Thursday, 16 October 2014

बुल्डोज़र



अपने किये पर शर्मिन्दा है शायद,
और आत्मग्लानि से भरा हुआ भी।
तभी तो अपना सर झुका
चुपचाप खड़ा है
मैदान के उस कोने में।
जिसकी छाती से सारे पेड़ उजाड़
खोदा था उसके गर्भ तक इसने
बाँझ बनाया था।

अब सरिया घुस रहा है
उस धरा के जिस्म में,
और कहने को सीमेंट के मसाले
भरे जा रहे हैं,
किसी मरहम के नाम पर।

जैसा कि
इक नींव बनाने की तैयारी हो रही है
जिसका अपनी नींव से कोई भी नाता नहीं।

जाने कितने ऐसे  मैदानों
की कोख को खोदा है इसने
जानें-अनजाने
बस अपने आक़ा की हवस की ख़ातिर

शायद इसी बात से दुखी ये बुल्डोज़र
सर झुकाकर इस धरा से
माँग रहा है माफ़ी,
कर रहा है पश्चाताप
अपनी हैवानियत का

सच है, इन्सानी दिमाग़ से बड़ा शैतान
और कोई भी नहीं ||


© Neeraj Pandey

Wednesday, 15 October 2014

लताएँ भी कभी पेड़ बनना चाहती थीं

उस नन्हें से बीज ने
अपनी एक पत्ती निकाल
पास ही के बड़े पेड़ को देखा,
हाथ हिलाकर 'हैलो' भी कहा
और उसने भी जवाब में
एक फूल गिरा
लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया

सपनों में था इसके
बिल्कुल वैसा ही बनना है,
घना, बड़ा, शानदार...

अपने जिस्म पर घोंसले रख
आशियाना देगा ये भी
किसी चिड़ीए के परिवार को...
या फिर अपनी छाँव से
कर देगा शीतल उस घर को
जहाँ उसे जन्म मिला है|

मासूम से सपने थे उसके
...और ज़रा उतावले भी,
तभी तो कुछ दिनों में ही
इतने पत्ते खोले थे इसने,

फिर जैसे-जैसे बड़ा हुआ
दुनियाँ देखी हर पत्ते से|

अपने ही बुजुर्गों को देखा
इमारतों की भेंट चढ़ते हुए,
देखा अपने चाचाओं को
जवानी में मरते हुए
वो साथी उसके जो हर शाम
हाथ हिला कर हाल-चाल
पूछ लेते थे,
उखाड़ फेंका था उनको किसी
बुलडोज़र ने चलते हुए

लाशें देखी थी उसने,
पड़ी हुई उन सड़कों पर,
चिथड़े होते जिस्म भी देखे
उम्र के थोड़ा बढ़ने पर
गुहार लगाई थी इसने
बहती तेज़ हवाओं में
रोया भी बारिश के साथ
छाले अब भी हैं निगाहों में|


दुनिया का रूप देख ये बच्चा
ताज़्ज़ुब कर रहा है,
अब ये बेचारा पौधा
बड़ा होने से डर रहा है|

कांपता है डर से थर थर अब ,
बड़े पेड़ से लिपट कर,
और... हमसे अपनी ज़िंदगी

कि मिन्नतें कर रहा है|


© Neeraj Pandey

Friday, 10 October 2014

रिश्ते

वो कूड़े वाला हर रोज़ सुबह आकर
ले जाता है हमारा कूड़ा,
वो कूड़ा जो हमारी अपनी पैदाइश है|
और हम भी अपनी नाक सिकोडते
डाल आते हैं इसे उसके ट्रक में


घर के बाहर, हर सड़क पर,
हर नुक्कड़ पर
मुलाकात होती है इन कूड़े के ढेरों से
पर बच बच के चलते हैं सभी
कि कहीं पाँव भी ना लग जाए|

