Thursday, 29 May 2014

तस्वीर हमारी

उसने कहा एक फोटो ले लूँ?
फिर मैनें भी कई पोज़ दिए.

कभी बाहें खोलकर आसमान में,
गगन को अपना मित्र बनाया.
कभी चौड़ी सी स्माइल देकर,
खुश हूँ कितना ये बतलाया.

हवा में खुद को उछाला जैसे,
बंधन अब कोई भी नहीं.
घूरा जग को ऐसे जैसे,
मुझसा विजेता और नहीं.

पर पल दो पल का अभिनय था वो,
खुद अपनी प्रस्तुति का.
सच तो छिपा है गहरा अंदर
अनुभव की अनुभूति का.

जाते ही वहाँ से उसके,
बाहें फिर से सिमट गईं.
गगन भी अब तो मित्र कहाँ था,
मुस्कान भी थोड़ी चिटक गई.

विजय भी दिखती कहीं नहीं अब,
बेड़ियाँ जकड़ी पाता हूँ.
तय करना भी मुश्किल अब ये
वो मैं था, या ये मैं हूँ?

तस्वीर हमारी हमसे अलग है,
हम ऐसी दुनिया में जीते हैं.
मुस्कान दिखाए फिरते सबको,
पर खुद में ही विष पीते हैं.

Thursday, 22 May 2014

क्या खोया,क्या पाया.

अन्ना हज़ारे के आंदोलन के वक़्त से एक बेहतर हिन्दुस्तान का सपना सबकी आँखो में पल रहा था. ऐसी ही किसी मूहीम और आंदोलन का सपना लेकर मैं भी बड़ा हुआ था, वो आज मेरे सामने था.  वैसे भी आज़ादी के बाद से कई पीढ़ियों ने इसका इंतज़ार किया था.तो मैं भी जूड गया. इंडिया गेट से लेकर राम लीला मैदान और जंतर मंतर से लेकर तिहाड़ तक की सडकें पैदल ही नापीं थी हम दिल्ली वालों और बाहर से आए लाखों लोगों ने. हर  आँख में एक बेहतर हिन्दुस्तान का सपना पलने लगा था. पर संसद के अंदर बैठे हमारे राजनेता "we the people" की जगह "who the people"  कहने लगे थे. कहते थे चुनाव लड़ लो अंदर आ जाओ और बना लो क़ानून, नहीं तो ये जैसा है वैसा ही रहेगा.

जनता ने चुनौती स्वीकार की "आम आदमी पार्टी" का गठन हुआ. लोग नौकरियाँ छोड़ छोड़ कर इस पार्टी से जुड़ने लगे,लोगों ने अपने घर का हिस्सा "आप" के ऑफीस के लिए दे दिया. क्या बूढ़े , क्या महिलाएँ और क्या जवान सब के सब इस सिस्टम से दो दो हाथ करने को तैयार थे. दिसेंबर २०१३ मे दिल्ली में चुनाव हुए आम आदमी पार्टी की सरकार भी बनी ,और पूरे देश में लोगों ने इस पार्टी की तरफ़ बड़ी उम्मीद से देखना शुरू कर दिया. पर सरकार ज़्यादा चली नहीं 49 दिनों के बाद सरकार गिर गई. लोगों के बीच अरविंद केजरीवाल की भगोड़ा वाली छवि बनाई गई. "आप" ने फिर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी की. देश भर में जगह जगह "आप" के ऑफीस खुल गये. आम आदमी पार्टी ने लोकसभा की लगभग ४३० सीटो पर चुनाव लड़ा और हार गई. नतीज़े सबको पता ही हैं.

