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Monday, 16 July 2018

बुकोव्स्की और मेरे बीच

चार्ल्स बुकोव्स्की मुझे कितने पसंद हैं इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक वक़्त पर मैं सोचता था कि बूढ़ा होने पर बुकोव्स्की बनूँगा। पर हर रिश्ते की तरह मेरे और बुकोव्स्की के रिश्ते में भी कुछ उतार चढ़ाव आए। इसकी शुरुआत तब हुई जब मैंने उनकी कविता ‘So You Want to Become a Writer’ पढ़ी। अगर आपने वह कविता पढ़ी है तो आपको पता होगा कि यह कविता सिर्फ़ लिखने की बात करती है, बिना किसी और प्रलोभन के। मुझे इससे एतराज़ इस बात का था कि फिर एक नया लड़का जो मुझ जैसा है, जो सीखना चाहता है लेखन को, वो क्या करे? क्या यही सोच कर बैठा रहे कि जब ‘फ़ील’ आएगी या ‘मूड’ बनेगा तब लिखूँगा। शायद एक दो बार मूड में आकर कुछ लिख दिया जाए पर जब रोज़ लिखना होगा, काम की तरह, तब? इस बात को लेकर मेरी बुकोव्स्की से एक लम्बे वक़्त तक नाराज़गी रही है। मैं इस कविता में उन्हें हारता हुआ देखना चाहता था। कई और वजहों के साथ साथ मेरा शराब पीना पूरी तरह बंद कर देने की एक वजह यह भी थी कि मैं बिना किसी के इन्फ़्लूयन्स को बहाना बनाए लिखना चाहता था। देखना चाहता था कि इसके बिना क्या होता है? क्योंकि मेरे आसपास एक ऐसी भीड़ भी दिखी जो ख़ाली इस बात पर शराब पिए जा रही थी कि बुकोव्स्की भी पीते थे, और वो बहुत बढ़िया लेखक थे। आख़िर अच्छे लेखन का रास्ता शराब, चरस और दुःख-दर्द से होकर ही तो जाता है। मैं इस वजह से भी बुकोव्स्की से नाराज़ था। फिर सोचा क्यूँ ना उसे ज़रा और बेहतर तरीक़े से जाना जाए। आख़िर प्यार तो दादाजी से है ही मुझे।


