Friday, 29 December 2017

आश्चर्य का टुकड़ा

जीवन के आश्चर्य इतने सूक्ष्म है कि अगर रोज़मर्रा की जिंदगी में ज़रा सा रुका कर इनपर गौर ना करें तो वो गायब हो जाएँ। ये सारे आश्चर्य हमारे आसपास ही रह रह कर पनपते रहते हैं।

कल रात बांद्रा में शो था| अक्सर शो के बाद घर लौटते हुए लेट हो जाता हूँ| घर पहुँचते पहुँचते बारह बज जाना अब एक आम बात हो गई है| आज कल निधि (मेरी छोटी बहन) भी पूना गई हुई है तो वापस लौटने पर घर पर कोई नहीं था| दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोल कर घुसना पड़ा| आज अपने कमरे में पहुँचते ही ट्यूबलाइट जलाई और फिर तीन सेकंड के अंदर झट कर के बंद कर दी| अभी कमरे में बाहर से आने वाली हल्की हल्की रोशनी मुझे ठीक लग रही थी| मेरे कमरे में एक बड़ी सी खिड़की है जो स्लाइड कर के खुलती है। अगर परदों को किनारे कर दिया जाए तो आस पास की बिल्डिंगों से इतनी रोशनी कमरे में जाती है कि किताब पढ़ना छोड़ कर बाकी  के काम किए जा सकते हैं। मैंने ट्यूबलाइट बंद कर दी।

थोड़ी देर में हाथ मुँह धोने के बाद मैं अपने बिस्तर पर पीठ को तकिये से टेक लगा कर बैठ गया...बाहर की तरफ़ झाँकता हुआ| मेरी खिड़की पर सफ़ेद पर्दा हल्का हल्का हिल रहा था| इसके हिलने के साथ ही थोड़ी और रोशनी कमरे के अन्दर आती हुई मेरे पैरों पर पड़ रही थी| आस पास सब शांत था। धीरे धीरे पूरे दिन की थकान को आराम मिलने लगा और जो ख़याल पूरे दिन इधर उधर  भागते रहते हैं अपनी जगह बनाने लगे।

ऐसे ही ख़यालों के जगह बनाने के क्षण में अचानक मुझे 'आश्चर्य' दिखा| हाँ आश्चर्य... मेरी खिड़की पर लटकता हुआ सफ़ेद पर्दा| हाँ वो आश्चर्य है। उसको देखकर मैं थोड़ी देर उसे ही देखता रहा और एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर फैल गई| यह आश्चर्य ही था| मैंने फिर नज़र घुमा कर पूरे कमरे को देखा... वाह! कमाल है'आश्चर्य पूरे कमरे में बिख़रा हुआ है...' मैंने ख़ुद से बात की और ख़ुद से ही स्वीकृति भी दे दी। 

यह आश्चर्य इसलिए था कि मुझे पता भी नहीं चला और मैं अपनी उस दुनिया के अन्दर था जिसकी मैंने कभी कल्पना मात्र की थी। दरअसल बात ऐसी है कि १०१३- २०१५ तक बैंगलोर में अपने एक दोस्त और बहन के साथ एक छोटे से घर में रहते हुए जब मैं एक बार नींद से उठा तो अचानक अपने सामने बड़े सामान का ढेर पाया| घर भरा हुआ था। दो (दरअसल डेढ़) छोटे छोटे कमरों में घर के तीन लोगों का कम सामान भी बहुत ज़्यादा लगता था। ऐसा लगता था कि मेरे ख़याल उन सामानों से टकराकर कमरे की फ़र्श पर गिर रहे हो। उनके लिए घर में जगह ही नहीं थी ऐसा लगता था। मुझे याद है, ऐसा ख़याल आने के बाद ही मैंने दो पन्नों पर इसके बारे में लिखा भी था और लिखते हुए सोचा था कि कभी शायद मेरा एक कमरा होगा जो एकदम ख़ाली होगा। उसमें मेरे ख़याल किसी चीज़ से टकराकर गिरेंगे नहीं। मैं उसकी दीवारें सफ़ेद रखूँगा, कमरे में सामान एकदम कम होगा, एक लम्बी खिड़की होगी दीवार के साइज़ की जिसको स्लाइड कर के खोला जा सकता होगा (मैं कभी रात में बैठ कर उसपर चाय पियूँगा), और खिड़की पर जो परदे होंगे वो भी सफ़ेद होंगे। गुलज़ार साब भी शायद इसीलिए हमेशा सफ़ेद पजामे-कुर्ते में दिखते हैं शायद। उन्हें भी ऐसा लगता होगा शायद... पर ये सब कब और कैसे होगा इसका मुझे बिल्कुल पता नहीं था। बस बैठे बैठे सोच लिया था और सोचने में कोई पैसे थोड़े ही लगते हैं। 

पर अभी इस क्षण में जब मैं अपने कमरे में बैठा हूँ मैं वही तो जी रहा हूँ। मैं उस ख़याल की हक़ीक़त में बैठा हुआ हूँ जो कभी यूँ ही सोच लिया था। वो मेरे जीवन में कब का घट  चुका था जिसे मैंने आज देखा है। यह आश्चर्य ही तो है। मैं ख़ुद ही ख़ुद में मुस्कुरा दिया। होंठों के विस्तार ने ख़ुशी का विस्तार किया और कमरे की रोशनी के साथ साथ अंदर भी एक रोशनी उतर गई और मन ही मन मैंने कहा कि 'यार 'आश्चर्य' होते तो हैं, पर बड़े सूक्ष्म। जिन्हें रुककर ना देखो तो घट कर निकल जाते हैं। यह सोचते हुए मैंने खिड़की का सफ़ेद पर्दा पूरी तरह से एक तरफ़ किया, खिड़की को स्लाइड किया, कमरे के अंदर हल्की ठंडी हवा और आने लगी... कुछ सेकेंड वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं किचन की तरफ़ बढ़  गया, चाय बनाने। अपने आश्चर्य के दूसरे हिस्से को थोड़ा और जीने...

Thursday, 28 December 2017

Bombay Times के साथ बातचीत। English

समीर (मेरी पहली फ़िल्म) को लेकर बॉम्बे टाइम्स से एक बातचीत हुई। वैसे तो ये नया सा है पर अपनी तहरफ से सब सवालों के जितने ईमानदार जवाब हो सकते थे देने की कोशिश करी है। कुछ ऊपर नीचे हो गया हो तो उसके लिए माफ़ी। बाक़ी जो जो सवाल या उनके जवाब हैं वो लिंक में हैं। पढ़िए और अपने विचार साझा करिए। स्वागत रहेगा। :)



 Click here to read the interview

Wednesday, 4 October 2017

'पहला' कुछ भी हो हमेशा ख़ास रहेगा... पहला होने की वजह से नहीं उंसके लिए किए हुए इंतज़ार की वजह से... दो साल पहले मुंबई आने के बाद का पहला काम था ये. ढेर सारे संकोच, सेल्फ डाउट और सीनियर्स के भरोसे के साथ इस फ़िल्म पर काम किया था. आज जब नदी से जाने कितना पानी निकल चुका है और मैं कहीं और खड़ा हूँ, यह फ़िल्म दो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल के बाद सिनेमाघरों में पहुँची है. ज़्यादातर प्रतिक्रियाएं सकारात्मक हैं. 

