Tuesday, 31 December 2019

आरएसएस (शाखा) और मैं...

कुछ पंद्रह साल का था तब आरएसएस की शाखा जाना शुरू किया था। उस शहर में रहते कुछ आठ साल हो गए थे। दो से तीन किलोमीटर का शहर था वो, दोस्तों के साथ कभी पैदल-पैदल तो कभी साइकल पर ही पूरा नाप लेता था। सरकार निकम्मी थी तो सबका जीवन तरह तरह के सामाजिक और आर्थिक अभाव में बीतता था। अब परेशानी सबकी थी तो किसी को ज़्यादा खलती नहीं थी। लाइट नहीं आयी दो महीने तक, तो सबकी ही नहीं आयी। प्रशासन की हालत इतनी ख़राब कि हर छोटी-बड़ी कम्यूनिटी के अपने गुंडे होते थे। हिंसा में मरी लाश किसी चौक पर रखकर हो रहे प्रदर्शन कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। इसी बीच एक तबका वह भी था जो एनजीओ बना कर शहर की बेहतरी के लिए काम कर रहा था। और वहीं कहीं ना कहीं मेरी उम्र के बच्चे तलाश रहे थे एक बेहतर दिशा। उसके सबके अपने अपने रास्ते थे। मैं और मेरे दो दोस्त उस वक्त बाकी पत्र पत्रिकाओं के साथ विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस पढ़ रहे थे।समाज कैसा हो?’ इस पर भी उस वक़्त के हिसाब से कुछ दोस्तों से लगातार ईमानदार बहस होती। उन्हीं में से एक दोस्त ने मेरा परिचय पहले गायत्री परिवार से और फिर आरएसएस से कराया था।

शहर के बीच में एक टाउन हाईस्कूल था, जहाँ उस वक्त शाखा लगती थी। एक तरफ़ कुछ आठ-नौ लोग एकध्वजलगाकरनमस्ते सदा वत्सले...’ गाते, खेल होते, थोड़ा कराटे की ट्रेनिंग होती और बहुत सारी राष्ट्र निर्माण की बातें होतीं। मुझे अलग-अलग धर्मों के बारे में बहुत सी ऐसी बातें पता चलीं जो पहले पता नहीं थी। उसी मैदान में एक क्रिकेट की पिच थी। वहाँ कुछ बच्चे उसी वक्त क्रिकेट खेलने आते थे जिसमें ज़्यादा संख्या मुसलमान बच्चों की थी। (यह लिखते हुए मुझे कुछ के सफ़ेद कुर्ते और टोपी याद रहे हैं।)


मैं लगातार शाखा जाता रहा। मुझे धीरे-धीरेअखंड भारतके बारे में पता चला। मुग़लों के हमले के बारे में पता चला, पता चला कि कैसे हिंदुओं को हमेशा एक युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। 'अरे आप हिंदू हैं, आपके घर में लाठी नहीं है? साँप निकल आया तो कैसे मारेंगे? दुश्मन तो दुश्मन ही होता है।'


ये सब कुछ एक बेहतर भारत का वादा था। नमस्ते और प्रणाम जैसे शब्दों की जगहजय हिंदने ले ली। एक बार आरएसएस के किसी बड़े कार्यक्रम में भी जाना हुआ था। स्थानीय स्तर के बहुत से बड़े लोग आए थे। मैं पंद्रह साल का लड़का, देश के गौरव में अपना योगदान दे रहा था। खून में पहली बार गर्मी का एहसास हुआ था। इसी बीच एनजीओ वाले भी बुलाने लगे कविता पाठ के लिए तो वहाँ भी व्यस्त रहने लगा। सब अच्छा लग रहा था पर कुछ बदल रहा था जो शायद मेरे जीवन की पूरी दिशा निर्धारित करने वाला था।


आरएसएस की शाखा में कभी यह नहीं बोला जाता कि उन्हें मुसलमानों से कोई परेशानी है, पर हर बार इशारा ऐसा होता कि मुझे लगभग तीन महीने में ऐसा लगने लगा कि वो लड़के जो उसी ग्राउंड की पिच पर क्रिकेट खेल रहे हैं, हमारे देश की सारी समस्या उनकी वजह से है। वो हमारे दुश्मन हैं। मैं महसूस करने लगा था उस नफ़रत को अपने शरीर में। पेट में एक नफ़रत का गोला तैरने लगा था और ज़बान परजय हिंदहोता था। पर जैसे-जैसे वक़्त बीता, उस नफ़रत के साथ रहना मुश्किल हो गया, और ठीक-ठीक याद नहीं पर परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि मैंने शाखा जाना बंद कर दिया। 