पिछले महीने बुकोव्स्की की ‘On Writing’ पढ़ना शुरू किया। यह किताब उनके पत्राचार की किताब है। 1945 से लेकर 1993 तक के सारे पत्र हैं इसमें जो बुकोव्स्की ने अपने लेखक और दोस्तों को लिखे थे। इनको पढ़कर ऐसा लगता है जैसे बुकोव्स्की से उनके बग़ल में बैठ कर बातचीत हो रही हो। वहीं उनके टाइपराइटर के पास। यह किताब पढ़ते उनकी कविता ‘So You Want to Become a Writer’ की नींव समझ में आ ही गयी। पहली बात यह कि बुकोव्स्की कभी ‘Professional Writer’ नहीं बनना चाहते थे। मेरी और बुकोव्स्की की आधी लड़ाई तो यहीं ख़त्म हो जाती है, क्योंकि मेरा सफ़र भी उनसे अलग है। अपने पोस्ट ऑफ़िस के काम से बोर हो चुके बुकोव्स्की ने लिखने को अपना ज़रिया बनाया जहाँ वो ख़ुद को व्यक्त करने के लिए कहानी और कविताएँ लिखने लगे। अपने डिप्रेशन की वजह से लगातार पीते रहते और जब जो दिल में आता लिखते। एक जगह वो लिखते हैं कि शायद उन्हें लिखने से ज़्यादा टाइपराइटर की आवाज़ पसंद है। जब पन्ने पर एक एक शब्द मिल कर एक लाइन बनाते हैं वो बहुत ही सुंदर एहसास होता उन्हें।
Lafayette Young को लिखे एक पत्र में वो हेमिंवे के बारे में लिखते हैं “…But Popeye knew when to move. So did Hemingway, until he started talking about ‘discipline.’ ”। इसे और इसके बाद के कई सारे पत्रों को पढ़ने पर साफ़ साफ़ समझ आता है कि बुकोव्स्की को किसी भी तरह के लेखन से जुड़े नियमों ये दिक़्क़त थी। William Packard को लिखे एक लम्बे लेटर में वह लिखते हैं “NOW THEY TEACH POETRY. THEY TEACH HOW TO WRITE POETRY. Where did they get the idea that they ever knew anything about it? This is mystery to me. How did they get so wise so fast and so dumb so fast?” लिखना बुकोव्स्की के लिए सिगरेट पीने जैसा था। तलब लगी और हो गए शुरू। पर कुछ ही पन्नों बाद उन्होंने अपने पत्रों में ‘राइटर्स ब्लॉक’ से जूझने की भी बात की और लिखा है कि ‘…but writing takes discipline like everything else. The hours go by very fast, and even when I’m not writing, I’m jelling, and that’s why I don’t like people around bringing me beer and chatting.- I can understand why Hemingway needed his bull ring. It was quick action trip to rest his sights…’
आज बुकोव्स्की की पॉप्युलैरिटी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग चाहे बुकोव्स्की को पढ़े या ना पढ़ें उनके बारे में महफ़िलों में बात ज़रूर करते हैं। पर क्या बुकोव्स्की ने कभी ऐसे मशहूर होना चाहा था? उनके पत्रों को पढ़कर इसका जवाब ‘ना’ में ही आता है। एक जगह वो लिखते हैं ‘The process of writing is reward in itself’. बुकोव्स्की को इस बात की ख़ुशी है कि वो अपनी जवानी के दिनों में अपने काम के लिए नहीं जाने गए। और इसी वजह से वो लगातार काम कर पाए। जबकि बाक़ी के लेखक जिनको बहुत जल्दी प्रसिद्धि मिली, उन्होंने लिखने के अलावा बाक़ी की हर तरह की बात में अपना वक़्त ज़ाया किया। बुकोव्स्की के बारे में इतना क़रीब से पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने ‘So you want to become a writer’ क्यूँ लिखी। उन्हें भी ख़ुद से वही सारी शिकायतें हैं जो मुझे उनसे हैं। यहाँ आकर हमारे बीच का मनमुटाव थोड़ा कम होता है।
बुकोव्स्की को अपने लेखनकाल में बहुत सारी रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। एक पब्लिशर दोस्त को बुकोव्स्की लिखते हैं ‘मैं आजकल कहानियाँ नहीं लिख पा रहा हूँ, वो आ ही नहीं रहीं। और यह भी जानता हूँ कि कविताएँ लिखकर मैं रेंट तक नहीं दे पाउँगा।’ बुकोव्स्की ख़ुद को कभी भी महान लेखक नहीं मानते पर उन्होंने अपने वक़्त में कला और कविता के नाम पर हो रहे छिछोरेपन पर खुलकर कठोर शब्दों में लिखा। बुकोव्स्की का लेखन ईमानदार था।
एक लेखक के तौर पर बुकोव्स्की की बहुत सी बातें मुझे समझ में आती हैं और पर मैं सबके साथ सहमति नहीं रख सकता क्योंकि उनका वक़्त और तरीक़ा कुछ और था। एक और बात जो मैं कभी बुकोव्स्की से मिलता तो ज़रूर पूछता कि ‘कला और दुःख का क्या कनेक्शन है भाई? हिंदुस्तान का युवा दुःख तलाशने में मरा जा रहा है कि उससे इसके बिना कला नहीं हो पा रही। कलम उठाने से पहले आदमी यहाँ लम्बा कुर्ता और चरस का बंदोबस्त करने लगता है। बुकोव्स्की बाबा आप इसपर क्या बोलते हो?’ यह पूछने के लिए बुकोव्स्की से बेहतर आदमी नहीं हो सकता क्योंकि वो आदमी लगातार डिप्रेस्ड था, लगातार पिये जा रहा था और लगातार लिखे जा रहा था। बुकोव्स्की 6 नवम्बर 1988 को Carl Weissner को लिखे गए पत्र में इसपर साफ़ साफ़ लिखते हैं “I’d much rather prefer to write from a happy state of mind and do so when that rare and lucky bit arrives. I don’t believe in pain as a pusher of art. We can breathe without it. If it will let us.”
बुकोव्स्की की इस किताब से जो बात मैं समझ पाया वो बस इतनी सी है कि आपका रास्ता चाहे जो भी हो एक लेखक के तौर पर ईमानदार होना पहली शर्त है। हम समाज का आइना होने की बात करते हैं पर क्या हम ख़ुद का आइना बन पाते हैं? क्या हम चरस या शराब पीते हुए इतने ईमानदार हो सकते हैं कि हम यह कह पाएँ कि ‘ये तो मैं इसलिए कर रहा हूँ कि मुझे ये करने में मज़ा आता है। मेरे लेखन का इससे कोई लेना देना नहीं।’ यह काम बुकोव्स्की ने अपने जीवन में लगातार किया है। अगर हम (मेरे जैसे और भी लेखक) बुकोव्स्की को एक मानक मानते हैं या उनसे प्रभावित हैं तो हमें उनसे अपने प्रति ईमानदारी सीखनी होगी। लेखन के आसपास रचे सारे आडंबरों को स्वाहा करना होगा और बस लिखना होगा। चाहे फ़ील आए या ना आए। क्योंकि चाह हम सबको प्रफ़ेशनल लेखक बनने की ही है।

और आख़िरी बात बुकोव्स्की के लिए लिखना कभी काम नहीं था। लिखना प्यार था उनके लिए। बुकोव्स्की शब्दों और उनसे बनते वाक्य के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे अपनी आँखों के सामने अपने बच्चे को बड़ा होते देख रहे हों। उनके सारे पत्र पढ़ कर इस बात का एहसास होता है कि शायद हम कभी अपने लेखन से उतना प्यार ना कर पाएँ जितना उन्होंने किया। क्योंकि हम बस लिखने के लिए ना तो लिखते हैं और ना ही पीने के लिए बस पीते हैं। हमें दोनों तरफ़ ईमानदार होने की ज़रूरत है।


