने
बाँझ बनाया था।

अब सरिया घुस रहा है
उस धरा के जिस्म में,
और कहने को सीमेंट के मसाले
भरे जा रहे हैं,
किसी मरहम के नाम पर।

जैसा कि
इक नींव बनाने की तैयारी हो रही है
जिसका अपनी नींव से कोई भी नाता नहीं।

जाने कितने ऐसे  मैदानों
की कोख को खोदा है इसने
जानें-अनजाने
बस अपने आक़ा की हवस की ख़ातिर

शायद इसी बात से दुखी ये बुल्डोज़र
सर झुकाकर इस धरा से
माँग रहा है माफ़ी,
कर रहा है पश्चाताप
अपनी हैवानियत का

सच है, इन्सानी दिमाग़ से बड़ा शैतान
और कोई भी नहीं ||


© Neeraj Pandey

Wednesday, 15 October 2014

लताएँ भी कभी पेड़ बनना चाहती थीं

उस नन्हें से बीज ने
अपनी एक पत्ती निकाल
पास ही के बड़े पेड़ को देखा,
हाथ हिलाकर 'हैलो' भी कहा
और उसने भी जवाब में
एक फूल गिरा
लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया

सपनों में था इसके
बिल्कुल वैसा ही बनना है,
घना, बड़ा, शानदार...

अपने जिस्म पर घोंसले रख
आशियाना देगा ये भी
किसी चिड़ीए के परिवार को...
या फिर अपनी छाँव से
कर देगा शीतल उस घर को
जहाँ उसे जन्म मिला है|

मासूम से सपने थे उसके
...और ज़रा उतावले भी,
तभी तो कुछ दिनों में ही
इतने पत्ते खोले थे इसने,

फिर जैसे-जैसे बड़ा हुआ
दुनियाँ देखी हर पत्ते से|

अपने ही बुजुर्गों को देखा
इमारतों की भेंट चढ़ते हुए,
देखा अपने चाचाओं को
जवानी में मरते हुए
वो साथी उसके जो हर शाम
हाथ हिला कर हाल-चाल
पूछ लेते थे,
उखाड़ फेंका था उनको किसी
बुलडोज़र ने चलते हुए

लाशें देखी थी उसने,
पड़ी हुई उन सड़कों पर,
चिथड़े होते जिस्म भी देखे
उम्र के थोड़ा बढ़ने पर
गुहार लगाई थी इसने
बहती तेज़ हवाओं में
रोया भी बारिश के साथ
छाले अब भी हैं निगाहों में|


दुनिया का रूप देख ये बच्चा
ताज़्ज़ुब कर रहा है,
अब ये बेचारा पौधा
बड़ा होने से डर रहा है|

कांपता है डर से थर थर अब ,
बड़े पेड़ से लिपट कर,
और... हमसे अपनी ज़िंदगी

कि मिन्नतें कर रहा है|


© Neeraj Pandey

Friday, 10 October 2014

रिश्ते

वो कूड़े वाला हर रोज़ सुबह आकर
ले जाता है हमारा कूड़ा,
वो कूड़ा जो हमारी अपनी पैदाइश है|
और हम भी अपनी नाक सिकोडते
डाल आते हैं इसे उसके ट्रक में


घर के बाहर, हर सड़क पर,
हर नुक्कड़ पर
मुलाकात होती है इन कूड़े के ढेरों से
पर बच बच के चलते हैं सभी
कि कहीं पाँव भी ना लग जाए|

और कोई यह बोलने को तैयार नहीं
कि पड़ोसी के घर के सामने
रक्खा कूड़ा उनका है,
वो कूड़ा जो कभी
उनके अपने सामान का हिस्सा था|

इंसानी फ़ितरत हर उस चीज़ को
कूड़ा घोषित कर देती है
जिससे उसका कोई मकसद सिद्ध नहीं होता|

©Neeraj Pandey

Wednesday, 1 October 2014

किताबें और घर

ये इतने सारे घर हैं?... ... या किताबें ?

ठीक ठीक कहना मुश्किल है. दोनों में बाहर कवर है और अंदर किरदार बसते हैं और हर दीवार किताब के पन्नों की तरह अपने ही अंदर छुपाए हुए है कई कहानियाँ. ड्रामा, ट्रॅजिडी, रोमॅन्स, कॉमेडी... इनकी तो शॉर्ट स्टोरी भी
लाइफ लॉंग चलती है. अलग अलग अध्यायों में| ये इतने सारे घर हैं या किताबें ठीक ठीक कहना मुश्किल है.


© Neeraj Pandey

बिछड़े साथी

वो चेहरे अब धुंधले से दिखते हैं मानों कोहरे में खड़ा हो कोई .
गौर से देखता हूँ पर ठीक से पहचान नहीं पाता| वक़्त ने उन यादों पर भी मानों धूल सी जमा दी हैं. ...अब चाहे अच्छे थे या बुरे बीती रात के सपने किसे याद रहते हैं.

© Neeraj Pandey

Monday, 29 September 2014

सिगरेट सा वीकएंड...

इतने सारे दिनों के बीच
कुछ सिगरेट सा मिलता है ये वीकएंड,
होठों से लगा, थोड़ी देर कश लेकर
अपने सीने के अंदर उतार लेता हूँ|

घुलकर बहता है जब धुंवा इसका
मेरे जिस्म की नाड़ीयों में
मीटा देता है थकान पूरे हफ्ते की,
थोड़ा सुरूर आ जाता है,
थोड़ा सुकून आ जाता है|

कई बार आधी पी कर बचा लेता हूँ
इसका दूसरा हिस्सा,
कि, कभी तलब के वक़्त काम आएगी|

कई बार कम पड़ जाती है
ये दो दिनों की सिगरेट भी,
शायद अब इसकी लत पड़ती जा रही है,
ये अब आदत बनती जा रही है|

कई बार ना चाहते हुए भी
बूझा देना पड़ता है, उसे गरदन से मरोड़ कर
पास की रखी ऐश ट्रे में,
कि मंडे का बुलावा आ गया
अब सब छोड़कर, काम पर लगना होगा
अगली सिगरेट के इंतज़ार में|

सिगरेट सा, बिल्कुल सिगरेट सा
मिलता है ये वीकेंड|

© Neeraj Pandey

Tuesday, 23 September 2014

एहसासों की पतंग.

बहोत देर से पड़ी थी कोने में ये चरखड़ी,
उठा कर बार, बार रख देता था.
अभी नहीं, अभी नहीं...

पतंग जो फट गई थी उड़ते उड़ते
रख दिया था उसे कोने में सहेज कर,
कुछ काग़ज़ों से चिपकाकर
कि कोई साथी आए,
कन्नी बाँधे और छत की दूसरी छोर तक ले जाकर
छोड़ दे हवा में इसे.

पर बेसबर सा मैं भी,
कहाँ चैन से बैठता
उड़ा दी अपनी पतंग,
तुम्हें दूर से ही देखकर.
खुली हवा में साँस लेने की कोशिश कर रही है अब ये,

अब थोड़ी ढील मैं छोड़ रहा हूँ.
थोड़ी हवा तुम उछालो,
कि एहसासों की इस पतंग को
नई उड़ान मुनासिब हो.

©Neeraj Pandey