पर लोकसभा चुनाव के बाद कुछ दिनों से हवा का रुख़ भी बदला सा है, सोशियल मीडीया पर भी और लोगों के जेहन मे भी. जो लोग आम आदमी पार्टी को कभी सपोर्ट करते थे आज अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बोलने लगे हैं, ड्रामा कंपनी करार दे दिया है.एक भी मौका नहीं छोड़ रहे भला बुरा कहने लगे और अचानक नरेन्द्रा मोदी के व्याक़तित्व की सराहना करने लगे हैं. यह उम्मीद अन्ना हज़ारे से  शुरू होकर अरविंद तक आई और अब मोदी उसके चेहरे हैं. कहीं का कहीं लोगो को लग रहा था की अरविंद ने उन्हें धोखा दिया या फिर उन्हें ऐसा सोचवाया गया. दूसरी तरफ केजरीवाल के समर्थक उनका बचाव कर रहे हैं और इस उम्मीद में है की हवा का रुख़ भी बदलेगा और फ़िज़ा का रंग भी. इस जमूरियत में सबका अपना सही है और सबके पास उसके सही की बही है. क्योंकि देश से मोहब्बत तो सभी को है, अब उस मोहब्बत के तरीके सबके अपने अपने हैं. उसपर बहस हो सकती है.

इस सारी कवायद को समझने के लिए इस चुनाव को समझना ज़रूरी है, इस चुनाव में सबने सपने बेचे, हर कोई यही कहता की मेरा सपना उसके सपने से बेहतर है. भाजपा के पास एक बड़ा मौल था कुछ पार्टियों के पास छोटी दुकानें थी और आम आदमी पार्टी ने तो पटरी पर ही दुकान लगा ली जिसमे मेरे भी पंद्रह सौ रुपये लगे थे. चमक धमक भाजपा की दुकान में ज़्यादा दिखी और उसका सेल्समैन भी हर दिन नये कपड़ों में आता था, जब देखो नया कुर्ता, जाने कितनी जोड़ियाँ थी. और अख़बारों रेडियो और टीवी पर आने वाले प्रचार ने भी भाजपा की अच्छी प्रस्तूती की. दूसरी तरफ नरेन्दर मोदी का विरोध तो किया गया पर उनका कोई बेहतर विकल्प नहीं दिया गया, और जो विकल्प थे भी वो भी गुजरात मॉडेल के सामने जनता को छोटे दिखे. पाकिस्तान और अमेरिका को इस चुनाव में एक दुश्मन की तरह रेखांकित कर यह बताया गया था की हमारे सबसे बड़े ख़तरे यही हैं, आम आदमी के मुद्दों मे रोटी कपड़ा और मकान के साथ पाकिस्तान, चीन और अमेरिका भी जूड गये. भाजपा का माल बिक गया. भाजपा जीत गई पूर्ण बहुमत से. देश को नरेंद्र मोदी जैसा एक कॉंग्रेस सरकार से बेहतर प्रधानमंत्री मिला. चुनाव के नतीज़े आते ही भाजपा के नेता न्यूज़ चैनल्स पर बैठ कर पाकिस्तान को धमकाने लगे. और जनता में टीवी को देखकर यह विश्वास जागना शुरू हो गया की ये सरकार मजबूत है. अब बस पाकिस्तान हमारे आगे घिघियाएगा. बहूत अच्छी बात है.

मैं किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं करूँगा, और ना ही इस चुनाव मे उपयोग हुए भिन्न भिन्न संसाधानो की, क्योंकि इस पर बहस चलती रहेगी, कोई ना कोई कहीं ना कहीं इस पर बहस कर ही रहा होगा. और वैसे भी इस पूरे वाकये में अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी या कोई व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण है भ्रष्तचार मुक्त भारत और आम आदमी की हालत में सुधार. इसलिए व्यक्ति विशेष की बात नहीं होगी. भाजपा जीत गई है, मोदी सरकार आ गई है और लोग अच्छे दिन का इंतज़ार कर रहे हैं. लोकतंत्र उम्मीद के साथ बेहतर विकल्प तलाशने से ही मजबूत होता है.

पर इस सारे क्र्म में ये जानना ज़रूरी है की इसमे भारत की जनता ने क्या खोया क्या पाया.