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Tuesday, 6 March 2018

मुझे बारिश का इंतज़ार है


यह जो अभी लिखना शुरू किया है पहले भी लिख सकता था। अगर ढंग से देखें तो सब कुछ बंद कर के बस लिखना ही तो था। पर नहीं, इस बारे में सोचते हुए दो दिन निकल गए। जिस वक़्त इसे लिखने की ज़रूरत महसूस हुई उस वक़्त मैं सेट पर था। थोड़ा बहुत मोबाइल में लिखना शुरू ही किया था कि मेरा सीन शूट होने लगा। पूरे दिन काम किया और क्या डिमांडिंग शूट था यह। तेज़ गर्मी और कड़क धूप। ख़ैर शूट अच्छा रहा और मज़ा तो आया ही। सेट पर वैनिटी का AC, बाहर की कड़क गर्मी और धूप को मिला कर आज शाम ही सर्दी ने जन्म लिया है। बग़ल में नाक पोछने के लिए रुमाल रखा हुआ है और बाक़ी दिन के सारे काम निबटाकर या कहें तो छोड़ कर मैं इसे लिखने बैठ गया हूँ। इतना लिख लेने पर यह ख़याल आया कि सच में इसके लिए बस इतना ही तो करना था। धत्, ना चाहते हुए भी आदतन हाथ मोबाइल तक पहुँच ही गया।
दरअसल बात यह है कि मुंबई की गर्मी के इस मौसम में मुझे बारिश का इंतज़ार है। पिछले कुछ दस दिनों से मैं बारिश का इंतज़ार कर रहा हूँ। लगातार होने वाली नहीं, थोड़ी देर होकर आस पड़ोस के लैंड्स्केप को बदल देने वाली बारिश। ऐसा क्या है कि मुझे बारिश का इंतज़ार है? मुझे एक बात समझ आयी। दरअसल मुंबई में बारिश का होना मेरे मुंबई आने के पहले दिन से जुड़ा हुआ है। मुंबई से मेरी पहली पहचान से।  १२ June 2015 को मैं पहली बार मुंबई आया था। हाँ पहली बार... उससे पहले मैंने मुंबई सिर्फ़ क़िस्से-कहानियों और फ़िल्मों में देखा था। उस दिन सब कुछ ही नया था, मुंबई का रूप रंग, फ़िल्मस्टार्स की होर्डिंग्स, बिल्डिंग, सड़कें... सब कुछ ऐसा था जैसे किसी अपरिचित से मैं पहली बार मिल रहा हूँ। मुझे पता था उससे थोड़ी देर बाद बात होगी पर अभी तो शुरुआत की कुछ झिझक थी ही। स्टेशन से ऑटो लेकर शहर देखता हुआ मैं कांदीवली पहुँचा। कांदीवली का घर जो कि मेरे दोस्त गौरव ने दो हफ़्ता पहले आकर लिया था वो भी मेरी कल्पना से अलग था। तंग जगहों के क़िस्सों की मुंबई में यह घर बड़ा था। सिर्फ़ ख़ुद में ही बड़ा नहीं पर अब तक के दिल्ली और बैंगलोर के सारे घरों से बड़ा। मैं अभी भी उसी मकान में रहता हूँ, मेरे दोस्त मज़ाक़ में कहते हैं कि ‘मुंबई में कहीं जगह है तो तुम्हारे घर में।’ मेरे मकान मालिक काफ़ी नेक़ इंसान हैं। उस रात हम दोस्त (मेरा एक दोस्त अमित सिंह भी पहले से अपनी वाइफ़ पारुल के साथ मौजूद था) मुंबई घूमने निकले। 'वाह! नया शहर'। नज़रें रह रह कर किसी सिलेब्रिटी को ढूँढ रही थीं। गेट वे पर TVF में काम करने वाला इंटर्नेट सिलेब्रिटी दिखा भी। मैं जान लेना चाहता था कि जब ये शहर मुझसे बातचीत शुरू करेगा तो क्या कहेगा? क्या मेरी बात सुनेगा ये शहर? या फिर मेरी बातें इसे कैसी लगेंगी? अभी सोचता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे इस शहर को मेरे लिए ही शायद बारिश ने उसदिन धो दिया था। नयी गलियों और लोगों से होते हुए मैं मुंबई को देख रहा था कि कैसे शुरू करूँ इससे बात करना?

अगले दिन वरुण(ग्रोवर) भाई का एक शो था कैन्वस लाफ़ क्लब में, उसके लिए मुझे उन्होंने इन्वाइट किया। तारीख़ थी १३ जून, २०१५। शो के बाद हम दोनों को लोवर परेल से लोकल लेनी थी। रात के कुछ ११ या १२ बज चुके थे। प्लैट्फ़ॉर्म पर लोकल आकर रुकी, डब्बे में अंदर कुछ १०-१२ लोग ही थे। मैं आगे खड़ा था और मेरे पीछे वरुण। मैंने एक पैर हवा में उठाया कि मैं डब्बे में चढ़ जाऊँ पर वो पैर तब तक हवा में ही रहा जब तक वरुण ने टोका नहीं कि 'क्या हुआ चढ़ो अंदर'। मैं चढ़ गया और हम दोनों बातें करते हुए कांदीवली तक आए। मेरी लोकल में फट्ट कर के ना चढ़ने की झिझक उससे पहचान ना होने की ही थी क्योंकि उसके बाद कभी ऐसा नहीं हुआ। अब तो लोकल ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुकी है।

शुरू के एक साल अलग अलग जगहों पर मैं गूगल मैप देखकर जाता था, अलग अलग ठिकानों पर। शहर की कई सारी जगहें मैंने किसी बिंदू की तरह ढूँढी है। नयी जगह पर जाना कुछ नया मिल जाने सा था। मुंबई आकर ही मुझे समझ आय कि  मुझे रंग और काँच के सामान बहुत पसंद हैं। मेरी सारी पसंदीदा जगहें मुझे एक छोटा सा मेले सी लगती थीं। अब शहर के क़रीब क़रीब हर वेन्यू से पहचान हो गयी है। वहाँ पर्फ़ॉर्म भी कर लिया है। अब जब वापस उन्हीं जगहों पर बार बार जाना होता है तो रास्ते समझ आते हैं मैं उन सारे बिंदुओं को जोड़ कर अपने दिमाग़ में एक रास्ता बना पाता हूँ। जो लोग अब रास्ता पूछते है उनको बता देता हूँ और फिर सोचता हूँ यह कैसे हो गया धीरे धीरे। इस शहर से इतनी जान पहचान हो गई। कभी कहीं यूँ ही घूमते हुए दोस्त मिल जाते हैं और फ़ेसबुक वाले दोस्त भी, तो लगता है कि  शहर अपना सा है। पर इसी बीच एक बात हुई है कि भटकना कम हो गया है। भटकने में कुछ मिल जाना आश्चर्य है। वो आश्चर्य धुँधले हो रहे हैं। उनकी जगह नए आश्चर्यों ने ले ली है। बारिश को आने में भी अभी तीन महीने हैं। बैंगलोर में दोस्तों के साथ रात में घूमना और सुंदर भविष्य के सपने भी भटकना था। मुझे उस भटकने की जगह रखनी पड़ेगी अपने अंदर यह समझ आ रहा है। उस भटकाव ने साहित्य और सिनेमा के नए दरवाज़े खोले थे। वहाँ से एक रस निकल आत था। चाय से भी पहले वाला स्वाद ग़ायब है, कभी चीनी ज़्यादा हो जाती है तो कभी चायपत्ती... पर मुझे यक़ीन है एक हल्की बारिश के साथ सब वापस आ जाएगा। पूरी तरह से नहीं पर टूकड़ों में ही। जैसे सिगरेट पीने वाले दिनभर टूकड़ों में अपना सुकून ढूँढते हैं मैं वो बारिश में ढूँढ रहा हूँ। हल्का ठंडा मौसम, चाय, किताबें और काग़ज़ पर उतरता हुआ मनचलापन।