और कोई यह बोलने को तैयार नहीं
कि पड़ोसी के घर के सामने
रक्खा कूड़ा उनका है,
वो कूड़ा जो कभी
उनके अपने सामान का हिस्सा था|

इंसानी फ़ितरत हर उस चीज़ को
कूड़ा घोषित कर देती है
जिससे उसका कोई मकसद सिद्ध नहीं होता|

©Neeraj Pandey

Thursday, 2 October 2014

हिन्दुस्तान में तरक्की के मायने

कॉरमंगला की एक सड़क पर
जहाँ महँगी गाड़ियाँ दौड़ती हैं
पिज़्ज़ा हट के ठीक सामने
एक और वैसी ही बिल्डिंग बन रही है,
शानदार, उँची, चमचमाती|

खबर है इसमें डोमिनोज़ खुलेगा
चीज़ ब्र्स्ट के साथ एसी की हवा
खाने का एक और ठिकाना
मिल जाएगा मुझे और मेरे दोस्तों को|

सोशल, एकनॉमिकल, पोलिटिकल
चर्चाओं के बीच कोल्ड्रींक गुड़की जाएगी,
ताकि पेट में पहले से मोजूद
ब्रेकफास्ट सेट्ल हो जाए,
और बनेगा प्लान किसी
ऐडवेंचर का कभी...

पर अभी...

इन सारी बातों से अंजान
इसे बनाने वाला एक मजदूर
वहीं फूटपाथ पर बैठकर
अपना अंगोछा बिछा,
खा रहा है अपनी रोटियाँ
प्याज़ के दो टुकड़े के साथ,
और उसकी बिटिया फाँक रही है
सीमेंट की धूल|

ये कैसे ग़रीब रह गया?
अनपढ़ ही होगा
अगर अख़बार पढ़ता
तो पता चलता कि
देश कितनी तरक्की कर गया है|

©Neeraj Pandey

Wednesday, 1 October 2014

किताबें और घर

ये इतने सारे घर हैं?... ... या किताबें ?

ठीक ठीक कहना मुश्किल है. दोनों में बाहर कवर है और अंदर किरदार बसते हैं और हर दीवार किताब के पन्नों की तरह अपने ही अंदर छुपाए हुए है कई कहानियाँ. ड्रामा, ट्रॅजिडी, रोमॅन्स, कॉमेडी... इनकी तो शॉर्ट स्टोरी भी
लाइफ लॉंग चलती है. अलग अलग अध्यायों में| ये इतने सारे घर हैं या किताबें ठीक ठीक कहना मुश्किल है.


© Neeraj Pandey

बिछड़े साथी

वो चेहरे अब धुंधले से दिखते हैं मानों कोहरे में खड़ा हो कोई .
गौर से देखता हूँ पर ठीक से पहचान नहीं पाता| वक़्त ने उन यादों पर भी मानों धूल सी जमा दी हैं. ...अब चाहे अच्छे थे या बुरे बीती रात के सपने किसे याद रहते हैं.

© Neeraj Pandey

Monday, 29 September 2014

सिगरेट सा वीकएंड...

इतने सारे दिनों के बीच
कुछ सिगरेट सा मिलता है ये वीकएंड,
होठों से लगा, थोड़ी देर कश लेकर
अपने सीने के अंदर उतार लेता हूँ|

घुलकर बहता है जब धुंवा इसका
मेरे जिस्म की नाड़ीयों में
मीटा देता है थकान पूरे हफ्ते की,
थोड़ा सुरूर आ जाता है,
थोड़ा सुकून आ जाता है|

कई बार आधी पी कर बचा लेता हूँ
इसका दूसरा हिस्सा,
कि, कभी तलब के वक़्त काम आएगी|

कई बार कम पड़ जाती है
ये दो दिनों की सिगरेट भी,
शायद अब इसकी लत पड़ती जा रही है,
ये अब आदत बनती जा रही है|

कई बार ना चाहते हुए भी
बूझा देना पड़ता है, उसे गरदन से मरोड़ कर
पास की रखी ऐश ट्रे में,
कि मंडे का बुलावा आ गया
अब सब छोड़कर, काम पर लगना होगा
अगली सिगरेट के इंतज़ार में|

सिगरेट सा, बिल्कुल सिगरेट सा
मिलता है ये वीकेंड|

© Neeraj Pandey

Tuesday, 23 September 2014

एहसासों की पतंग.