वैसे तो अपना लिखा ही अब ठीक से याद नहीं पर सीमा बिस्वास, पीयूष मिश्रा, स्वानंद (दादा) किरकिरे और ज़ीशान के साथ एक ही पोस्टर पर ख़ुद का नाम एक साथ देखना एक अनुभव है जो कल्पना और यथार्थ को धुंधला कर जाता है. इस वक़्त पीछे पलट कर देखने का एक सुख है सरसरा सा... और आगे और बेहतर काम करने की चाह. आगे आने वाले काम इससे बेहतर हो सकते हैं पर पहला...पहला तो यही है. 😊
सबका शुक्रिया. 



Monday, 31 July 2017

मेरे प्रिय लेखक.

तुम मेरे प्रिय लेखक हो। मुझे लगता था मैं ये तुमसे कभी नहीं कहूँगा क्योंकि हमारे यहाँ ज़िंदा लोगों को सम्मान देने की परंपरा थोड़ी कम है। यहाँ एक लेखक को सम्मान पाने के लिए सबसे पहले मरना पड़ता है या ग़रीब होना पड़ता है...तुम इन दोनों में कहीं खड़े नहीं दिखते। खैर मैं उस तरफ ना जाते हुए बात को तुम तक ही रखता हूँ। जब से तुम्हे पढ़ना शुरू किया मेरे लिए साहित्य का एक नया दरवाज़ा खुला...दरवाज़ा नहीं एक खिड़की, मेरे अंदर की खिड़की। तुम्हारा लिखा पढ़कर ऐसा लगता जैसे ये मेरी ही बात है। मैं हर रोज़ किसी रिचुअल की तरह तुम्हे पढ़ने लगा...इतना पढ़ा कि मेरी लिखावट में तुम दिखने लगे। लोगों ने कहा कि मेरा लेखन बेहतर हुआ है। कुछ वक्त तक यह बात अच्छी लगती पर धीरे धीरे मैं इससे बोर हो गया। लोग मेरे लिखे कि तारीफ़ करते तो मुझे लगता कि ये तो तुम्हारी तारीफ़ हो रही है। हाँ मुझे तारीफ़ पसंद है।
फिर बीच में एक वक्त ऐसा भी आया कि मैं तुम्हारी सोशल मीडिया प्रोफाइल को देखकर तुम्हे जज करने लगा। इसकी वजह यह रही होगी कि वो आदमी मुझे उस आदमी से बिल्कुल अलग लगा जिसका लिखा पढ़कर मुझे यह समझ नहीं आता था कि मैं भर गया हूँ या ख़ाली हो गया। मैंने तुम्हे अनफॉलो कर दिया।
इस बीच मैंने काफी कुछ नया पढ़ा, देखा,सीखा और लिखा। मेरी ज़िंदगी भी एक दौर से गुज़रते हुए एक दूसरे पड़ाव की तरफ़ बढ़ रही थी। तुम भी मेरे लिए अलग आदमी थे। तुम तक ना लौटने की सारी वजहें मेरे पास थीं। मैं अपनी सोच के दायरे से तुम्हे अभी भी जज कर रहा था...भयंकर।
पर एक दिन जब ठीक ठीक पता नहीं कि मैं खाली पड़ा था या बहुत भरा हुआ था, मेरे अंदर तुम्हारे लेखन तक पहुँचने की तलब उठी। मैंने तुम्हे फिर से पढ़ा और इसबार... इसबार भी तुमने मुझे चमत्कृत किया। मैंने इसबार तुम्हे कुछ और करीब से समझा। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे खुद से बात हो गई हो...
जानते हो अब जब भी तुम्हारी कोई तस्वीर देखता हूँ या तुम्हारा लिखा हुआ पड़ता हूँ...उसके पीछे झांक कर देख पाता हूँ। जिस बात के लिए ये सोचता था कि 'भक, ये ऐसे कैसे?' अब लगता है कि 'हाँ ये बिल्कुल हो सकता है...यही तो है।' मैं खुश हूँ... तुम्हारे ज़रिए मैं शायद अपने होने वाले कल से मिलता हूँ। मैं किसी घर की तरह तुम्हारे लिखे तक वापस आता हूँ।
लगता है अब तुम्हे थोड़ा समझने लगा हूँ। क्योंकि मेरी ज़िंदगी भी थोड़ी आगे तो बढ़ी ही है।
x

Tuesday, 6 June 2017

फिर से...

दो दिन पहले अचानक बैठे बैठे एक तस्वीर दिखाई दे गई. ये तस्वीर मेरे टुकड़ों में लिखे हुए, लिख कर छोड़े हुए और रह रह कर जिए हुए के नोट्स से बनी थी. एक एहसास सा था कि वो सब जो मैंने टुकड़ों में जिया है किसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है. यह सब मुझे नाटक लग रहा था. मेरा सारा लिखा हुआ जो किसी नाम या चेहरे के तहत अपनी पहचान नहीं पा सकता, उसे नाटक में अपना घर दिखना शुरू हुआ. मैंने नाटक लिखने का सोचा.

मैंने बंगलोर में रहते हुए भी कुछ नाटक लिखे थे. यह छोटे छोटे तिनके जोड़कर एक घोसला बनाने जैसा है. कहाँ कब कैसे क्या काम आ जाए कहा नहीं जा सकता. इस नाटक का आईडिया  मैं शानी को पिछले शुक्रवार एक बार में बताया था. उसे यह बहुत पसंद आया. उसने कहा कि यह तो पूरी फिल्म का आईडिया है और काफी अच्छा है, काम कर इसपर. इससे मेरी हिम्मत बढ़ी पर मैं इसे अभी फिल्म की तरह नहीं लिखूंगा. मैं इसे नाटक की तरह ही लिख रहा हूँ, इसमें मेरे पास एक ऐसा स्पेस है जहाँ मैं अपने एक्सपेरिमेंट कर सकता हूँ. मुझे इसे बनाने के लिए किसी प्रोडूसर के ऊपर आश्रित होने की ज़रुरत नहीं है.