मुंबई में अभी तो बारिश मुमकिन नहीं इसीलिए अगले हफ़्ते देहरादून जा रहा हूँ कुछ दोस्तों के साथ। बारिश ना सही पहाड़ ही सही। होटल भी रस्किन बॉंड के घर के बग़ल में बुक किया है। वहाँ जाकर भटकेंगे थोड़ी देर।  ख़ैर घड़ी १२ बजकर ११ मिनट का वक़्त बता रही है। सड़कें ख़ाली होंगी और मौसम में रात की एक ताज़गी। सोच रहा हूँ थोड़ी देर भटक आऊँ। मम्मी पूछेंगी कि सर्दी हुई पड़ी है तुम्हें और इतनी रात में घूमने निकल रहे हो? पर अब ठीक है उनको समझ आ जाएगा। वैसे भी भटकने के बाद अक्सर नींद अच्छी आती है।


Friday, 29 December 2017

आश्चर्य का टुकड़ा

जीवन के आश्चर्य इतने सूक्ष्म है कि अगर रोज़मर्रा की जिंदगी में ज़रा सा रुका कर इनपर गौर ना करें तो वो गायब हो जाएँ। ये सारे आश्चर्य हमारे आसपास ही रह रह कर पनपते रहते हैं।

कल रात बांद्रा में शो था| अक्सर शो के बाद घर लौटते हुए लेट हो जाता हूँ| घर पहुँचते पहुँचते बारह बज जाना अब एक आम बात हो गई है| आज कल निधि (मेरी छोटी बहन) भी पूना गई हुई है तो वापस लौटने पर घर पर कोई नहीं था| दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोल कर घुसना पड़ा| आज अपने कमरे में पहुँचते ही ट्यूबलाइट जलाई और फिर तीन सेकंड के अंदर झट कर के बंद कर दी| अभी कमरे में बाहर से आने वाली हल्की हल्की रोशनी मुझे ठीक लग रही थी| मेरे कमरे में एक बड़ी सी खिड़की है जो स्लाइड कर के खुलती है। अगर परदों को किनारे कर दिया जाए तो आस पास की बिल्डिंगों से इतनी रोशनी कमरे में आ जाती है कि किताब पढ़ना छोड़ कर बाकी  के काम किए जा सकते हैं। मैंने ट्यूबलाइट बंद कर दी।

थोड़ी देर में हाथ मुँह धोने के बाद मैं अपने बिस्तर पर पीठ को तकिये से टेक लगा कर बैठ गया...बाहर की तरफ़ झाँकता हुआ| मेरी खिड़की पर सफ़ेद पर्दा हल्का हल्का हिल रहा था| इसके हिलने के साथ ही थोड़ी और रोशनी कमरे के अन्दर आती हुई मेरे पैरों पर पड़ रही थी| आस पास सब शांत था। धीरे धीरे पूरे दिन की थकान को आराम मिलने लगा और जो ख़याल पूरे दिन इधर उधर  भागते रहते हैं अपनी जगह बनाने लगे।

ऐसे ही ख़यालों के जगह बनाने के क्षण में अचानक मुझे 'आश्चर्य' दिखा| हाँ आश्चर्य... मेरी खिड़की पर लटकता हुआ सफ़ेद पर्दा| हाँ वो आश्चर्य है। उसको देखकर मैं थोड़ी देर उसे ही देखता रहा और एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर फैल गई| यह आश्चर्य ही था| मैंने फिर नज़र घुमा कर पूरे कमरे को देखा... वाह! कमाल है| 'आश्चर्य पूरे कमरे में बिख़रा हुआ है...' मैंने ख़ुद से बात की और ख़ुद से ही स्वीकृति भी दे दी। 

यह आश्चर्य इसलिए था कि मुझे पता भी नहीं चला और मैं अपनी उस दुनिया के अन्दर था जिसकी मैंने कभी कल्पना मात्र की थी। दरअसल बात ऐसी है कि १०१३- २०१५ तक बैंगलोर में अपने एक दोस्त और बहन के साथ एक छोटे से घर में रहते हुए जब मैं एक बार नींद से उठा तो अचानक अपने सामने बड़े सामान का ढेर पाया| घर भरा हुआ था। दो (दरअसल डेढ़) छोटे छोटे कमरों में घर के तीन लोगों का कम सामान भी बहुत ज़्यादा लगता था। ऐसा लगता था कि मेरे ख़याल उन सामानों से टकराकर कमरे की फ़र्श पर गिर रहे हो। उनके लिए घर में जगह ही नहीं थी ऐसा लगता था। मुझे याद है, ऐसा ख़याल आने के बाद ही मैंने दो पन्नों पर इसके बारे में लिखा भी था और लिखते हुए सोचा था कि कभी शायद मेरा एक कमरा होगा जो एकदम ख़ाली होगा। उसमें मेरे ख़याल किसी चीज़ से टकराकर गिरेंगे नहीं। मैं उसकी दीवारें सफ़ेद रखूँगा, कमरे में सामान एकदम कम होगा, एक लम्बी खिड़की होगी दीवार के साइज़ की जिसको स्लाइड कर के खोला जा सकता होगा (मैं कभी रात में बैठ कर उसपर चाय पियूँगा), और खिड़की पर जो परदे होंगे वो भी सफ़ेद होंगे। गुलज़ार साब भी शायद इसीलिए हमेशा सफ़ेद पजामे-कुर्ते में दिखते हैं शायद। उन्हें भी ऐसा लगता होगा शायद... पर ये सब कब और कैसे होगा इसका मुझे बिल्कुल पता नहीं था। बस बैठे बैठे सोच लिया था और सोचने में कोई पैसे थोड़े ही लगते हैं। 