बहोत देर से पड़ी थी कोने में ये चरखड़ी,
उठा कर बार, बार रख देता था.
अभी नहीं, अभी नहीं...

पतंग जो फट गई थी उड़ते उड़ते
रख दिया था उसे कोने में सहेज कर,
कुछ काग़ज़ों से चिपकाकर
कि कोई साथी आए,
कन्नी बाँधे और छत की दूसरी छोर तक ले जाकर
छोड़ दे हवा में इसे.

पर बेसबर सा मैं भी,
कहाँ चैन से बैठता
उड़ा दी अपनी पतंग,
तुम्हें दूर से ही देखकर.
खुली हवा में साँस लेने की कोशिश कर रही है अब ये,

अब थोड़ी ढील मैं छोड़ रहा हूँ.
थोड़ी हवा तुम उछालो,
कि एहसासों की इस पतंग को
नई उड़ान मुनासिब हो.

©Neeraj Pandey

Tuesday, 2 September 2014

बांझ सोच

कुछ स्वमैथुन के मारे बेचारों को लगता है,
कि सूरज उनके लिंग के चक्कर काटता है,
क्योंकि वो किसी एक विशेष योनि की पैदाइश हैं.
ईश्वर से सीधा नाता है इनका,
और स्वर्ग में सीटें आरक्षित हैं इनकी.
जिस ईश्वर को इन्होनें कभी जाना ही नहीं
और ना ही जानने की कोशिश की
बस सच से आँखें मुन्दे हुए
अपनी ही दुनिया मे खुश हैं साले.

बांझ ज़मीन से दिखते है और उतने ही अनुपयोगी भी,
कि इनपर कोई नया ख़याल नहीं पनप सकता.
बस हर बात पर तान कर बैठ जाते हैं, उतावले,
अपने लिंग का आकार बताने को
जिसमें खुद इनका कोई योगदान नहीं.

ये कुछ सदियों पहले हुई
किसी दुर्घटना का परिणाम हैं,
पर हँसी आती है मुझको
इनको खुद पर इतना क्यों अभिमान है?

© Neeraj Pandey

Wednesday, 20 August 2014

अधूरी नज़्म...

वो आयीं और लौट कर चली गयीं
पर मैं ही उस वक़्त कहीं और था.
अभी भी कहीं हैं मेरे अंदर ही
कुछ नज़मेँ जो अपना आकार नहीं ले पाईं हैं.

जब भी थोड़ा इतमीनान से बैठता हूँ

हिचक़ियों से उनके होने का एहसास होता है
जैसे मेरे अंदर ही कहीं पलने लगी हैं ये
पर ढंग से बाहर नहीं आतीं.

जी में आता है बस मार ही दूँ,

परेशान जो इतना करती हैं
पर अपने गर्भ के बच्चे का कत्ल भी करूँ तो कैसे?
सोचता हूँ किसी दिन फुरसत के कुछ पल निकाल
बैठ कर दो एहसासों के घूँट लगाऊं
और एक मुस्त उतार दूँ पन्ने पर.
पूरी रात उधेड़ दूँ इनके लिए
और देखूँ ज़िंदा करके इन्हें
की इनकी शक्ल कैसी है

© Neeraj Pandey

Sunday, 13 July 2014

क्योंकि वो गांधारी नहीं

वो दोनों अक्सर दिख जाते हैं
एक दूसरे का बोझ उठाते,
सड़कों पर भटकते
हमसे अपने हिस्से का कुछ माँगते.