हमारे प्रधान मंत्री तो पहले से सशक्त हुए हैं पर ये भी उसी तंत्र का हिस्सा हैं,जिसमे जे. पी. आंदोलन से निकला हुआ लालू यादव चारा घोटाले का लालू यादव बन जाता है. ऐसे बहूत से उदाहरण  इतिहास के पन्नों मे दर्जहैं.

पर आज की संसद को देख कर दूःख इस बात का होता है की लोगों के बीच में पूरी बहस ही ग़लत फैलाई गई. चुनाव होते हैं सांसद चुनने के लिए ना की प्रधान मंत्री, लोगों ने प्रधानमंत्री चुनने के लिए भारी संख्या में अपराधी संसद के अंदर भेज दिए. जो लोगों के हित में कभी काम नहीं कर सकते.

कोई भी राजनीतिक पार्टी अभी भी RTI के दायरे मे नहीं आना चाहती.

लोगों को केजरीवाल के दिल्ली छोड़ने का गुस्सा ऐसा था की उन्होनें ईमानदार उम्म्मिदवार को वोट ना देकर अपराधी और दंगाई को वोट दिया.

जनता यह पता लगाने मे भी विफल रही की राजनीतिक पार्टियो के पास इतना पैसा कहाँ से कैसे और सबसे महत्वपूर्ण क्यों आ रहा है.

जो नेता गूरूर मे यह कहते थे की अंदर आकर अपना क़ानून बना लो उनका विश्वास और गहरा हुआ है की जनता को भटकना बहूत आसान है, भीड़ बकरी की तरह जहाँ चारा दिखाओ वहीं चली जाएगी. उनकी नियत अभी भी शासक की है ना की सेवक की.

अच्छा प्रधानमंत्री चुनने की दौड़ में हमने उन पढ़े लिखे लोगों, समाज सेवियो की अपेक्षा लोगों मे अपराधी चुन लिया है. ये तो शहद के साथ मधुमक्खीयों जो घर लाने जैसी बात है.

एक पूरी तरह से नई राजनीतिक बहस जिनका आधार मुद्दे थे, को फिर से एक व्यक्ति के इर्द गिर्द बुन दिया गया और हम लोगों ने एक नई चीज़ को भी पुराने चश्मे से देखते रहे. ये हमारी मानसिकता की हार है,

इस चुनाव के ठीक बाद दो लोगो को बोनस भी मिला है एक तो अरविंद केजरीवाल जेल की खिचड़ी खा रहे हैं और दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शपथ की बिरियानी, जो सच में दागी लोग हैं वो संसद में कुर्सियाँ गरम कर रहे हैं. अच्छे दिनों का आगाज़ तो मुझे अच्छा नहीं दिखता.

यह सपना इस सिस्टम को बदलने के लिए था, यह लड़ाई जनता का हक़ उस तक  पहुँचाने के लिए थी. ना की किसी पद पर पहुँचने की

मेरे जैसे लाखों युवा और बुजुर्गों की आँखों मे वो सपना तोड़ा धुंधला हुआ है, इस लोक सभा चुनाव में. पर जनता की उम्मीदें नरेंद्र मोदी से बहूत हैं, जनता  लगभग किसी चमत्कार की उम्मीद में है. आशा करता हूँ मोदी जी जिस पार्टी के सहारे प्रधानमंत्री बने हैं उसके नेताओं की उम्मीदों से उपर उठ जनता की उम्मीदों पर काम करेंगे. जनता को भी मोदी जी के किए हुए वादों का ट्रैक रेकॉर्ड तो रखना ही चाहिए. क्योंकि वक़्त है नरेन्दर मोदी को डेलिवर करने का और अरविंद केजरीवाल को अपनी ग़लतियो से सीखने का. जो भी हो इस बेहतर विकल्प बनाने की दौड़ में जीत जनता की ही होनी चाहिए. और चाहे  बहाना कोई भी हो लोकतंत्र के मुद्दे जनता के बीच बनें रहने चाहिए. क्योकि वैसे भी इस चुनाव में हार और जीत उन संस्थाओं की हुई है जिन्होने चुनाव मे अपना पैसा लगाया है. इंतजार है उस दिन का जब चुनाव जनता  के लिए होगा.