पर अभी इस क्षण में जब मैं अपने कमरे में बैठा हूँ मैं वही तो जी रहा हूँ। मैं उस ख़याल की हक़ीक़त में बैठा हुआ हूँ जो कभी यूँ ही सोच लिया था। वो मेरे जीवन में कब का घट  चुका था जिसे मैंने आज देखा है। यह आश्चर्य ही तो है। मैं ख़ुद ही ख़ुद में मुस्कुरा दिया। होंठों के विस्तार ने ख़ुशी का विस्तार किया और कमरे की रोशनी के साथ साथ अंदर भी एक रोशनी उतर गई और मन ही मन मैंने कहा कि 'यार 'आश्चर्य' होते तो हैं, पर बड़े सूक्ष्म। जिन्हें रुककर ना देखो तो घट कर निकल जाते हैं। यह सोचते हुए मैंने खिड़की का सफ़ेद पर्दा पूरी तरह से एक तरफ़ किया, खिड़की को स्लाइड किया, कमरे के अंदर हल्की ठंडी हवा और आने लगी... कुछ सेकेंड वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं किचन की तरफ़ बढ़  गया, चाय बनाने। अपने आश्चर्य के दूसरे हिस्से को थोड़ा और जीने...

Tuesday, 7 February 2017

बिखरे पन्नों से: भाग २

कई दिनों का सोया वो फिर से जाग गया जैसे अधकची नींद में था. झट कर के ऐसे उसने अपनी उपस्थिति दर्ज की जैसे वो कभी सोया था ही नहीं. वो एक घाव सा था, जिसे फिर से छेड़ दिया गया हो... बहता हुआ घाव, बज्ज कर के फूटता हुआ... जैसे एक लकीर सा खून फूटता हुआ बह पड़ता है, बिल्कुल वैसे. उसने उसे छूकर देखने की कोशिश की पर छू नहीं सका, वो उसकी नज़रों से गायब हो चुका था पर उसकी टीस अभी भी वैसे ही मौजूद थी.

उसने उसके आसपास दीवारें बांध रखीं हैं... उन्हीं का एक ईंट निकल आया हो जैसे और कोई शीतलहर अन्दर तक अपने पूरे दबाव के साथ घुस रही हो, सायं सायं करते और शरीर छेद कर हड्डियों तक पहुँच रही हो. उसमे कट-कटाते दांत जोर से भींच लिए थे. वो खड़ा था वहीँ और इंतज़ार कर रहा था इसके गुज़र जाने का... पर कब तक.

हैरानी की बात यह थी कि इसे हुए, घटे, गुज़रे एक वक़्त होने को है, पर अभी अभी यह अचानक ऐसे कौंध गया जैसे अभी भी वहीँ कहीं छिपा हो. इस कौंधने वाली टीस से उसे हिला कर रख दिया था. उसने टीस के चेहरे पर गौर से देखा जैसे उसका सच देखने की कोशिश करता हो... वह सोचने लगा “मुझे सच्चाई कुछ और दिखती है. जानता हूँ वो वैसा नहीं जैसा दिखता है, या फिर वो वैसा ही है जैसा दिखता है...पर मैं ही उसे वैसा नहीं देख पाता? मैं अपनी कल्पना में ही रहता हूँ क्या? क्या मैं हमेशा अपनी कल्पना में ही था? क्या कल्पना और सच में भेद नहीं कर पाता? क्या हम सच और कल्पना को किसी सूप में फटककर अलग अलग नहीं कर सकते? कि ये रही कल्पना और ये रहा सच. जीवन कितना सरल हो जाता...पर शायद नहीं, पता नहीं ”

अब हर बार उसे देखते हुए जब सच दिखता है तो वो अपनी कल्पना की एक लकड़ी तोड़कर व्यावहारिकता की आग में डाल देता है, हर बार... बार बार... वो धूं धूं कर के जल उठती हैं. ये वो लकड़ियाँ हैं जिनसे वो अपना घर बना सकता था. जिन्हें उसने एक सुखद भविष्य की कल्पना करते हुए इक्कठा किया था. अब जलते हुए इनके पोरों के जलने पर चट्ट चट्ट की आवाज़ आती है. उनकी जलने की चट्ट की आवाज़ उसके अन्दर भी टूटती है. उस लकड़ी के जल जाने के बाद भी देर तक इनका धुँआ दूर ऊँचाई तक उठता दिखता है. उसके धुएँ में गुज़रे वक़्त की ख़ुशबू है, जो इसे बार बार जगाती है. वो कब ख़त्म होगा? शायद आखिरी लकड़ी के टूटकर पूरी तरह जलने तक. उस आखिरी लकड़ी के जलने में भी जाने कितनी चट्ट चट्ट की आवाज़ें और जाने कितना धुँआ शामिल होगा, वो सब उसे वहीँ खड़े रहकर सुनना होगा, देखना होगा और जीना होगा. पर अभी...  उसे भी पता नहीं ऐसी कितनी लकड़ियाँ अभी भी उसके पास जिंदा बाकी पड़ी हैं...