वक़्त ने कमर झुका दी है इनकी
खुद अपना भार भी नहीं उठा पाते अब.

इनके कपड़े और हालात हरदिन एक से होते हैं

वो बूढ़ा तो ठीक से बोल भी नहीं पता
आँखो मे भी मोतियाबिंद लगता है उसके,
पर बुढ़िया उसके साथ ही रहती है,
उसकी आँख बन कर आगे चलती है.

और मुझे पता है वो उसका साथ नहीं छोड़ेगी
और ना ही अपनी आँखो पर पट्टी ओढेगी
क्योंकि वो गांधारी नहीं
बस एक मामूली सी औरत है,
हर रोज़ पति की आँख बन जाती है
और हर रोज़ गांधारी को आईना दिखलाती है |

© Neeraj Pandey

Sunday, 22 June 2014

मेरे ऑफीस का एक वॉशरूम

पीछले कुछ दिनों से मेरे ऑफीस के एक वॉशरूम का दरवाज़ा अजीब हरकते करता है. एक बार खोल दो तो लगभग अगले एक मिनट तक खुला ही रहता है. शायद अपनी कर्मठता की निशानी पेश करते हुए कुछ और लोगो के अंदर आने की उम्मीद में खुला रहता होगा. और जब उसे लगता है उसका इंतज़ार बेकार हुआ और उसके साथ धोखा हुआ है वो चिल्लाता हुआ ज़ोर से गुस्से में बंद होता है.

पर बात यहीं ख़तम नही होती, मुझे तो कुछ और भी शक़ है, सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं पूरे वॉशरूम पर. बात ऐसी है की वॉशरूम के अंदर का माहौल काफ़ी गरम रहता है, इसके परिवार के सदस्य एक दूसरे से बात नहीं करते. बड़ा ही मान मुटाव है सबका आपस में.

कॉमोड ने तो अपना एरिया ही अलग बना रखा है. वो एक फ्लश और एक टाय्लेट पेपर होल्डर के साथ अपना घर बसा कर खुश है. यहाँ तक की उसने अपने एरिया के बाहर दरवाज़ा भी लगा लिया है,. बाहर बचे दो युरिनल, एक वॉश वॉशिन, एक टिश्यू पेपर होल्डर और कोने मे पड़ा हुआ कूड़ेदान. अछूत बेचारा.

युरिनल्स के बीच में मुझे कुछ प्रॉपर्टी का मसला लगता है बोलचाल ऐसी बंद है की अपने बीच दीवारें खड़ी कर रखी हैं, अंबुजा सेमेंट वाली. और वॉश वॉशिन को साइड में अकेला पड़ा रहता है दीवार के कोने में. दूसरी तरफ़ टिश्यू पेपर होल्डर भाई साब सामने की दीवार पर लटके रहते है, ये तो वैसे भले आदमी है, सारे टिश्यू पेपर्स को अपने शरीर मे जगह दी है. पर इनके कई टिश्यू पेपर्स को बड़ा गुरूर है, जैसे किसी बड़े साइल्ब्रिटी को उसके होने का गूरर हो ना हो पर उसके जानने वालों को गूरूर होता है की वो उस सिलिब्रिटी को जानते है. यही हाल है टिश्यू पेपर होल्डर और टिश्यू पेपर्स का. कूड़ेदान में जाना ही नहीं चाहते, फुदाक कर कूड़ेदान से बाहर फर्श पर पड़े रहते है. उन्हे शर्म तो ऐसी आती है जैसे अँगरेज़ी मीडियम से पढ़े हुए लौन्डो को सरकारी स्कूल जाना पड़ रहा हो.