किसी भी नए काम को करने और उसके होने के बीच की जो दूरी है वो कुछ ऐसी होती है जिसे शायद मैं ठीक से बयान ना कर पाऊं. खुद से इतने सारे सवाल और इतने सारे संदेह खुद पर कि लगता है जो मैंने कहना शुरू किया था क्या वह ठीक उसी इमानदारी से कह पाऊंगा?  क्या जो मैं कह रहा हूँ जब लोगों के सामने लेकर जाऊँगा तो उन्हें वही समझ आएगा जो मैं कहना चाहता था...? ऐसे ही बहुत सारे सवाल हर बार मेरे पास आते हैं. इस रास्ते में मैं अपने ही अन्दर बैठे हुए उन कई सारे व्यक्तियों से मिलता हूँ जो अक्सर मुझे ऐसे नहीं दीखते. इनको मैंने काम पर रखा है क्या? मैं कई बार इनसे बात करते हुए डरता भी हूँ कि पता नहीं क्या कैसा बोल दें... लिखने लगूं तो क्या लिखवा दें? इसलिए इनपर संदेह है पर मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि इनसे मिलना भी एक रोमांचक अनुभव है. 

लगभग ढाई साल बाद फिर से किसी नाटक को लेकर बैठा हूँ. इन ढाई सालों में मैं एक इंसान और लेखक के तौर पर अपने अन्दर आये हुए बदलावों को देख पा रहा हूँ. एक एक परत उतार कर देखने जैसा है ये. हाँ, इसका एक  पहलू यह भी है कि इसे लिखते हुए कई बार मुझे ये लगा कि मैं इसे अपने पसंदीदा लेखकों के जूते पहन कर लिख रहा हूँ. ये जूते मेरे पैरों के आकार से थोड़े बड़े हैं. थोडा अपना है तो थोडा माँगा हुआ का एहसास है. किसी नए रिश्ते की शुरुवात सा एक अटपटापन भी है, जो वक़्त के साथ साथ अपना हिस्सा बन जाएगा. पर सब अपनी शुरुवात ऐसे ही करते हैं शायद और शायद यही एक रास्ता भी है कि जो रास्ता पता है उसपर चलते जाओ और जब चलना आ जाए तो अपने जूते पहनकर अपने रास्ते पर निकल पड़ो.

इस पोस्ट को लिखने का बस ये ही एक मकसद था कि अपने नाटक कि शुरुवात को चिन्हित कर सकूं. नाटक पूरा कर के फिर से मिलूंगा और बात करूंगा कि यह सफ़र कैसा रहा. 

Monday, 8 May 2017

बिखरे पन्नों से भाग-4

मैं एक भूकंप से निकल रहा हूँ, जिंदा हूँ पर दबा हुआ वहीँ कहीं. मैं ये सब बोल कर किसी को बता सकता हूँ, बाँट सकता हूँ. उससे राहत तो मिलती है पर उस ढहे हुए घर के मलबे में मेरे गुज़ारे हुए वक़्त का कुछ सामान अभी भी आँखों के सामने दीखता है. ये वो घर था जो मैंने जीवन की एक छोटी सी ख़ाली जगह में बनाया था. वो अचानक भरभरा कर गिर गया. जब दोस्तों से हर रात घंटों इस बारे में बातें हो जाती है तो मुझे हल्का लगता है, उस हल्केपन में नींद आ जाती है. पर उस ख़ाली जगह का एहसास मेरी नींद में अभी भी कायम है. मैं आजकल अपने सपनों में घूमता रहता हूँ. ऐसी ऐसी जगहें चला जाता हूँ जहाँ पहले कभी नहीं गया और शायद असल जिंदगी में वो जगहें होंगी भी नहीं. पर मुझे वहां अपने जाने पहचाने लोग ही मिलते हैं. सारे दोस्त, रिश्तेदार... उनसे मैं वैसे ही पेश आता हूँ जैसे असल जिंदगी में. यह सब लोग वहाँ क्या कर रहे हैं? मैं वहाँ क्या कर रहा हूँ? इन सारे मिलने वाले लोगों के बीच आज कल एक आदमी भी मिलता है, जिसे मैं मेरे सपनों में मिलने वाला आदमी कहता हूँ. उसकी कद काठी सुडौल है, उम्र कोई पैतालीस के आस पास, उसने पूरी दाढ़ी रखी हुई है. उसका लम्बा कोट और चेहरे का रौब देखकर वो किसी फ़ौज का रिटायर्ड आदमी लगता है पर वो फ़ौज का नहीं है मैं उसे जानता हूँ. वो मेरे ठीक सामने आ कर खड़ा हो जाता है. मैं उसके पास अपने भूकंप की कहानी बताने जाता हूँ,बताते बताते हल्का रोता हुआ... नहीं रोता नहीं, रुआंसा होता हूँ. मैंने उससे कुछ तीन या चार लाइन ही बोल पता हूँ कि वो मुझे रोक देता है. कहंता है “चुप हो जा मैं तेरी कहानी जानता हूँ” और यह बोल कर वो मुझे चुप करा देता है, मैं उसे चुपचाप थोड़ी देर के लिए देखता रहता हूँ. उसके कोट की गर्मी से मुझे थोड़ी राहत मिलती है. मैं उसके सामने रोना चाहता हूँ तभी वो सपने वाला दृश्य बदल जाता है. इस बदले हुए दृश्य में कुछ भी पहले जैसा नहीं है. मैं भी थोड़ी देर रुककर कुछ और करने लगता हूँ.


पर यह सपने में मिलने वाला आदमी कौन है? यह ख्याल थोड़ी देर साथ रहकर अचानक गायब हो जाता है. यह जान कर कहीं ना कहीं अच्छा लगता है कि वो मुझे समझता है. जानता है मुझे भी और उस ख़ाली जगह को जो धीरे धीरे कर के एक घर में तब्दील हो गई थी. वो उस भूकंप को भी जानता है जो हर बार मेरे ख़ाली जगह पर बनाए हुए घर को ढाह कर चला जाता है. 

Friday, 7 April 2017

बिखरे पन्नों से भाग-३

बड़े दिनों से ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा. वजह यह नहीं थी कि लिखने को कुछ था नहीं, बल्कि  मैं इतना कुछ जिए जा रहा था कि ढंग से बैठ कर उन सारे अनुभवों को लिख पाना मुमकिन नहीं हो पाया.
पिछले कुछ महीनों से जीवन उलझा हुआ था. अब वहां से निकल इसने अपनी रफ़्तार फिर से पकड़ी है. जीवन के उलझे वक़्त ने हमेशा एक गहरे एहसास को किसी अखबार की तरह खोल कर मेरे सामने रख दिया है. इस बार यह एहसास है भीड़ से डर का. भीड़ डरा देती है मुझे. क्योंकि भीड़ सारी एक जैसी होती है चाहे वो गली चौराहे की हो, किसी एक कमरे की हो या फिर सोशल मीडिया की हो. मेरे लिए भीड़ अब बस भीड़ है. भीड़ मेरे कान में अपना मुंह डाले खड़ी है.