Monday, 15 August 2016

बिखरे पन्नों से: भाग १

खुद को जानना कई मायनों में खुद से ही एक लड़ाई है. जिसे हम ‘जिया जा चुका’ कहते हैं वो दरअसल काफी वक़्त तक साथ चलता है. खुद से होकर गुज़रे हुए वक़्त का काफी हिस्सा अन्दर पड़ा रहता है... हम हर क्षण कुछ और होते हुए, कुछ और हो रहे होते हैं. जीवन के अलग अलग चरणों को पलट कर देखूँ तो खुद के बारे में यह कह सकता हूँ कि मैंने अलग अलग दृष्टिकोणों और अनुभवों को जिया है. यह सिर्फ अलग अलग वक़्त पर बन जाने वाला अलग अलग किरदार नहीं है, यह वो है जो बीत चुका है और वह भी है जो कल आने वाला है. किस पड़ाव से कितना चला जा चुका है और अभी और कितना चला जाना है कह पाना मुश्किल है. इसी बीते हुए और आने वाले के बीच मैं खुद को बस चलता हुआ पाता हूँ. एक ऐसे मिट्टी के लोदे की तरह जिसे एक मुर्ति से तोड़ कर निकाला गया हो और उसी से दूसरी मुर्ति बनाने की तैयारी हो रही है. पर मैं इस वक़्त दोनों में से कोई भी मूर्ति नहीं हूँ...मैं वह सना हुआ मिट्टी का लोदा हूँ जिसे वक़्त अभी सान रहा है.

जो जिया जा चुका है उसमें बहुत कुछ सहना भी शामिल है पर सहन कर जाना हमें मजबूत नहीं बनाता हाँ सचेत ज़रूर कर सकता है... हमें वो आँखे दे देता है देखने के लिए कि “देख लो ये भी है.” और फिर हम खुद से खुद के लिए शातिर बनने का अभिनय करते हैं दरअसल हम डरे हुए हैं, हम जीवन को सहना नहीं, जीना चाहते हैं. और यही जी लेने की इच्छा हमें हमेशा सचेत करती रहती है. जिसका शिकार होता है वो जो अभी जिया जाना बाकी है.

पर इन सबमें जो एक खूबसूरत बात है वो ये कि मैंने हर बार अपने ‘जिए जाने वाले’ से ‘जिए जा चुके’ शातिर और डरे हुए व्यक्ति को हारता हुआ देखता हूँ. हर बार जीवन मुझे जीवन बन कर ही मिलता है और मेरे पूर्वाग्रहों को तोड़ता है. जीवन जो बढ़ा जा रहा है उसे हर बार, यह बात सुकून देती है कि उसके बुरे अनुभवों की हार हुई है, जीवन वहाँ से कब का आगे निकल चुका है. यह इस बात की तसल्ली है कि जो वक़्त का मेहमान है उसे वो सब कुछ फिर से नहीं सहना होगा. हाथ का एक बार जलना या दस बार दोनों ही उतने ही दुखद हैं. इस हार पर पेट में एक फ़व्वारा फूटता है जो अपनी ही हार का जश्न मनाने जैसा है और खुद से सवाल भी कि जो हम जी चुके हैं उसके आगे कितना कुछ है जो हमारा इंतज़ार कर रहा है, जो अभी जीया जाना बाकी है. धीरे धीरे मेरे पूर्वाग्रह टूट रहे हैं, जीवन दिख रहा है, मुझे इस सन रही मिट्टी से बनने वाली नई मुर्ति का इंतज़ार है...

Sunday, 17 July 2016

जीवन की नोख़ पर

अभी नज़र घुमा कर आस पास देखा. मेरी कॉफ़ी का मग., पानी की बोतल, डायरियाँ, मेरी लिखने की टेबल, मेरा घर, कमरा, कहानियाँ, कविताएँ. सब कुछ ऐसा ही है जैसा थोड़ी देर पहले था. सब कुछ बिल्कुल वैसा ही पर कुछ बदला था.अचानक...

पूरे दिन में एक ऐसा पल आता है जब मैं एक अनजान सी ख़ुशी से भर जाता हूँ. अलसा कर चलता हुआ दिन एक बिंदु पर आकर सुख की नोख़ बन जाता है जहाँ से टप-टप कर के लगातार सुख चूता है, ख़ुशी चूती है. अभी ऐसी ही नोख के नीचे बैठा हूँ, तो मुझे लगा कि इसको लिख लेना चाहिए. आजकल पिछले एक हफ्ते से एक 'नई' कहानी पर काम कर रहा हूँ. नई पर ज़ोर इसलिए है भी कि जैसा या जो मैं लिखता हूँ उससे काफी अलग है ये. इस पर खूब सारी रिसर्च और कल्पना की एक कसी हुई उड़ान की ज़रुरत है. कहानी का ना लिखा जाना या ना लिख पाना एक थका देने वाला है, इससे उलट लगातार लिखते रहना किसी भाप भरे इंजन का छुक-छुक कर के चलते रहना. पर ऐसे ही अलसाए हुए थकान भरे दिन में ली हुई झपकियों में भी इसके पात्र आपस में बात करते रहते हैं, अपना रास्ता ढूंढते रहते हैं और मुझे आलस को बीच से तोड़ तोड़ कर अपने मोबाइल में ही इनके संवाद और मनस्थिति रिकॉर्ड करने पर मजबूर करते हैं. दूसरी तरफ अलग अलग किताबों की अपनी अलग दुनिया है जो मेरी छोटी से लाइब्रेरी (यह लिखते हुए मुझे बहुत ही अच्छा सा लगा, शायद इसलिए कि यह होना मेरा सपना) से झांकती रहती है. दुनिया में कितना कुछ है पढने के लिए, उस कितने कुछ में से एक ज़रा सा कुछ मैंने अपने पास रखा है जिसे मैं जल्द से जल्द पढ़ लेना चाहता हूँ. इसकी सोच भी एक सुकून एक से भर देने वाली है शायद यह सबकुछ जो आस पास चल रहा है या जो घट चुका है शायद उसमें अपनी परछाई ढूंढ लेने का सुकून है.