Sunday, 18 May 2014

दर्शक.

टी शर्ट और अपनी जीन्स को उतार कर मैंने नीली धारीदार शर्ट और काली पैंट, पहन ली थी. शर्ट भी बिल्कुल इस्त्री की हुई क्रीज़ वाली और काली पैंट तो जैसे उस शर्ट के रौब को और बढ़ा रही थी. बालों को सलीके से कंघी किया और खड़े होकर खुद को शीशे में निहार रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े इंटरव्यू के लिए तैयार हो रहा हूँ. तभी पास से गुज़रते हुए सलीम ने टेबल पर रखी हुई मेरी कैप उठाकर मेरे सर पर डाल दी, और यह बोलते मुझे मेरी हक़ीक़त की दुनिया में वापस ले आया कि: क्या हीरो? आज फिर से लेट, जल्दी तैयार हो जा बहूत काम है.

दरअसल मैं अभी अभी अपने रेस्टोरेंट पहुँचा, कुछ दस मिनट की देरी से, धौला कुआँ पर ट्रॅफिक भी तो बहूत था. खैर यह यूनिफॉर्म मुझे एक ज़िम्मेदारी का एहसास करता रहता है, मुझे लगता है मैं इस दुनिया में कुछ छोटा ही सही पर कुछ कर तो रहा हूँ, मेरी भी कुछ औकात तो है. पर मेरा ये एहसास तब टूटने लगता है जब मुझे महीने के आख़िर में पगार मिलती है, और मेरी औकात वहीं फर्श पर लुढ़कती नज़र आती है. अपनी सॅलरी तो नहीं बताउँगा, बस इतना कहूँगा की सॅलरी आने से पहले ही दोस्तों के उधार की लिस्ट मेरे दिमाग़ पर चिपकी रहती है और आधी से ज़्यादा सॅलरी पुराने उधार की भेंट चढ़ जाती है.

वैसे ये काम मैं पूरी ज़िंदगी नहीं करनेवाला, सोचता हूँ थोड़े दिनों काम करने के बाद किसी सरकारी नौकरी के लिए ट्राई करूँगा, उसकी तैयारी भी साथ के साथ चल रही है. पर पूरे दिन घर में बैठ कर पढ़ा भी तो नहीं जाता. पापा के गुज़र जाने के बाद वैसे भी माँ पर बोझ ही तो बना बैठा हूँ मैं, पिछले कई सालों से. इसलिए पार्ट टाइम में ये नौकरी पकड़ ली, पर पैसों और ज़रूरतों के जाल में मैं ऐसा फँसा की ये पार्ट टाइम सरकता हुआ फुल टाइम कब बन बैठा मुझे भी पता नहीं. और अगर सच कहूँ तो इसका दूसरा पहलू ये भी है की किस बेटे को अच्छा लगेगा की उसकी माँ दूसरों के घरों मे जूठे बर्तन साफ करे.. कितना अजीब लगता है जब मेरे दोस्तों को यह पता चलता है की मेरी माँ पास वाली कॉलोनी की कोठियों मे बर्तन साफ़ करती है.

पापा बिजली विभाग में आस्थाई कर्मचारी थे, एक दिन पोल पर बिजली ठीक करते हुए बिजली के नंगे तारो से चिपक कर उनकी मौत हो गई थी, बिजली विभाग ने भी यह बोल कर पल्ला झाड़ लिया कि आस्थाई कर्मचारियों को कोई मुआवज़ा नहीं मिलता. वैसे तो मेरा परिवार सरकार की बनाई हुई ग़रीबी रेखा के उपर आता है, पर बड़ी मुश्किल से जोड़ तोड़ करने पर भी महीनें की बीस तारीख तक पैसे ख़तम हो जाते हैं. उसके बाद ज़िंदगी उधार की...