उसके अगले साल दिल्ली गया था, चाचा के साथ रहने। वहाँ रहते हुए अगले तीन साल तक ओशो को पढ़ा। दिल्ली और ओशो ने मुझे बचा लिया। उस नफ़रत से बचाकर एकदम नया नज़रिया दिया। नहीं तो बहुत आसान था उस ज़हर में घुलकर ज़हर फैलाना और बाक़ी उन दोस्तों की तरह हो जाना जो बेचारे इस व्यवस्था से ये कभी नहीं पूछ पाए कि उनके हिस्से की नौकरी कहाँ है। बाक़ी सवाल तो हिंदू-मुस्लिम मुद्दे के नीचे कब का दम तोड़ चुके होंगे। मुझे दुःख होता है ये देखकर कि कैसे व्हाट्सएप्प आने से सालों पहले ही उस नफ़रत ने मेरे दोस्तों को बर्बाद कर दिया। मैं भी उनमें से एक हो सकता था, बहुत आसान था वह होना, पर शायद मेरी ख़ुशक़िस्मती थी कि मैं वो नहीं हुआ।


इसलिए अब जब आसपास उसी ज़हर को फैलता देखता हूँ तो दुःख होता है। उसी आरएसएस की शाखा फिर से अपने आसपास देखता हूँ तो लगता है कि बिना बताए एक पूरी पीढ़ी को एक अंधे कुएँ में धकेला जा रहा है। आज जो इस्लामोफ़ोबिक लॉजिक मेन्स्ट्रीम में गए हैं, मैंने वो पहली बार शाखा में सुने थे। वही लॉजिक जब पढ़े-लिखे लोग देते हैं तो लगता है इनको इतनी सी बात क्यूँ नहीं समझ रही या ये समझना नहीं चाहते। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिंदू समुदाय का एक बड़ा तबका चुपचाप आरएसएस को सपोर्ट करता है। कई बार ये भी सोचता हूँ कि क्या होता अगर हमारे घर के आसपास मुसलमान लड़कों का एक समूह तिरंगे के अलावा कोई और झंडा लगा कर सुबह शाम वही करता जो आरएसएस करता है। हमारा सहनशील समाज उसे कैसे देखता? यह सवाल हम सबको ख़ुद से पूछना चाहिए।


और जिन्हें भी आरएसएस का इतिहास और महत्त्वाकांक्षा पता है उन्हें ये भी पता होगा कि हमारी सत्ता देश को किस तरफ़ ले जा रही है। ये सब जानते हुए भी हमारी चुप्पी और तटस्थता इस बात के गवाह हैं कि इस ज़हर का एक अंश हम तक भी पहुँचा है। क्योंकि शाखा में किश्तों में डंडा पकड़ाया जाता है और दिमाग़ रख लिया जाता है। हम फिर उस डंडे से सबसे पहले अपनी इंसानियत को खदेड़ कर बाहर भगाते हैं।

Saturday, 9 November 2019



बहुत दिनों के बाद यहाँ लिख रहा हूँ। अक्सर मुंबई में यहाँ से वहाँ काम के सिलसिले में भागते हुए यहाँ आने का ख़याल आता रहा है पर हमेशा यही सोचा कि यहाँ तब ही लिखूँगा जब पैर पसार कर थोड़े इत्मिनान से बैठने का वक़्त होगा। यह मेरा अपना कोना है । वैसे वक़्त की कमी अभी भी है, पर फिर भी यह सोच कर लिख रहा हूँ कि कम से कम अपना पहला रिलीज़ गाना यहाँ  पोस्ट कर सकूँ। वैसे भी इस ब्लॉग की शुरुआत ऐसे ही किसी  सपने से हुई थी जब एक दोस्त ने मुझे अपनी बर्थ्डे पार्टी पर नहीं बुलाया था और मुझे इस बात का बहुत बुरा लगा था। तब उस दुःख में एक कविता लिखी थी और ब्लॉग शुरू किया था।