आज कल इस नई कहानी की रिसर्च के सिलसिले में जब भी ऑनलाइन आकर थोड़ी रिसर्च करता हूँ तो इस 'कितना कुछ पढने' में बहुत कुछ नया जुड़ जाता है साथ ही दूसरी तरफ कविताओं का दौर है. जो मुझे अपनी तरफ खींच लेता है. यह सब कुछ एक साथ करने की इच्छा के फैलाव में इतना नुकीलापन है कि यह एक तरह का सुख देता है, जिससे में बैठे बैठे ही भरने लगता हूँ. इस सुख को जो ख़ुशी है मैंने पहले भी कई बार महसूस किया है पर इस तरह से लिखा कभी नहीं... आज लिख रहा हूँ. हमने अपने सुखों को कितना कम लिखा है, जीवन को जीवित समझकर कितना कम जिया है. जीवन को इस नोख पर कितना कम जिया है.

Friday, 8 January 2016

वे वहीँ ठीक हैं...

(३ जनवरी की रात, जो लिखते-लिखते ४ की हो गई थी. मुंबई)

बिस्तर के सामने लगे ड्रेसिंग टेबल के पास दो बार जाकर उसपर रखी किताबों को कहीं और रखने की नाकाम कोशिश कर चुका हूँ| दो डायरियाँ, कर्णकविता, प्रेमचंद, परसाई साब, रोबर्ट एम. पिरसिग, कालिदास, ओशो एक के ऊपर एक रखे हुए हैं और इन सबके ऊपर ग़ालिब अपने दीवान के साथ वहीँ बैठे मुझे टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं| पर मुझे पता है मैं आज रात इनमें से किसी को हाथ नहीं लगाने वाला| अभी ये लिख रहा हूँ और पढ़ने का आज का कोटा विनोद कुमार शुक्ल जी ने पूरा कर ही दिया है| इसके बाद बस सोना ही बचता है (अगर नींद आ जाए तो )|

दरअसल किताबों को ऐसे बेवजह साथ में रखने की आदत बचपन से है| स्कूल जाते हुए भी बैग भर के किताबें ले जाने की आदत थी| चाहे उस किताब का उस दिन स्कूल के रूटीन से कोई लेना देना हो ना हो मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था| "भई किताबें हैं तो ले जाएँगे"| पर मैंने ये वाली बात कभी बैग को बताई नहीं और ना ही कभी ये सोचा कि एक बार उससे पूछ लूँ कि “भाई तुझे कैसा लगता है एक साथ इतनी सारी किताबें उठा के?” पर गलती मेरी भी कहाँ थी, उस वक़्त कम ज़्यादा जैसा कोई कॉन्सेप्ट दिमाग में था ही नहीं। तब तो जो मन में आया- किया, जितना मन में आया- उतना किया। ना उससे कम और ना उससे ज़्यादा। पर एक दिन जब बैग ने अपनी साइड की सिलाई खोलकर मानहानि का दावा पेश किया तब मुझे उसकी फीलिंग्स का थोड़ा आईडिया हुआ, वो भी मम्मी के बताने पर| उसी दिन शाम को बैग की सिलाई के साथ मुझे भी बिठकर ठीक किया गया और ये तय हुआ कि अब से मैं बस उतनी ही किताबें ले जाया करूँ जितने की मुझे दरअसल ज़रुरत है|


अगले दिन सुबह उठकर दीवार पर चिपके हुए रुटीन के हिसाब से बैग में किताबें सजा लीं। उस वक़्त ये करते हुए मज़ा भी आया। पर घर से स्कूल जाते हुए ऐसा लगा नहीं कि स्कूल जा रहा हूँ| पीठ पर बैग तो डाला हुआ था पर कम किताबें होने की वजह से वो अन्दर से ही हिल रहा था| अपना बैग ही अपना नहीं लग रहा था उस दिन। उस दिन मुझे ठीक ठीक क्या महसूस हुआ था ढंग से याद नहीं, इसलिए उस बारे में लिखना भी बेमानी होगी| पर मुझे इतना ज़रूर याद है कि उस दिन कुछ ऐसा ज़रूर लगा था, जिसकी वजह से घर पहुंचते ही दुबारा वो सारी किताबें, जो मम्मी और मेरे क्लास के रूटीन के हिसाब से एक्स्ट्रा थीं, मैंने अपने बैग में फिर से रख ली थीं| अगले दिन बैग फिर से वही पुराना वाला...  :) वही वजन, वही चौड़ और अपनी सारी पसंदीदा किताबें अपने साथ। बैग अंदर से बिल्कुल भी नहीं हिल रहा था। क्या हो जाता? मम्मी की एक दो बातें सुनने के लिए मैं तैयार था, और अब तो ये भी पता चल चुका था कि बैग की मरम्मत अपने घर पर ही हो जाती है| 