इसी से नीज़ात पाने के लिए मैंने भी काम करना शुरू किया , पर कुछ ज़्यादा फ़र्क नहीं दिखता. मैं रोज़ एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरह सुबह सुबह नौ बजे तक अपने रेस्टोरेंट आ जाता हूँ. लोगों का ताँता भी उसी वक़्त से शुरू हो जाता है. अलग अलग ज़रूरतो के लिए मुझे भी कई बार अलग अलग काम करना पड़ता है. सफाई से लेकर काउंटर देखने तक तो कभी ऑर्डर लेने से लेकर ऑर्डर की होम डेलिवरी करने तक. सुना है मल्टिटॅस्किंग करनेवालों की तरक्की के आसार अच्छे होते हैं.

काउंटर के इस तरफ और दूसरी तरह होने से ही दुनिया बिल्कुल अलग दिखती है. यहाँ मैं कई बार काउंटर के इस तरफ खड़ा होकर दूसरी तरफ की अजीबो ग़रीब दुनिया को एक दार्शनिक की तरह देखता रहता हूँ, कई बातें तो मेरे सर के उपर से जाती हैं, लगता है या तो दुनिया मेरी पीठ पीछे निकल रही है या फिर मैं ही उल्टा बैठा हुआ हूँ. ऐसा लगता है जैसे पर्दे पर कोई फिल्म चल रही हो. या फिर कई सारे अभिनेता अपने चरित्र  के विपरीत एक चरित्र  ओढ़ कर एक साथ रंगमंच पर कोई नाटक कर रहे हों. भिन्न भिन्न पात्रों की भिन्न भिन्न परिस्थितियाँ और उसमें उनका भिन्न भिन्न बर्ताव.

जैसे वो लड़का कल आया था, काउंटर के पास आने से थोड़ी देर पहले तक अपने दोस्तों के साथ तो हिन्दी में माँ बहन की गलियाँ निकल रहा था, और मेरे पास आते ही अँग्रेज़ी में बोलने लगा.शायद उसे ऐसा लगा हो की मुझे सिर्फ़ अँग्रेज़ी ही आती है, अरे भाई हिन्दुस्तान के ही लोग हैं, हमें हिन्दी भी आती है. और उसकी अँग्रेज़ी भी ऐसी जो बस उसी को समझ आ रही थी. बाद मे मैंने ही हिन्दी में बात करनी शुरू की उससे.

उपभोगतावाद ने एक ग्राहक की हैसियत को भगवान के रूप से उतारकर एक बाज़ार के रूप में तब्दील कर दिया है. और वो ग्राहक अपनी भाषा छोड़कर प्रॉडक्ट की भाषा बोलता है. कई बार तो ऐसे लोगों पर हँसी भी आती है पर हँस भी नहीं सकता. प्रोटोकाल का मामला जो है. यहाँ तो बस हमें "गुड मॉर्निंग सर" के साथ नमस्ते करना बताया गया है. या फिर अँगरेज़ी की चार पाँच लाइनों जो हमें रेस्तूरेंट के मेनू के साथ मिट्ठू की तरह रटवाई जाती हैं.

वैसे यहाँ तो लोगों का ताँता लगा ही रहता है. कभी कोई अपने परिवार को लेकर आता है, तो कभी पास वाले ऑफीस का स्टाफ, तो कभी कॉलेज के स्टूडेंट्स ट्रीट करने आते हैं तो कभी खूबसूरत लड़कियाँ का पूरा समूह.

बीते हफ्ते भी एक लड़की आई थी, मैं तो ऑर्डर लेना ही भूल गया था, उसे देख कर. सोचा मुझे रटाई गई लाइनों और एक ग्राहक और काउंटर बॉय के दायरे से उपर उठकर कुछ बातें की जाए, पर यह सोच कर चुप रह गया की एक काउंटर बॉय में किसको क्या दिलचस्पी होगी.

पर कोई फ़ायदा भी नहीं किसी में दिलचस्पी ले कर. अपने ही रेस्टोरेंट में मैंने ऐसे कपल्स भी देखे हैं की उनके साथ होने पर भी उनकी ज़ुबान से ज़्यादा तो काँटे, छुरी और चम्मच आवाज़ कर रहे होते हैं.

