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Monday, 15 January 2018

क्या ऐसी वर्कशॉप का कोई फ़ायदा होता है?

पिछले तीन दिन मुंबई के जाने माने पटकथा लेखक और मेंटॉर "अंजुम राजाबलि (सर)" की वर्कशॉप में गुज़री। आदतन इंस्टाग्राम पर उससे जुड़ी हुई कुछ एक स्टोरीज़ भी डालीं तो कई लोगों ने पूछा कि ‘क्या ऐसी वर्कशॉप का कोई फ़ायदा होता है?’ इस बात का इस वक़्त ठीक ठीक जवाब दे पाना वक़्त से बेमानी होगी। क्योंकि कोई भी कला धीरे धीरे अपना आकर लेती है जिसपर हम एक नज़र रख सकते हैं बस। तो ‘क्या इससे फ़ायदा होता है…?' का जवाब मेरे पास अभी तो नहीं है पर मैं इससे जुड़े अनुभव के बारे में तो बात कर सकता हूँ।

मुंबई में साथी लेखकों को अक्सर कहते सुना है कि 'अपनी ईमानदारी बचा कर रखनी है यार…’ । मेरी भी कोशिश यही रहती है कि अंदर वो लड़का ज़िंदा रहे जिसे ख़ूब सारा लिखने का शौक़ था, जहाँ से लिखने की शुरुआत हुई थी… जहाँ से बात शुरू हुई थी वैसा ही बन कर रहा जाए। ऊपर से चाहे कितने भी 'हो-शा’ हो जाए, कैसे भी रंग बिरंगे जूते पहन लूँ या कैसी भी हेयरस्टाइल रख लूँ पर अंदर बैठा लड़का वैसा ही रहे। बाज़ार में बाज़ार के हिसाब से खेले पर जब लिखने बैठे तो वही लड़का हो जाया जाए।

यह मुंबई के लगभग हर राइटर की कोशिश है कि अपनी कला के साथ ईमानदार रहे क्योंकि यहाँ भटक जाने के सारे बहाने मौजूद हैं । पर वक़्त परिस्थितियों के बहाने हमें बदलता ही है। एक बड़ा बदलाव जो एक राइटर के तौर पर मैंने ख़ुद के अंदर देखा है वो राइटिंग का क्राफ़्ट सीखते हुए आया है। धीरे धीरे अपने अंदर से आ रहे आर्ट को कैसे क्राफ़्ट में बाँध कर पेश किया जाए कि वो और सुंदर लगे उसकी कोशिश… कई किताबें पढ़ीं हैं, ऑनलाइन भी बहुत से रीसॉर्सेज़ हैं, दोस्तों से सीखा है, ख़ुद ग़लतियाँ कर के सीख रहा हूँ... एकदम किसी बढ़ई की तरह नाप तौल के लिखने की कोशिश भी करी है। इससे काम ज़रूर सुंदर होता है पर डर यह लगता है कि इसे सजाने के चक्कर में ये कहीं अपनी ईमानदारी ना खो दूँ। वो ईमानदारी जहाँ से बात शुरू हुई थी। ये ईमानदारी मेरी नहीं उस लड़के की है जो चुपचाप अपनी डायरी में लिखता था अपनी ख़ुशी के लिए...कई बार स्क्रीनराइटिंग सीखने की कोशिश करते हुए बात इस हद तक मकैनिकल हो जाती है कि फ़िल्म में चौबीसवें मिनट पर यह आना चाहिए और पैतालिसवें पेज पर वो, फिर साठवें पेज पर एक ऐसा सीन होना ही चाहिए…अरे बाप रे…

इस प्रक्रिया में मुझे हमेशा यह डर लगता था कि कहीं क्राफ़्ट सीखने के चक्कर में मैं आर्ट को तो नहीं खो दूँगा? कहीं बहुत मकैनिकल तो नहीं हो जाऊँगा? पर क्राफ़्ट सीखना भी ज़रूरी है पर कहाँ तक और किस दिशा में? अंजुम सर की वर्कशॉप यही बैलेन्स सीखती है। इस दौरान इस बात का यक़ीन तो होता है कि कला के बीज को बचाते ॰ हुए उसे एक ख़ूबसूरत साँचे में डाला जा सकता है। जिस तरह से वो किसी कहानी को समझते हैं, देखते हैं या देखने की सलाह देते हैं वो मेरे अंदर के लड़के को बचाता है। उस लड़के को जो उतना गणित नहीं जानता और पेट से लिखता है, दिमाग़ से नहीं। उसे एक साहस और विश्वास मिलता है। सबसे ज़्यादा ज़ोर वो कहानी और किरदारों को महसूस करने पर देते हैं। उनका तरीक़ा विश्वास दिलाता है कि डरो मत जो महसूस करते हो उसे लिखना शुरू करो और अगर ईमानदारी से लिखते हो तो सब अपने आप सही होने लगेगा, वो सुर पकड़ में आ जाएगा। वो कहते हैं कि ‘ये सब जो मैं बता रहा हूँ इनमें से कोई भी पत्थर की लक़ीर नहीं है, सुन लो समझ लो और अपनी कहानी के हिसाब से इसका इस्तेमाल करो।’ यही बात कहानी में कहानी के भरोसे को बचा कर रखती है क्योंकि हर कहानी अलग है। हर कहने वाला अलग है और हर कहने वाले के अंदर का लड़का/लड़की अलग हैं और अगर उसे बचा लिया गया तो उम्मीद हैं हम उतने ही सहज बने रह पाएँगे जहाँ से बात शुरू हुई थी और जो फ़ायदा है वो वहीं से निकल कर आएगा।