मेरे कई दोस्तों ने जीवन के अलग अलग पड़ावों पर मुझे मेरी वैचारिकता की पहचान बताई है, जिसके बारे में मुझे खुद नहीं पता था. 'नीरज देखो तुम ऐसा सोचते हो तो इसका मतलब है तुम ये होऔर मैंने भी अक्सर हाँ में सर हिला दिया. मेरे पास उस वक़्त उनकी बात ना मानने की कोई वजह नहीं थी और उसे अपनी पहचान का हिस्सा मान हमेशा ही संजोने की कोशिश की. मैं जब भी किसी समूह का हिस्सा बना हूँ बड़े प्यार से उसने मुझे अपनाया है. पर वक़्त के कुछ गुजरने के बाद मुझे एहसास होता है कि यहाँ जिस वैचारिकता का वादा था वो तो ये है ही नहीं. शायद मैं वो नहीं हूँ जो मेरे सामने घटता हुआ मुझे दीखता है. धीरे धीरे, परत दर परत जब वही बातें बार बार होने लगती हैं , घिस कर वो मुझे वो शोर लगती हैं. अपने मायने खो बस किसी रिकॉर्ड की तरह बजती हुई.

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि उन बातों का कोई मतलब नहीं है या वो व्यर्थ हैं, यह बस इतना है कि वो मेरी बात नहीं है. मैं या तो उसे पूरी तरह से समझ नहीं पाता या कुछ और है जो मैं समझता हूँ. यह समूहों का तालाब जिसे मैं गहरा मान कर उतरता हूँ वो बस मेरे पाँव ही भिगा पाता है. मेरे शरीर का एक बड़ा हिस्सा अभी भी वैसा ही सूखा है. "मैं यह तो नहीं" का एक मुरझाया सा विचार मुझतक आता है और असहज कर जाता है. मैं सहज होने की कोशिश करता हुआ और असहज होता जाता हूँ. मैं ऐसी जगह बहूत देर तक नहीं रह पाता. मुझे डर लगता है कि मैं बस अगले ही क्षण कुछ ऐसा बोल दूंगा कि सामने वाले लोग बिदक जाएंगे. क्योंकि उनको मुझसे कुछ उम्मीदें हैं कि इसे ऐसी नहीं ऐसी बात करनी चाहिए. पर शायद नहीं... मैं वो हूँ ही नहीं जो वो मुझे अब तक समझ रहे थे या जो मैं खुद को समझ रहा था. मुझे खुद नहीं पता मैं क्या हूँ.


हाँ, इतना जनता हूँ कि मैं अपने संबंधों में बहुत डरपोक आदमी हूँ. मैं जब भी किसी कनफ्लिक्ट में पड़ता हूँ, बहस करता हूँ तो एक लड़ाई मेरे अन्दर भी तन जाती है, जो सामने सबकुछ ख़त्म होने के बाद भी बहुत देर तक चलती रहती है. मुझमें जिरह या बहस करने की ऊर्जा नहीं है. मुझे यह ख्याल ही अब किसी जोंक के खून चूसने सा लगता है. मैं अपनी ऊर्जा किसी कंस्ट्रक्टिव चीज़ के लिए बचा कर रखना चाहता हूँ. यह बस अपनी जगह बचने जैसा है. जिसके लिए ज़रूरी है एक समूह का हिस्सा बनकर उसमें रहते हुए भी ना रहना. अब अगर सामने वाला जब पूरी बात सुने या समझे कुछ भी बोलता है तो बस हंस कर रह जाता हूँ. मेरी हंसी बस एक अल्पविराम है जिसे लगा कर मैं उस कहानी को आगे बढ़ा देता हूँ.क्योंकि अभी मैं अपने जीवन को किसी क्रांति की तरह नहीं बल्कि किसी गीत की तरह जीना चाहता हूँ.

Tuesday, 7 February 2017

बिखरे पन्नों से: भाग २

कई दिनों का सोया वो फिर से जाग गया जैसे अधकची नींद में था. झट कर के ऐसे उसने अपनी उपस्थिति दर्ज की जैसे वो कभी सोया था ही नहीं. वो एक घाव सा था, जिसे फिर से छेड़ दिया गया हो... बहता हुआ घाव, बज्ज कर के फूटता हुआ... जैसे एक लकीर सा खून फूटता हुआ बह पड़ता है, बिल्कुल वैसे. उसने उसे छूकर देखने की कोशिश की पर छू नहीं सका, वो उसकी नज़रों से गायब हो चुका था पर उसकी टीस अभी भी वैसे ही मौजूद थी.

उसने उसके आसपास दीवारें बांध रखीं हैं... उन्हीं का एक ईंट निकल आया हो जैसे और कोई शीतलहर अन्दर तक अपने पूरे दबाव के साथ घुस रही हो, सायं सायं करते और शरीर छेद कर हड्डियों तक पहुँच रही हो. उसमे कट-कटाते दांत जोर से भींच लिए थे. वो खड़ा था वहीँ और इंतज़ार कर रहा था इसके गुज़र जाने का... पर कब तक.

हैरानी की बात यह थी कि इसे हुए, घटे, गुज़रे एक वक़्त होने को है, पर अभी अभी यह अचानक ऐसे कौंध गया जैसे अभी भी वहीँ कहीं छिपा हो. इस कौंधने वाली टीस से उसे हिला कर रख दिया था. उसने टीस के चेहरे पर गौर से देखा जैसे उसका सच देखने की कोशिश करता हो... वह सोचने लगा “मुझे सच्चाई कुछ और दिखती है. जानता हूँ वो वैसा नहीं जैसा दिखता है, या फिर वो वैसा ही है जैसा दिखता है...पर मैं ही उसे वैसा नहीं देख पाता? मैं अपनी कल्पना में ही रहता हूँ क्या? क्या मैं हमेशा अपनी कल्पना में ही था? क्या कल्पना और सच में भेद नहीं कर पाता? क्या हम सच और कल्पना को किसी सूप में फटककर अलग अलग नहीं कर सकते? कि ये रही कल्पना और ये रहा सच. जीवन कितना सरल हो जाता...पर शायद नहीं, पता नहीं ”

अब हर बार उसे देखते हुए जब सच दिखता है तो वो अपनी कल्पना की एक लकड़ी तोड़कर व्यावहारिकता की आग में डाल देता है, हर बार... बार बार... वो धूं धूं कर के जल उठती हैं. ये वो लकड़ियाँ हैं जिनसे वो अपना घर बना सकता था. जिन्हें उसने एक सुखद भविष्य की कल्पना करते हुए इक्कठा किया था. अब जलते हुए इनके पोरों के जलने पर चट्ट चट्ट की आवाज़ आती है. उनकी जलने की चट्ट की आवाज़ उसके अन्दर भी टूटती है. उस लकड़ी के जल जाने के बाद भी देर तक इनका धुँआ दूर ऊँचाई तक उठता दिखता है. उसके धुएँ में गुज़रे वक़्त की ख़ुशबू है, जो इसे बार बार जगाती है. वो कब ख़त्म होगा? शायद आखिरी लकड़ी के टूटकर पूरी तरह जलने तक. उस आखिरी लकड़ी के जलने में भी जाने कितनी चट्ट चट्ट की आवाज़ें और जाने कितना धुँआ शामिल होगा, वो सब उसे वहीँ खड़े रहकर सुनना होगा, देखना होगा और जीना होगा. पर अभी...  उसे भी पता नहीं ऐसी कितनी लकड़ियाँ अभी भी उसके पास जिंदा बाकी पड़ी हैं...