आज अपना पहला गाना जो मेरी तीसरी फ़िल्म का है वो शेयर कर रहा हूँ। यह बस एक इत्तफ़ाक़ ही है कि इन तीनों में जिस फ़िल्म के लिए सबसे बाद में लिखा वो सबसे पहले आ रही है और जिसके लिए सबसे पहले लिखा था (2017 में, कामयाब) वो जनवरी 2020 में। ख़ैर गाना पढ़िए और सुनिए। :)

Movie: Moothon (Promotional Song)
Music: Sagar Desai
Lyrics: Neeraj Pandey
Singer: Vishal Dadlani
Label: Divo


इतनी सी बात 
फटी में अडा दी 
मौक़ा मिला 
दुनिया उड़ा दी 

रखी बाँध कलाई
हर घुट्टी पिलाई 
कई घोर भलाई
भाई रे 

उसका है हाथ 
जान भिड़ा दी 
फूँक ऐसी मारी 
बदली हवा भी

कैसे जीना सिखाया 
पूरा धंधा बताया 
सब उसका ही साया 
भाई रे 

धाँय धाँय बजे हर जगह है ये ऐसा 
साँय साँय बहे बन के ख़ून में पैसा 

दी जी नज़रीया, बदली डगरीया 
चारों पहरीया रे 
लम्बा ये दरीया, मैं तो नहीं डरीया 
काटूँ कहरीया रे 

सारी नगरीया, सारी बजरीया
हमरी लहरीया रे 
ये तो है करीया, हम भी बचे ना 
सब ही हैं करीया रे

धाँय धाँय बजे हर जगह है ये ऐसा 
हाय हाय करे सब यहाँ है ये पैसा ऐसा





Thursday, 25 April 2019

वो संसार कैसा होगा? बिक्सू के बारे में।




जब कम पता था, दुनिया छोटी थी तो बाहर की दुनिया एक कल्पना होती है। उस कल्पना का अपना विस्तार था, उसके रंग ज़्यादा थे. इससे बाहर का संसार कैसा होगा? लोग कैसे होंगे? उनसे मिलना कैसा होगा? में कई सारी खुद के मन की कहानियाँ शामिल थीं। बाहर का संसार हमारी कल्पना का संसार था, anticipation और सम्भावनाओं से भरा हुआ। पर अब वो बीच चुका है या बीतता जा रहा है।

अब हमें सब पता है और जो नहीं पता वो बस एक गूगल सर्च की दूरी पर है। कल्पना की जगह रोज कम होती जा रही है। हमें तो अब यहाँ तक पता है कि ब्लैक होल कैसा दीखता है और पड़ोस वाली गैलिक्सी में क्या चल रहा है। पर ताजुब्ब यह है कि अब हरी मुलायम घास पर सुकून से बैठने वाले एहसास का एहसास नहीं होता। लगातार कहीं पहुँच पाने के क्रम में सिर्फ़ चलते जाने का सुख खोता जाता है।
किसी की याद आयी तो तुरंत ही बात कर ली। अब कोई इमेजिनेशन नहीं है कि वो अपने संसार में कैसा होगा? क्या कर रहा होगा? उसके जीवन में क्या घट रहा होगा? वो एक कल्पना की खिड़की हमारी ज़िन्दगियों में लगातार बंद होती जा रही है.
दो चिट्ठियों के बीच का इंतज़ार में एक संसार था. फ़ोटो की रील धुलने जाती थी उसके इंतज़ार का संसार था, वो खत्म हो गया है. और बिक्सू वो खोता हुआ संसार हमारे सामने दुबारा खोल कर रख देता है. हमें याद दिलाता है कि हम पीछे क्या छोड़ आए हैं और वो छोटी छोटी दिखने वाली बातों ने हमारे जीवन को कैसे एक तरह की दिशा दी है। इसको गोद में लेकर बैठना, अपने बचपन को गोद में लेकर बैठना है।
वैसे तो किताब पढ़ते हुए कई बार रोना भी आया पर एक जगह बिक्सू जाते हुए अपने लगाए हुए पेड़ से कहता है 'खूब बड़ा हो जाना रे पेड़, आकास छूना, हम जा रहे हैं हियाँ से'... आह! यह लाइन साथ रह गयी। बार बार पूरे दिन मन में आती रही। शायद ये मेरा कभी का जीया हुआ है। इसमें विहार है, प्रेम है, उम्मीद है, दोस्ती है और विस्थापन की टीस है. यह पढ़ कर मैं थोड़ा उखड़ा सा महसूस करा हूँ. समतल खेल की ज़मीन को जोत दिया हो जैसे। थोड़ी बारिश होगी तो थोड़ी देर में सब शांत हो जाएगा।