फ्लश को चलाओ तो ऐसे गुराता है जैसे उसको नींद से उठा कर किसी ने उधार माँग लिया हो. और गुराएगा भी क्योंकि उसका काम ही ऐसा है, सारे किए कराए पर पानी फेरना. वो तो टाय्लेट पेपर्स के काम के बारे में सोच कर थोड़ा बेहतर महसूस कर लेता होगा नहीं तो किसी दिन फटकार बाहर ही आ जाए.

सारी बात यह है की अंदर का माहौल बहूत गरम रहता है, कोई किसी से बात नहीं करता, अब ऐसे माहौल को थोड़ा सामान्य करने के लिए ही वॉशरूम दरवाजे से सेट्टिंग कर के उसे सामान्य करने की कोशिश में लगा रहता है, क्योंकी जीतने लोग एक साथ अंदर होने बाकलोली उतनी ज़्यादा होगी...और वॉशरूम अपने गृहकालेह से उतनी देर के लिए बचा रह पाएगा.

क्योंकि हम आर्टिस्ट्स के लिए वॉशरूम बिल्कुल ही अलग अनुभव है. वॉशरूम ऐसी जगह है जहाँ ना चाहते हुए भी हर व्यक्ति दिन में दो बार तो आ ही जाता है, और किसी स्पेशल केस मे चार से पाँच बार. और कभी भी खुद को अकेला नहीं पता.

कई बार तो हालत ऐसी होती है की मैं कई लोगों से बस इस वॉशरूम में ही मिल पता हूँ मानो सहकर्मी कम और सहसूसूकर्मी ज़्यादा हो. अगर मैं इसे मिनी चौपाल कहूँ तो ग़लत नहीं होगा.सारे 18+  वाले चुटकुले सभी अपना सांस्कृतिक कार्यक्र्म प्रस्तूत करते हुए यहीं फोड़ते हैं. यहाँ भाईचारे का माहौल ये है की कई लोगों ने तो एक दूसरे की टाइमिंग भी नोट कर रखी है.

हम सारे आर्टिस्ट की क्रियेटिविटी का फ्लो यहाँ भी नहीं थमता. लोग तो यहाँ भी निशानची बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते, चाहे किसी की सीट पर कोई जाकर whats up पूछे ना पूछे, सू सू करते हुए ज़रूर पूछता है. शायद यह भी कोई रस्म ही होगी, या फिर इससे फ्लो सही रहता होगा. और वैसे भी जब से न्यू ज़ोइनी को हर आर्टिस्ट से सीट पर ले जाकर मिलवाने का रिवाज़ ख़तम हुई है पहली पहली बार उस न्यू ज़ोइनी से मुलाकात यहीं होती है, टिश्यू पेपर निकलते हुए. रात में अगर किसी की नींद पूरी ना हुई हो तो वॉशरूम मे कॅमोड पर बैठ कर पाँच मिनिट की झपकी ही ले लेता है. कहने को कहे तो हमारा वॉशरूम मिलने मिलने और जान पहचान बढ़ने का केंद्र बन गया है, बिल्कुल उस इलाक़े की तरह जो शहर में तो बदनाम गलियों के नाम से जाना जाता है पर अंदर काफ़ी खुशनुमा माहौल रहता है. मेरा तो यहाँ तक मानना है की हर ऑफीस में सामूहिक सदभाव का केंद्र घोषित कर देना चाहिए.

अब देखने को यहाँ दो रंग है एक तो वॉशरूम के परिवार का आपसी  विवाद और दूसरी तरफ हमारा खुशनुमा माहौल.
मुझे लगता है हमारी बाकलोलियों से वॉशरूम को थोड़ा सुकून ज़रूर मिलता होगा. इसलिए जब भी दरवाज़ा खुले आप अंदर घुस जया करो भगवान कसम वॉशरूम हमें इतना कुछ देता है हमें भी उसका उधर समय रहते ही चुका देना चाहिए, और वो दोस्त क्या दोस्त जो एक दूसरे के काम ना आए.