Monday, 21 November 2016

एक सोशल एक्सपेरिमेंट

इस बार इस विडियो में दो अजनबी मिलते हैं, पहले एक दूसरे की फेसबुक प्रोफाइल देखते हैं फिर बताते हैं कि उन्हें वो प्रोफाइल देखने के बाद उस व्यक्ति के बारे में क्या लगा. उसके बाद दोनों जब सामने मिलते हैं तो क्या होता है? जानने के लिए विडियो देखिए. इन दोनों में से एक मैं था.


Friday, 30 September 2016

कहानी: लत

हमारा नाम मोहम्मद मोजिद खान है. उमर इस साल अगस्त में सैतालिस हो जाएगी. धंधे से दर्जी हैं. यही एक काम हमको आता है और अब तक यही काम करते हुए ज़िन्दगी कट रही है. जब हमारी उमर कोई पचीस छब्बीस साल की थी तब भी हम इसी दानापुर में ही एक टेलरिंग दुकान में काम किया करते थे. घर से दुकान पहुँचने में पैदल आधा घंटा लगता था. हम घर से सुर्ती रगड़ते निकलते और रास्ता भर रगड़ते. जब दुकान पहुँचते तो मूंह में डाल लिया करते. अब सुर्ती ऐसी चीज़ है ना कि उसको जितना रगडा जाए उतना मज़ा देती है और सुर्ती का नशा वैसे भी कोई नशा नहीं है. ये तो बस एक मनोरंजन है.

तो एक रोज़ ऐसे ही हम अपनी धुन में मस्त सुर्ती रगड़ते दुकान की तरफ चले जा रहे थे. एकाएक एक ठो मारुती गाडी आकर हमारे बगल में रुकी. गाडी के अन्दर कोई बीस साल का लौन्डा बैठा था. उसको देख कर हम भी रुक गए. हमको लगा शायद कोई पता वाता पूछे. पर वो गाडी से निकला और सामने आकर के खड़ा हो गया, बोलाथोडा सुरती हमको भी दो ना यार.हमको बड़ा वैसा सा लगा कि ये आदमी जिसका कपडा लत्ता एकदम टीपटॉप है, मारुती में चलने वाला... भाई ये हमसे सुर्ती क्यों मांग रहा है. पर हमने उस दिन उसको कुछ कहा नहीं. अपने सुर्ती में से ही एक हिस्सा निकल के उसको दे दिया. वो उसको होठ के नीचे दबाया और निकल लिया. अब उस दिन के बाद तो वो रोज हमको उसी टाइम उसी जगह पर मिलने लगा. रोज मिलता, सुर्ती लेता, कुछ कुछ बात बनाता और चला जाता. कभी कभी हमको दस बीस रूपया देने की भी कोशिश करता, पर हमने हर बार उसको मना कर दिया. उसका पैसा कभी लिया नहीं. हाँ हम हर बार यह ज़रूर सोचते कि भाई ये जितना पैसा हमको दे रहा है, उतना में कितना सुर्ती खरीद ले, लेकिन ये हमसे मांग के क्यों खाता है. पर धीरे धीरे हमको पता चल गया कि किसी किसी का ऐसे मांग कर खाने का ही आदत होता है.

एक दिन जब वो हमको फिर से कुछ रुपया देने लगा, हम फिर से उसको मना कर दिए. तो कहने लगाठीक है पैसा नहीं लोगे तो चलो तुमको जहाँ जाना है वहाँ तक छोड़ दें.हम मारुती की तरफ देखे. इससे पहले हम कभी मारुती गाडी अन्दर से नहीं देखे थे. तो उसको मना नहीं किए और यही हमसे एक बड़ी गलती हुई. साला वो हमारा दुकान देख लिया. अब रोज़ कभी दुपहरिया तो कभी शाम को आ जाए, और लगे गप्प हाँकने. पर पैसा के मामला में वो आदमी दिलदार था, जब भी आए जवान कुछ ना कुछ खर्च करे. धीरे धीरे उसका और हमारा जमने लगा. वो भी अपने परिवार के बारे में हमको बताया हम भी अपना बीवी बच्चा के बारे में उससे बात करते. तब कुछ साल पहले ही हम बाप बने थे, इक्कीस साल की उमर में. वो दानापुर से ही ग्रेजुएशन किया था. उसके बाबू जी वहीँ कैंट में काम करते थे. खूब पैसा वाला था और यह दिखता भी था. हम उससे एक दिन पूछे किभाई बाबूजी का तो ठीक है. पर तुम को क्या करना है जिंदगी में?” ये सुन के वो हमको ध्यान से देखा और एकदम गंभीर हो के बोलाहमकोहमको जिंदगी में मजा लेना है.और बोल के हँस पड़ा.

हम दोनों का दोस्ती कुछ महीना का हो गया था. अब हम उसके लिए अलग से सुर्ती रगड़ कर उसको देने लगे थे. एक दिन वो हमसे कहने लगा किमोजिद भाई, तुमसे हमारा मन लगता है, तुम बाकी लौन्डों की तरह बकचोदी नहीं काटते. एक काम करो हमारे बंगले में आ के रहो. हमारे यहाँ कई सारा कमरा ऐसे ही खाली पड़ा हुआ है.हमने उसकी बात पर सोचा. उस वक़्त हम किराये के मकान में रहते थे. तो हमें उसकी बात भी ठीक लगी कि भाई वहाँ रहेंगे तो दो पैसा का बचत ही होगा. तो हम उसी हफ्ता में उसके बंगले के एक कमरे में शिफ्ट हो गए. अब उसका और हमारा टाइम ज्यादा साथ में बीतने लगा. रोज़ शाम को अब जब हम अपना दर्जी का काम कर के आते तो उठाना बैठना उसी के साथ होता. रात में खाना खा के हम अपना सुर्ती रगड़ते और वो पीताशराब अंग्रेजी’. एक दिन हमको पीने के लिए [पूछा भी. पहले तो हम उसको मना किए लेकिन ये कह के वो हमको थोडा सा एक गिलास में ढार के दिया किआज हमको तुम्हारे सुर्ती का एहसान चुकाने दो भाई.हम उस दिन पहला बार शराब पिए. ये शराब उसके बाबू जी को कैंट में मिलती थी. हमको थोडा देर बाद एकदम मज़ा आ गया. थोडा कडवा लगा था शुरू में पर थोडा देर बार शरीर एकदम रिलैक्स हो गया. अब जो है, हमको लगने लगा कि साला क्या चीज़ है शराब! हमको एकदम नया दुनिया में लेके गया. उस वक़्त तो एकदम ऐसा लगा जैसे दुनिया जहान का सारा टेंशन साइड लाइन हो गया