Thursday, 21 February 2019

आदत ख़राब है।

आदत बदलनी है। धीरे धीरे ही सही पर बदलनी तो है। पिछले महीने भर से ब्रेक पर था। थोड़ा ट्रैवल किया थोड़ा काम। इससे पहले ऐसा लग रहा था जैसे कुछ नया नहीं सोच पा रहा, काम करने की भगम भाग में लगने लगा था कि बस काम ही हो रहा है, कुछ नया सीख नहीं रहा हूँ। Calendar बताता था अब ये कर लो, अब ये, अब यहाँ चले जाओ और अब तुम्हें इस चीज़ को वक़्त देना है। मुंबई का ट्रैफ़िक अलग, शोर अलग। तो मैंने सोचा ज़रा रुकते हैं, आराम से चलते हैं, वैसे भी सब तो हो ही रहा है जो मैं चाहता हूँ। तो लगभग चार शहर घूमने के बाद मैं वापस मुंबई में हूँ। एक फ़िल्म पर काम चल रहा है, जो ब्रेक लेने से पहले से चल रहा है उसके लिए गाने लिख रहा हूँ तो अपने वक़्त में यह काम कर सकता हूँ, रोज़ कहीं किसी के पास जाना नहीं होता। पर ब्रेक लेने के दौरान मैंने अपना सारा रूटीन बदल दिया। अब रूटीन ऐसा बदला है कि सही होने का नाम नहीं ले रहा। रात में दो बजे सोता हूँ, सुबह दस बजे उठता हूँ, कॉफ़ी बनता हूँ और लैप्टॉप और मोबाइल के सामने बैठ कर कुछ कुछ टाइम पास करता रहता हूँ। तीन किताबें एक साथ पढ़ तो रहा हूँ पर वो भी ज़्यादा पढ़ नहीं पा रहा और इस ब्लॉग का याद किया तो याद आया कि इधर भी कई महीनों से कुछ नहीं लिखा। हाँ सोचा कई बार कि ये वाली बात लिख लेनी चाहिए पर लिखा नहीं। और फ़ोन पर बिज़ी रहने के कई सारे बहाने तो हैं ही, बाक़ी सफ़िया (मेरी बिल्ली) बचीखुचि कसर पूरी कर देती है। ख़ुद को इतना बिगड़ा हुआ देख कर लगा कि आदत ठीक करनी पड़ेगी। 

पिछले एक हफ़्ते में एक बात जो ठीक हुई है वो ये कि स्टैंडअप फिर से शुरू हो गया है। कल अचानक ही आदित्या ने मेसिज कर के पूछा कि बांद्रा में ओपन माइक करना है तो आ जाओ। मैं चला गया। जाते हुए मन अजीब सा ही था, लग रहा था क्यूँ जा रहा हूँ,  तैयारी तो ओपन माइक की भी नहीं है। वहाँ जाऊँगा जोक्स चलेंगे नहीं तो और बुरा लगेगा। ‘प्रोडक्टिव क्या कर रहे हो पाण्डेय?' का सवाल मन में कई बार आया। पर फिर भी मैं बांद्रा चला ही गया, अच्छी बात ये थी कि ओपन माइक उम्मीद से बेहतर हुआ। कई सारे जोक्स तो वहीं स्टेज पर ही आए, लोग हँसे तो अच्छा भी लगा। पर आदत में धीरे धीरे सुधार करना है वाली बात अभी भी चल ही रही थी। तो घर आकर फ़ोन हॉल में ही रख दिया और आजकल मैं रोल ढाल की 'मटिल्डा' पढ़ रहा हूँ तो उसे लेकर अपने बेड रूम में चला गया। (डिस्ट्रैक्शन: अभी अभी यह लिखते हुए फ़ोन बजा, देखा तो एक काम का मेसिज था, उसे रिप्लाई करने गया तो चार और मेसिज दिख गए। सोचा उनका भी रिप्लाई कर दूँ। फिर पता नहीं कैसे, वट्सऐप से इंस्टा पर चला गया। और कुल दो-तीन मिनट डिस्ट्रैक्ट होने के बाद यहाँ आया हूँ। कितनी टफ़ है इस एज में एक राइटर की ज़िंदगी। बकवास) ख़ैर मैं अपनी बात पर वापस आता हूँ। फ़ोन हॉल में रखा क्योंकि अगर पास में फ़ोन होता तो मैं किताब कम पढ़ता और फ़ोन ज़्यादा देखता। मैंने सोचा कि क्या मैं घर में रहते हुए अपने मोबाइल का इस्तेमाल लैंडलाइन की तरह नहीं कर सकता? जीवन में हर चीज़ की तरह इसे भी कर के देखने में कोई नुक़सान नहीं था। तो पूरे टाइम फ़ोन रिंगर पर पड़ा हुआ हॉल में रखा रहा। मैंने मटिल्डा के कुछ तीस पेजेज़ पढ़ कर ख़त्म किए। अच्छा लगा कि कुछ तो किया। रात के बारह बज चुके थे और आज का दूसरा टारगेट था कि थोड़ा जल्दी सोना है। रात के दो बजे सो सो कर ऐसा लग रहा है जैसे शरीर फैलने लगा हो, कुछ दिनों से सुस्ती महसूस कर रहा हूँ। तो कमरे की लाइट बंद करी और पुराने वक़्त को याद करता हुआ आँखें बंद कर लीं, जब मुझे सुबह उठकर ऑफ़िस जाना होता था। नींद भी जल्दी आ गयी। आज सुबह दस बजे नहीं पर नौ बजकर तीस मिनट पर उठा। यह एक छोटी सी अचीव्मेंट है मेरे लिए।