मेरा तो पता नहीं पर मेरे रेस्टोरेंट का नये पुराने रिश्तो को बनाने में भी बड़ा सहयोग है. कोई इसी रेस्टोरेंट में आकर अपनी गर्लफ्रेंड को माना रहा होता है तो कोई ऑफीस की मीटिंग कर रहा होता है, लड़के लड़की देखने दिखाने के कार्यक्र्म मंदिर से उठकर अब रेस्टोरेंट में होने लगे हैं.

पर कुछ निठल्ले लोग भी हैं जो यहाँ बस AC  की हवा खाने के लिए बैठते हैं, कभी ऑर्डर देते नहीं देखा उनको. घंटो लैपटॉप खोलकर कुछ कुछ करते रहते हैं. और मैनेजर भी उन लोगों को कुछ नहीं बोलता, शायद उनके सामने रखा वो लैपटॉप उनकी औकात  बनाता होगा. नहीं तो उस दिन उस बाहर बैठने वाले भिखारी को तो अंदर आने से भी मेरे मॅनेजर ने रोक लिया था, और जब वो बोला की उसके पास पैसे हैं और वो कुछ खाना चाहता है, फिर भी उसको ये बोल कर बाहर कर दिया कि - कोई बात नहीं,जो भी चहिए बता दो हम बाहर ही भेजवा देंगे, अंदर आने की कोई ज़रूरत नहीं है.

बेचारा भिखारी. उसके किस्मत में फ्री AC की हवा भी नहीं है, पर तब तक उसके हिस्से की हवा ये लैपटॉप वाला प्राणी तो ले ही रहा है,वो भी  बिना कुछ ऑर्डर किए हुए. शायद इस बार भीख माँग कर वो भिखारी सबसे पहली चीज़ लैपटॉप ही खरीदेगा जो क्मसकम उसके अंदर आने का एंट्री पास तो होगा...

कई बार मुझे यह देखकर भी जलन होती है की मेरी जितनी तनख़्वाह है लोग एक बार में उससे ज़्यादा का ऑर्डर कर जाते हैं. और दुःख इस बात का भी होता है कि जितना ऑर्डर किया है उसमे से एक बड़ा हिस्सा कूड़ेदान को भेंट चढ़ता है. शायद ये वही लोग होंगे जिनके घरों मे मेरी माँ बर्तन मांजती हैं. और कई बार उनकी पार्टियों का बचा खाना और मिठाई हमारे घर ले कर आती है.

वैसे शाम के पाँच बज रहे हैं मुझे थोड़ी भूख सी लग रही है. दोपहर का खाना तो हमें यहीं मिल जाता है,पर दुबारा लेना हो तो उसके पैसे लगते हैं. चलता हूँ पास वाले "गुप्ता फुड कॉर्नर" पर अपनी भूख मिटाने, जो पास वाले नुक्कड़ पर अपनी रेडी  लगाता है, नहीं तो अगर मैने अपने रेस्तूरेंट मे दो दो बार खाना शुरू कर दिया तो कहीं महँगा खाना पेट के साथ  साथ मेरा बजट भी ना खराब कर दे क्योंकि इतनी रईसी की अभी आदत नहीं है.

Friday, 9 May 2014

एक घाव तुम्हारा

तुम्हारा दिया एक घाव था मेरी शक्ल पर, पिछ्ले कई महीनों से.
सुबह सुबह मुँह धोते उससे मुलाकात होती थी,
और हाथ भी बिना इजाज़त उससे मिल आया करते थे.

धीरे धीरे दोस्ती भी गहरी हो गई,उससे.
तुम्हारी गैरहाजरी में कई शामें उसके साथ ही तो बीती थीं.

हम दोनों में लुक्काछिप्पी का खेल भी होता.
कभी वो मुझे सताता तो कभी मैं उसे मसलता.