अब हम दोनों का रात में खाने के बाद पीना रोज का धंधा हो गया. कभी कभी दिन में सिर थोडा पकड़ता था लेकिन चाय वाय पीने के बाद ठीक हो जाता था. कुछ टाइम बाद उसने अपने बाबू जी से पैरवी लगा के हमको वहीँ कैंट में टेलरिंग का काम भी दिलवा दिया. बोला किजब तुमको टेलरिंग ही करना है तो यहाँ करो यहाँ पैसा भी अच्छा मिलेगा.पैसा सच में दुकान से अच्छा था. तो अब हम दुकान का नौकरी छोड़ के वहीँ बटालियन का कपडा सीने लगे. फौजी लोग का वर्दी. धीरे धीरे वहाँ काम इतना होने लगा कि हम रात रात भर काम करने लगे. तब भी जो है काम पूरा ना पड़े. काम बढ़ता जाता था टेलर बढ़ते नहीं थे. टेंशन बहुत ज्यादा और अब इस टेंशन में हम शराब पीना और ज्यादा कर दिए. लेकिन कुछ दिनों के बाद हमको लग गया कि इतना काम तो हमसे ना हो पाएगा. फिर एक दिन खीझ के हम वो काम भी छोड़ दिए. उसी रात वो हमारा दोस्त हमको बताया कि उसकी नौकरी मद्रास (जो अब चेन्नई है) में लग गई है. वो कुछ दिन बाद मद्रास चला गया और हम अपना परिवार ले के उसके बंगला से बाहर एक मकान किराया पर ले लिए. फिर से पुराना टेलरिंग दुकान पर काम करने लगे.
लेकिन उसके जाने से एक बात यह खराब हुआ कि अब हमको फ्री का शराब नहीं मिलता. पर आदत हो गई थी पीने की. तो हम अब रोज़ शाम को घर आते हुए शराब का एक छोटा वाला बोतल भट्टी से खरीदने लगे. रास्ते में खोल लेते और घर आते आते ख़तम कर देते. धीरे धीरे शराब का खर्चा चालीस रुपया से बढ़ के नब्बे रुपया हो गया. थोड़े दिन में ही हमको ये बात पता चल गई कि हमारा दो सौ रुपया रोज के कमाई में हम इतना खर्च नहीं कर पाएँगे. लेकिन हमको शराब तो चाहिए था. तो अब हम प्लास्टिक वाला पाउच मारने लगे. लेकिन पाउच कहाँ बराबरी करे अंगरेजी शराब का. उसमे ना तो अंगरेजी वाला मज़ा था ना अंगरेजी वाला नशा. लेकिन क्या करें…? तो अब हम उसका मात्रा बढ़ा दिए. वो मात्रा बढती ही गई और धीरे धीरे खर्चा फिर से उतना ही पहुँच गया.

शुरू शुरू में तो हमारी बीवी समझ जाती थी कि हम पी के आ रहे हैं, लेकिन कुछ कहती नहीं थी. पर अब हमारी हालत ऐसी हो गई कि अब साला रे... हमको सुबह उठते उठते चाहिए. और जब एक बार शुरुआत ही उसी चीज़ से हो गई तो अब दिन भर चाहिए. अब हमारा सुबह, दोपहर, शाम सब एक हो गया.

धीरे धीरे आदत और बिगड़ी. कोई मोहल्ला का आदमी कोई रिश्तेदार, कोई जानकार हमको मना भी करता तो हम उसको गरियाने लगते. हमको लगता ये हमको क्यों बोल रहा है? इसके पैसा का थोड़े पी रहे हैं हम. हम पूरे दिन धुत्त रहते. टेलरिंग का काम भी छूट गया. हम हर शाम को भट्टी पर चले जाते और पीते रहते. उस वक़्त तो ऐसा लगता था कि हमारे नस में खून के जगह दारु बहने लगा है. घर में न बच्चा का ख्याल है ना बीवी का. हर टाइम बस एक ही बात का रट लगा हुआ है कि पीना है... पीना है. जबकि ऐसी बात नहीं है कि हमको पता नहीं चल रहा था कि हमारी ज़िन्दगी किस तरफ जा रही है लेकिन उसके ऊपर हमारा कोई कंट्रोल नहीं था. हम अपना कण्ट्रोल साला दारु के हाथ में दे दिए थे.

घर का हालत बिगड़ता जा रहा था. हम सब देख रहे थे अपने सामने खुद को बर्बाद होते हुए अपना घर बर्बाद होते हुए. इसी हमारे बच्चे का स्कूल में एडमिशन हुआ. स्कूल जिनका था वो जानने वाले थे तो उन्होंने उसका कोई पैसा नहीं लिया. बस बोला कि आप लोग इसके कॉपी किताब और ड्रेस का खर्चा देख लीजिएगा. पर जब हम अपना हिसाब लगाए तो पता चला कि घर में उतना पैसा है ही नहीं. अब हमारे पीने से पैसा बचे तब तो कुछ और काम हो. हमने अपने दोस्त लोग से इस बारे में बात किए, लेकिन वो सब उधार देने से मना कर दिया. दरअसल बात ये थी कि जब कोई बेवडा आदमी पैसा माँगता है तो लोग को लगता है कि बहाना बना रहा है. इसका तो ये शराब पी जाएगा. भले ही उसका सच में कुछ ज़रूरी काम हो. लकिन कोई उसके बात को पर्तियाता नहीं है. धीरे धीरे समाज उसका बहिष्कार करने लग जाता है. तो हमको भी किसी ने उस दिन पैसा नहीं दिया. ये बात हमको कहीं ना कहीं लग गई.

उसी दिन जब हम शाम को भट्टी पर बैठ के पी रहे थे तो हमारे अन्दर से एक आवाज़ आई. अब देखिए, आपको कोई और बताए ना बताए लेकिन आपका अंतर्मन आपको बताता है कि बाबू तुम सही कर रहे हो कि गलत. उस दिन हम खुद सोचे कि हम जो है... कर क्या रहे हैं? अपने आप से सवाल किए और फिर अपना नाम ले के सोचे कि मोहम्मद मोजिद खान, आज जितना पीना है उतना पी लो, और अगर आज के बाद तुम शराब को हाथ भी लगाया तो एक बाप का औलाद नहीं... उस दिन वहीं बैठ के हम खूब पिए. रोज से ज्यादा पिए पर ये सोच के कि आज आखिरी बार पी रहे हैं.