दूसरी तरफ़ फ़ोन की अलग कहानी हैं। सौरव ने एक मोबाइल अडिक्शन ट्रैकिंग ऐप्प के बारे में बताया था कि वह डालने से पता चलता रहेगा कि मैं फ़ोन का इस्तेमाल कितना कर रहा हूँ। उसकी डिफ़ॉल्ट सेट्टिंग जोकि 50 बार फ़ोन unlock करने देती है और डेढ़ घंटे का टाइम फ़ोन के इस्तेमाल के लिए देती है, वो इतने वक़्त को अड्डिकटेड की श्रेणी में रखती है। मैंने परसों अपना फ़ोन 184 बार अन्लॉक किया था और कुल चार घंटे से ऊपर इस्तेमाल किया था। मतलब मैंने अडिक्शन के लेवल से भी दो तीन लेवल ऊपर हूँ। हद है। कल मैंने अपना फ़ोन 134 बार और साढ़े तीन घंटे इस्तेमाल किया। परसों के मुक़ाबले यह थोड़ा कम है पर accidentle है और कहीं से भी healthy नहीं है। काम के साथ distraction का तो आप पूछो ही ना।

मेरी बहन निधि को मैंने अपनी इस हालत के बारे में बताया तो वो आश्चर्य कर रही थी। कहने लगी ‘इतना फ़ोन कैसे इस्तेमाल करते हो भाई तुम?' मैंने उसके फ़ोन में भी वो ऐप्प डाला। पता चला का उसने अपने फ़ोन को 118 बार अन्लॉक किया था और पाँच घंटे से ज़्यादा इस्तेमाल किया था। यह देखकर मैंने तो उसे छेड़ा पर वो भी आश्चर्य में थी। कह रही थी 'यार पता ही नहीं चलता पाँच-पाँच मिनट कर के कैसे इतना टाइम हो जाता है। मैं ध्यान रखूँगी।' 

मेरे फ़ोन में भी वह ऐप्प चल रहा है और मैं वैसे भी ध्यान में रख रहा हूँ कि अगर चार काम हैं फ़ोन पर तो एक बार में निबटा लिया जाए। सुबह उठकर पहले कुछ लिख लिया जाए। अपनी कहानी, अपना ब्लॉग, कुछ पढ़ लिया जाए। नहीं तो आस पास डिस्ट्रैक्शन बहुत हैं। जैसे अभी यह लिखते हुए ही बार बार कॉफ़ी पीने का मन कर रहा है। पर घर में कॉफ़ी ख़त्म है। अब सोच रहा हूँ नीचे दुकान से लेकर आऊँ या अभी रहने दूँ। आज के वक़्त में हेमलेट होता तो इसी कशमकस में ‘To Be Or Not To Be’ पूछ रहा होता।