...और रही बात लेडिज़ वॉशरूम की तो अगर कभी उधर जाने का मौका मिला तो उसके बारे मे भी बताउँगा.

Sunday, 15 June 2014

वो सपने देखती थी




















छोटी सी उम्र से ही सपने देखने की आदत थी
चाँद का एक हिस्सा रख लिया था उसने
बाँध कर अपनी चोटी से.
और यकीन था उसे की उसके दाग भी साफ कर देगी वो.

कुछ दिनों बाद खबर आई कोई ब्याह कर ले गया उसे,
और आज उसकी घूँघट में उसके सपने सारे कैदी हो गये हैं.
बाहर ही नहीं निकलते, शायद किसी बोझ तले दबे होंगे.                     

हाँ वो चाँद अमूमन उसकी घूँघट से पीघल कर बहता दिखता है
उसकी शक्ल पर मुझे.
मैं कहता हूँ रोक लो इसे, इसे यूं जाने ना दो
ये तुम्हारी पुरानी पहचान हैं, ये तुम्हारा ही हिस्सा है.

वो कहती है, अब मुमकिन नहीं,
अब बहूत दूर आ चुकी हूँ.
अब बहूत देर हो चुकी है.
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कुछ शब्द समझने को -
चाँद: कुछ बड़ा करने की चाहत
चोटी से बांधना: अपने साथ ही रखना
दाग: लोगों का उसके सपनों पर शक़


Friday, 13 June 2014

क्या वो तुम्हारी साइकल थी?




कोने में पड़ी उस साइकल को देखा,
देखा तो मुझे भी देखने लगी वो.
पूछा तो कहा-
तुम जैसा ही कोई लाया था मुझे
अपने घर में जगह दी थी.
फिरता था चप्पा चप्पा
मेरी पीठ पर बैठ कर कभी.

पर अब कोई मेरे पास नहीं आता
बस गुज़र जाते है सब अनदेखा कर के.
मुझमे अब किसी की दिलचस्पी नहीं
देखो किसी को मेरी परवाह नहीं.

घर के बेकार करार दिए हुए बुज़ुर्गों की तरह
मेरे हिस्से में भी बस एक कोना ही आया है.
और यहाँ बैठे बाकी के दिन गिनने हैं मुझे,
की जब तक कोई कबाड़ी मेरा मोल नहीं लगाता.

थकान झाँक रही थी उसकी आँखो से,
पाँव भी फर्श मे धसें जा रहे थे.
किसी ने उसकी गर्दन में जंजीरे डाल कर
जीने से बाँध रखा था उसे.

इस साइकल को उसके हाल पर छोड़ कर
कोई बड़ा हो गया था.
साइकल वहीं रुक गई थी,
ज़िंदगी चली जा रही थी.


Sunday, 8 June 2014

ये बारिश वो बारिश नहीं

ये बारिश वो बारिश नहीं जो बचपन में मिलने आती थी..
कश्ती चलाकर काग़ज़ की हमें, सींदबाद बतलती थी.

किसी बात से गुस्सा है अब, बेमौके आती जाती है
कुछ शिकायत भी है तभी तो, बुढ़िया सी गुर्राति है.

बारिश चिंघाड़ती है अब..इसके सुर बदल गये हैं.
मुझे शक है किसी ने तो इसके कान भरे हैं.

दीवारों से उतरती है जैसे कई साँप गुज़रते हैं
गावों मे चलती है तो घर के घर उजड़ते हैं.

लगता है बदला लेने की ताक में रहती है ये
कई सड़कों पर देखा है मौत सी बहती है ये.

और पाने की और पाने की चाहत का है ये अंजाम
सारी प्रकृति कर दी हमने अपनी इस हवस के नाम.

बचपन की फुहारों वाली बारिश अब भी याद आती हैं
मैं कच्चे मकान में रहता हूँ और ये बारिश मुझे डराती है.