अब क्या है कि अगर कोई और आपको कुछ समझाए तो बात समझ नहीं आती है लेकिन उस दिन हमको ये बात एकबाएके समझ में आ गई थी. अगला दिन से हम शराब को हाथ भी नहीं लगाए. मन तो बहुत करता था कि थोडा पी लेते हैं, पी लेते हैं. लेकिन हमने कहानहीं’, जब एक बार मन बना लिए तो उसपर अटल रहना है. पर यह काम बहुत मुश्किल था. थोडा थोडा देर पर तलब उठता, चिडचिडापन होता, बेचैनी होता. हम ही जानते हैं हम उससे कैसे पार पाए. पर अब जब हमको शराब पीने का तलब लगता तो हम चाय पीने लगे. भट्टी के आस पास से गुज़रते तो दौड़ के पार कर जाते कि हमको इसके सामने ज्यादा देर रहना ही नहीं है. अपने पास फ़ालतू पैसा रखना भी छोड़ दिए. अब जब हम रात में घर जाते तो हमारी बीवी को पता चल जाता कि ये पहले जैसा हालत में अब घर नहीं आता. फिर एक दिन उसने हमसे इसके बारे में पूछा किआजकल पी के नहीं आते..?” तो हम इसका जवाब उसको दे नहीं पाए बस यही बोले किछोडो वो सब फालतू बात, नींद आ रहा है.उसके बाद से हमारी उससे इस बारे में कभी बात नहीं हुई. धीरे धीरे हमारी भी आदत छूटने लगी. गली मुहल्ला में भी धीरे धीरे लोगों को पता चलने लगा कि हम शराब छोड़ दिए हैं. बीवी भी खुश थी, कहती नहीं थी पर हम जानते हैं वो खुश थी.

इस शराबी बेवडे की स्थिति में हम तीन साल रहे थे. जीवन नरक हो गया था. लगता था कि हमारा बच्चा जो बड़ा हो रहा है उसके सामने क्या संस्कार दे रहे हैं हम. लेकिन महसूस तब हुआ जब खुद महसूस किए. इसी बीच वो मारुती वाला हमारा दोस्त एक दो बार दानापुर आया, हम उससे मिले भी, कहे किये क्या आदत डलवा के मद्रास चले गए तुमतो वो हँसने लगा. कहने लगाहम तो अभी भी रोज का दो पेग ही पीते हैं, तुमको ऐसा आदत कैसे धर लिया?” हम उसको कुछ नहीं बोले. खैर अब तो उस बात को बहुत साल हो गया. तब से हम शराब को हाथ भी नहीं लगाए. अब अपनी टेलरिंग की दुकान खोल ली है, अपना काम करते हैं. पर दुकान अभी भी घर से वही आधा घंटा के दूरी पर ही रखे हैं. सुबह सुबह घर से दुकान सुर्ती रगड़ते हुए पहुँचते हैं, रास्ते भर रगड़ते जाते हैं और जब दुकान पहुँचते हैं तो मूंह में डाल लेते हैं. क्योंकि सुर्ती ऐसी चीज़ है ना कि उसको जितना रगडा जाए उतना मज़ा देती है और सुर्ती का नशा वैसे भी कोई नशा नहीं है ये तो बस एक मनोरंजन है.

Monday, 15 August 2016

बिखरे पन्नों से: भाग १

खुद को जानना कई मायनों में खुद से ही एक लड़ाई है. जिसे हम ‘जिया जा चुका’ कहते हैं वो दरअसल काफी वक़्त तक साथ चलता है. खुद से होकर गुज़रे हुए वक़्त का काफी हिस्सा अन्दर पड़ा रहता है... हम हर क्षण कुछ और होते हुए, कुछ और हो रहे होते हैं. जीवन के अलग अलग चरणों को पलट कर देखूँ तो खुद के बारे में यह कह सकता हूँ कि मैंने अलग अलग दृष्टिकोणों और अनुभवों को जिया है. यह सिर्फ अलग अलग वक़्त पर बन जाने वाला अलग अलग किरदार नहीं है, यह वो है जो बीत चुका है और वह भी है जो कल आने वाला है. किस पड़ाव से कितना चला जा चुका है और अभी और कितना चला जाना है कह पाना मुश्किल है. इसी बीते हुए और आने वाले के बीच मैं खुद को बस चलता हुआ पाता हूँ. एक ऐसे मिट्टी के लोदे की तरह जिसे एक मुर्ति से तोड़ कर निकाला गया हो और उसी से दूसरी मुर्ति बनाने की तैयारी हो रही है. पर मैं इस वक़्त दोनों में से कोई भी मूर्ति नहीं हूँ...मैं वह सना हुआ मिट्टी का लोदा हूँ जिसे वक़्त अभी सान रहा है.

जो जिया जा चुका है उसमें बहुत कुछ सहना भी शामिल है पर सहन कर जाना हमें मजबूत नहीं बनाता हाँ सचेत ज़रूर कर सकता है... हमें वो आँखे दे देता है देखने के लिए कि “देख लो ये भी है.” और फिर हम खुद से खुद के लिए शातिर बनने का अभिनय करते हैं दरअसल हम डरे हुए हैं, हम जीवन को सहना नहीं, जीना चाहते हैं. और यही जी लेने की इच्छा हमें हमेशा सचेत करती रहती है. जिसका शिकार होता है वो जो अभी जिया जाना बाकी है.

पर इन सबमें जो एक खूबसूरत बात है वो ये कि मैंने हर बार अपने ‘जिए जाने वाले’ से ‘जिए जा चुके’ शातिर और डरे हुए व्यक्ति को हारता हुआ देखता हूँ. हर बार जीवन मुझे जीवन बन कर ही मिलता है और मेरे पूर्वाग्रहों को तोड़ता है. जीवन जो बढ़ा जा रहा है उसे हर बार, यह बात सुकून देती है कि उसके बुरे अनुभवों की हार हुई है, जीवन वहाँ से कब का आगे निकल चुका है. यह इस बात की तसल्ली है कि जो वक़्त का मेहमान है उसे वो सब कुछ फिर से नहीं सहना होगा. हाथ का एक बार जलना या दस बार दोनों ही उतने ही दुखद हैं. इस हार पर पेट में एक फ़व्वारा फूटता है जो अपनी ही हार का जश्न मनाने जैसा है और खुद से सवाल भी कि जो हम जी चुके हैं उसके आगे कितना कुछ है जो हमारा इंतज़ार कर रहा है, जो अभी जीया जाना बाकी है. धीरे धीरे मेरे पूर्वाग्रह टूट रहे हैं, जीवन दिख रहा है, मुझे इस सन रही मिट्टी से बनने वाली नई मुर्ति का इंतज़ार है...