वो फीलिंग मुझे आज इन किताबों को हटा कर कहीं और रखने की नाकाम कोशिश के दौरान समझ आई| इन किताबों का होना उन रिश्तों का होना है, जिनका बस अपनी जगह पर होना ही खुद में एक रिश्ता है, एक तसल्ली है, एक पूर्णता है| फिल्म लंचबॉक्स की आंटी और उसकी नायिका के रिश्ते की तरह... वो आंटी कभी भी फिल्म में दिखती नहीं, पर फिल्म की नायिका के लिए उनकी आवाज़ का होना ही उनका वहाँ मौजूद होना है| उनकी शक्ल भी नहीं, बस आवाज़... ताकि वो जब चाहे उनसे बात कर सकती है| थोड़ा कह सकती हैं, कुछ सुन सकती हैं। और मैं भी जब इन किताबों के कुछ पन्ने यूँ ही उठा कर पढ़ लिया करता हूँ तो लगता है, किसी से कोई बात हो गई...  इन डायरियों पर कुछ दो चार लाइनें लिख लेता हूँ, तो लगता है किसी से कुछ कह दिया| 

फिलहाल इनको उठा कर कहीं और रखने की हिम्मत नहीं है, उन्हें वहीँ रहने देता हूँ| उनका वहाँ होना एक मकसद सिद्ध करता है| और...  क्या ही फर्क पड़ता है, मेरा कमरा वैसे भी मेरे लिए काफी बड़ा है|

(आपकी राय का कमेंट सेक्शन में स्वागत है।)
-नीरज 

Saturday, 2 January 2016

क्यों? ठीक ठीक पता नहीं

(कांदिवली से एयरपोर्ट, के दौरान  1/1/16. 10:20 P.M. मुंबई .)
अभी अभी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचा हूँ, सौरव से मिलने। आदतन मैं जल्दी पहुँच गया और सौरव के आने में अभी थोड़ा वक़्त है। मैं अभी एक कमाल की ख़ुशी से भरा हुआ हूँ। वजह मुझे पता नहीं। सोचा किसी को फ़ोन कर के अपने अंदर अभी जो भी चल रहा है वो बाँट लूँ। फिर यह सोच कर रहने दिया कि इसको लिख लेना ज़्यादा बेहतर होगा। अक्सर मेरे दोस्तों की शिकायत जो मेरे तनाव को लिखने के लिए रहती है, शायद इससे थोड़ी कम हो सके।
मुम्बई में हल्की ठण्ड का मौसम है। ठण्ड इतनी ही की मैं हाफ टीशर्ट पहन कर बैठा हुआ हूँ।  हाँ सर्दी की इज़्ज़त रखने के लिए सर पर एक कैप ज़रूर डाल ली है। थोड़ी देर पहले ही एक कविता लिखी थी और अब सौरव से मिलने निकल पड़ा। कांदिवली के हाईवे से मैंने बस ली, मैं पहली बार एयरपोर्ट  बस से जा रहा था तो आशंका थी कि अगर ट्रैफिक मिला तो मैं कहीं लेट ना हो जाऊँ। इसलिए घर से पहले निकल लिया था। सड़कें और बस दोनों आज उम्मीद से बहुत ख़ाली दिख रहे थे। मैंने कंडक्टर से टिकट ली और पीछे से 2 सीट्स छोड़ कर खिड़की पकड़ पर बैठ गया। बस चली जा रही थी एक के बाद एक फ्लाईओवर फांदती हुई। खिड़की से हल्की ठंढी हवा बस के अंदर आ रही थी, मुझे अच्छा लगने लगा। और एकाएक मैं वो तमाशा का गाना "वत वत वत..." का अंतरा गाने लगा।
"ओ.. हम हमहीं से, तोहरी बतिया
कर के बकत बतावें हैं,
खुद ही हँसते, खुद ही रोते,
खुद ही खुद को सतावें हैं..."
मैं ज़ोर ज़ोर से गा रहा था,जैसे बस की रफ़्तार से कोई मुक़ाबला हो। इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे सामने की सीट पर बैठी हुई लड़की ने पलट कर मुझे देखा। मुझे एक पल के लिए लगा कि उसको अजीब लगा पर वो एक स्माइल दे कर दुबारा सामने की ओर देखने लगी।
तभी बस का एक झटका आया और मैं सीट पर अपना बैलेंस खोने लगा।गाने का 'बेसुर' बार बार
बिगड़ रहा था|  पर मुझे अभी गाना गाने में मज़ा आ रहा था। एक ख़ुशी मिल रही थी| पता नहीं क्यों मुझे जब भी ऐसा कुछ अच्छा लगता है, मुझे दिल्ली की याद आने लगती है। मुम्बई का हाईवे दिल्ली का रिंग रोड बन गया और बेस्ट की बस 'DTC' की। फिर मुझे एहसास हुआ कि अगर टायर के ऊपर वाली सीट से हटकर पीछे बैठ जाए तो शायद सीट इतनी ना हिले, और इस लड़की से थोड़ा फासला भी बढ़ जाएगा। फिर क्या था, मैंने पीछे देखा, सीट पूरी तरह से खाली थी। मैं कूदकर उसपर बैठ गया। पर मैंने इस बार सामने वाली सीट का रॉड पकड़ा, खिड़की की तरफ झुककर बैठा जैसे बच्चे किसी amusement पार्क में किसी राइड पर बैठते है। बस हाईवे पर वैसे ही दौड़ती चली जा रही थी, हवा वैसे ही हल्की ठंडक बस के अंदर ला रही थी। सीट का हिलना अभी भी वैसा ही था,  मैंने गाना चालू रखा, और वहीँ बैठे बैठे एक ख़ुशी से भरता गया। जिसकी वजह का मुझे अभी भी ठीक ठीक पता नहीं| एयरपोर्ट का स्टैंड अभी आया नहीं था, पर अब तक गाने का दूसरा अंतरा आ गया था... :)
"जान गए लेके सुर्खी कजरा
टेप टाप के, लटके झटके
मार तू हमका फँसावत...
पर ई तो बता
तू कौन दिसा, तू कौन मुल्किया
हाँक ले जावे...
हौले हौले बात पे तू
हमारी वाट लगा..."
...बस कहीं और ले जा रही थी और मैं कहीं और ही चला जा रहा था।
- नीरज