पर अभी आज अपनी कहानी पर काम करना बाक़ी ही  है। शाम पाँच बजे अंधेरी में म्यूज़िक डिरेक्टर से मीटिंग है। बुकोव्स्की का एक फ़ोटो भी कल फ़्रेम करने को दिया था वो भी लाना है, वो मैं मीटिंग से पहले जाते जाते ले लूँगा। उसके लिए अलग से जाऊँगा तो और टाइम ख़राब होगा।  मैं अपने दिमाग़ में दिन थोड़ा वैसे प्लान कर रहा हूँ। प्लान करना पड़ेगा नहीं तो समय से बड़ा जेबकतरा कोई भी नहीं। 

वैसे इसी बारे में लिखते लिखते आज कुछ लिख लिया। दिन की शुरुआत तो अच्छी हुई है। बाक़ी दिन भी अच्छा ही जाएगा।
पढ़ने के लिए शुक्रिया।




Monday, 1 October 2018

यही तो वजह है...

एक सुंदर दिन... जिसका नशा चढ़ना बस शुरू ही हुआ है। पिछले हफ्ते भर से नींद में भी काम कर रहा हूँ। दो काम एक साथ एक ही पड़ाव पर अपनी डेडलाइन ताक रहे हैं। दिन जल्दी शुरू हो जाते हैं और काम पूरे दिन का हर हिस्सा निचोड़ लेता है। रोज़ की तरह आज का दिन भी जल्दी शुरू हो गया था। पहला सेशन अंधेरी में चल रहा है और दूसरा बांद्रा में... आज पहला सेशन 9 से 2:30 तक चला... उसके बाद मैं ऑटो लेकर बांद्रा भागा और वहाँ 3:45 से काम शुरू किया। पहले सेशन में काफ़ी मज़ा आया था पर दूसरे सेशन को लेकर काफी तनाव भी था कि पता नहीं आज जितना तय किया है, उतना काम हो पाएगा या नहीं? आगे की कहानी क्या है? टाइम की कमिटमेंट थी जिसे लाँघना मुझे खुद से भी नाराज़गी से भर देता है।

मेरी को-राइटर और मैंने काम शुरू किया और धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे... बीच में मेरे मन में बार बार यह खयाल आया कि ये कैसे हो पायेगा? नींद भी पूरी नहीं हुई है और आज कोई स्पेशल फीलिंग भी नहीं आ रही कि आगे की कहानी क्रैक कर लूंगा... पर काम बीच में छोड़ कर खुद को किनारे कर लेना या बाद में कर लूँगा का बहाना करने के लिए भी वक़्त नहीं था। ये तो उसी वक़्त होना था। हमनें लगातार बात करना और लिखना जारी रखा... चाय पी, खाखरा खाया और एक दूसरे की मदद करते हुए काम करते रहे... और वाह! काम 6:30 तक हो गया था। मैं उस कमरे में इस उम्मीद से तो नहीं घुसा था।

इसबात का एहसास कि 'वो सबकुछ अब पेपर पर है, जो आज होना था' बहुत खूबसूरत था। कुछ तो ऐसा था जिसकी वजह से मैं शीशे के सामने नाच रहा था... यह बात भी मेरी को-राइटर ने ही मुझे बताई 'look at your mood now! You are dancing...' हाँ मैं नाच ही तो रहा था। जवाब में मैंने भी कहा 'YES! WE DID IT!' वो भी खुश थी... अब थकान जा चुकी थी... ऐसा लग रहा था जैसे सुबह सुबह एक सुंदर नींद के बाद आँख खुली हो... फ्रेश हो गया था मैं... डेडलाइन अभी भी वहीं है... अभी भी खूब सारा लिखना है... पर कई बार बस लिख देने के सुख का एहसास भी जीवित करने वाला है। आज की रात कल की सुबह को अपनी पीठ पर लाद कर नहीं लायी है, जबकि कल का दिन भी उतना ही व्यस्त होने वाला है... पर मुझे यह पता है कि आज नींद अच्छी आएगी... शायद यही वो सुख है जिसके लिए हमसब लिखना शुरू करते हैं। यह खुद में सम्पूर्ण है। मुझे खुशी है कि इस काम ने मुझे चुना है और मैं लिख पा रहा हूँ...