Sunday, 17 July 2016

जीवन की नोख़ पर

अभी नज़र घुमा कर आस पास देखा. मेरी कॉफ़ी का मग., पानी की बोतल, डायरियाँ, मेरी लिखने की टेबल, मेरा घर, कमरा, कहानियाँ, कविताएँ. सब कुछ ऐसा ही है जैसा थोड़ी देर पहले था. सब कुछ बिल्कुल वैसा ही पर कुछ बदला था.अचानक...

पूरे दिन में एक ऐसा पल आता है जब मैं एक अनजान सी ख़ुशी से भर जाता हूँ. अलसा कर चलता हुआ दिन एक बिंदु पर आकर सुख की नोख़ बन जाता है जहाँ से टप-टप कर के लगातार सुख चूता है, ख़ुशी चूती है. अभी ऐसी ही नोख के नीचे बैठा हूँ, तो मुझे लगा कि इसको लिख लेना चाहिए. आजकल पिछले एक हफ्ते से एक 'नई' कहानी पर काम कर रहा हूँ. नई पर ज़ोर इसलिए है भी कि जैसा या जो मैं लिखता हूँ उससे काफी अलग है ये. इस पर खूब सारी रिसर्च और कल्पना की एक कसी हुई उड़ान की ज़रुरत है. कहानी का ना लिखा जाना या ना लिख पाना एक थका देने वाला है, इससे उलट लगातार लिखते रहना किसी भाप भरे इंजन का छुक-छुक कर के चलते रहना. पर ऐसे ही अलसाए हुए थकान भरे दिन में ली हुई झपकियों में भी इसके पात्र आपस में बात करते रहते हैं, अपना रास्ता ढूंढते रहते हैं और मुझे आलस को बीच से तोड़ तोड़ कर अपने मोबाइल में ही इनके संवाद और मनस्थिति रिकॉर्ड करने पर मजबूर करते हैं. दूसरी तरफ अलग अलग किताबों की अपनी अलग दुनिया है जो मेरी छोटी से लाइब्रेरी (यह लिखते हुए मुझे बहुत ही अच्छा सा लगा, शायद इसलिए कि यह होना मेरा सपना) से झांकती रहती है. दुनिया में कितना कुछ है पढने के लिए, उस कितने कुछ में से एक ज़रा सा कुछ मैंने अपने पास रखा है जिसे मैं जल्द से जल्द पढ़ लेना चाहता हूँ. इसकी सोच भी एक सुकून एक से भर देने वाली है शायद यह सबकुछ जो आस पास चल रहा है या जो घट चुका है शायद उसमें अपनी परछाई ढूंढ लेने का सुकून है.



आज कल इस नई कहानी की रिसर्च के सिलसिले में जब भी ऑनलाइन आकर थोड़ी रिसर्च करता हूँ तो इस 'कितना कुछ पढने' में बहुत कुछ नया जुड़ जाता है साथ ही दूसरी तरफ कविताओं का दौर है. जो मुझे अपनी तरफ खींच लेता है. यह सब कुछ एक साथ करने की इच्छा के फैलाव में इतना नुकीलापन है कि यह एक तरह का सुख देता है, जिससे में बैठे बैठे ही भरने लगता हूँ. इस सुख को जो ख़ुशी है मैंने पहले भी कई बार महसूस किया है पर इस तरह से लिखा कभी नहीं... आज लिख रहा हूँ. हमने अपने सुखों को कितना कम लिखा है, जीवन को जीवित समझकर कितना कम जिया है. जीवन को इस नोख पर कितना कम जिया है.

Saturday, 16 July 2016

आश्चर्य कैसा

आश्चर्य कैसा
जब शून्य से एक के बीच हैं
अनगिनत संख्याएँ
नींद से जागने के बीच
अनगिनत पड़ाव सपनों के 

सागर तक पहुँचते हुए
जाने कितनी बार बहती है नदी
और सात सुरों के बीच भी तो
बजता है अपार संगीत

जब एक कण में छुपा हुआ है
जीवन' का रहस्य
शुरू होने से अंत तक इसके

तो बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं
मेरा तुम्हें ढूंढ लेना 
हर प्रेम कहानी में

हमारे बीच
प्रेम के इतिहास का होना
कोई भी आश्चर्य नहीं

तुम्हारी याद में
मेरी आँखों से निकलती
एक गुनगुनी बूँद
उसके आँखों की है
जिसने सबसे पहले प्रेम किया था

मेरे अन्दर दौड़ती
इस लहर को,
इस सांय सांय पुरवाई को
वो भी महसूस करेगा
जिसे प्रेम आखिर में पालेगा


हम दोनों के बीच
जो भी है, कुछ चलता हुआ
बदलता हुआ 
उसमें कोई भी आश्चर्य नहीं..

Monday, 13 June 2016

डिअर भावना.

एक देश के रूप में हमने हमेशा से ही दिखने से ज़्यादा ना दिखने वाली चीजों को महत्त्व दिया है, परवाह ज़्यादा की है. जीवित से ज़्यादा पूज्य वो है जो मृत है. जो हमें दिखता नहीं वो देवतुल्य हो जाता है जैसे कोई बात समझ ना आने पर गहरी बात... हमारी बात बात पर आहात होती 'भावना' भी ऐसी ही अदृश्य शक्ति का उदाहरण है. ऐसी सारी अदृश्य शक्तिओं के बचाव के लिए किए जाने वाले यत्न पुरखों के नाम पर किया जाने वाला वो पिंडदान है जिसपर कोई भी सवाल नहीं उठाता बस कर देते हैं. इसकी बात करो तो सारे जीवित मुद्दों को एक तरफ करते हुए अचानक 'भावना' सर्वोपरि हो जाती है. आहात भावना का मानना हमारे और लोकतंत्र की मौलिक ज़रुरत बन जाता है. पर हमें पता नहीं कि भावना का इस बारे में क्या कहना है. वो सोचती क्या है?...तो यह चिठ्ठी एक कोशिश है उससे बात शुरू करने की उसे समझने की कि इसके बाद उन मुद्दों पर भी बात की जा सके जो ज़िंदा है, जो ज़रूरी हैं...जो दिखते हैं.


"देखिए दोस्त मिहिर देसाई द्वारा निर्देशित, मेरे द्वारा लिखी हुई 'डिअर भावना' स्वानंद किरकिरे साब की अद्वितीय आवाज़ में."


अपडेट: मेरे पसंदीदा फ़िल्मकार अनुराग कश्यप को डिअर भावना पसंद आई और उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इसे शेयर किया .





Saturday, 28 May 2016

जानकी पुल पर इस महीने पाँच कविताएँ छपी है. पढने के लिए लिंक पर जाएँ.
प्रभात रंजन जी का बहुत बहुत शुक्रिया.

यहाँ क्लिक करें