पर क्या करें, था तो एक घाव ही...

अब मैं रोज़ उसे चले जाने को कहता हूँ,
पर ये मेरी एक नहीं सुनता,
शायद उसे भी मेरे साथ ही रहना था.

...पर उस दिन आँख खुली तो वो जा चुका था,
शायद बुरा मान कर मेरी बातों का.

दर्पण उसके बिना अब मानों सूना सा लगता है,
और हाथ की उंगलियों को खिलौना नहीं दिखता है.

महसूस अब ये होता है, वो अपने ज़िस्म का  हिस्सा था,
जिससे है मेरी किताब बनी वो उसी का एक किस्सा था.

शक्ल है मेरी बेहतर अब, ये लोगों मे मशहूर है,
पर उसके बिना ज़िंदगी में कुछ कमी तो ज़रूर है.

Sunday, 4 May 2014

ख्वाबो की पोटली

तुम्हारे आने की खबर सुन
कुछ ख्याबों को पोटली में भीगो कर रख दिया है.

जो आज खास तुम्हारे लिए चुने थे,बड़े नाज़ूक हैं वो,
डर था उनके खुली हवा में खराब होने का.

सोचा है तुम आओगे तो तुम्हें परोसुँगा,
वैसे भी मेरे घर के इकलौते मेहमान तुम ही तो हो.

मैं वहीं अपनी चौखट पर बैठा तुम्हारी राह तकता रहा,
बैठे बैठे जाने कब आँख लगी पता ही नहीं चला,

आँख खुली तो दिन ढल चुका था.
परिंदे भी सारे अपने घर लौट आए थे.

पर तुम आज फिर नहीं आए.
चलो खैर, अच्छा मज़ाक था.

और मेरे ख्याब भी उसी पोटली में तुम्हारी राह ताक़ते मुरझा से गये हैं.

और मैं फिर खाली हाथ तुम्हारे इंतज़ार और आने की उम्मीद लिए,
कुछ ताज़े ख्वाब चुनने निकल पड़ा हूँ.

सोचता हूँ  तुम जबभी आओगे, तुम्हें परोसुँगा.

Thursday, 1 May 2014

ख़त

आज मेरा जन्मदिन है, पूरा पचास का हो गया मैं. कई दोस्तों की शुभकामनाएँ मेरी फ़ेसबुक वॉल पर बिखरी पड़ी हैं. कुछ दोस्त ऐसे भी है जिनसे मैं करीब बीस बरसों से नहीं मिला, बस उनके स्टेटस पर 'कॉमेंट' और फोटोस को 'लाइक' करता रहता हूँ. और वो भी हर साल मुझे जन्मदिन की शुभकामनाएँ भेजना नहीं भूलते, भले लोग हैं.

पलक झपकते ही सूचना प्रसारित करने का बेहतरीन साधन है ये  सोशल मीडीया.

पर एक वक़्त वो भी था जब उन लाल डब्बों में हम अपने खत डाल कर यह सोचा करते थे की आख़िर यह खत मेरी नानी के पास कैसे पहुँचेगा, तब किसी समझदार रिश्तेदार से पता चला था कि एक पूरा सरकारी विभाग मेरी भावनाओं को मेरी नानी तक पहुँचने के लिए कार्यरत है. सोच कर अच्छा लगा था की मेरी भावनाओं की परवाह भारत सरकार को भी है.

पर फ़िल्मों में तो भाग्यश्री को हमने " कबूतर जा जा जा...पहले प्यार की पहली चिटठी साजन को दे आ" गाते सुना था, पर हिन्दुस्तान की जनता ने कबूतर पर भरोसा करना कब का छोड़ दिया था . भाग्यश्री को ज़्यादा फिल्में मिली नहीं और जनता ने कबूतर की खोपड़ी पर भरोसा ना करते हुए  पहले ही ये काम डाकियाबाबू को दे दिया था.

कबूतर तो पहले ही बेरोज़गार हो चुके थे, पर आज कल डाकियाबाबू भी देखने को नहीं मिलते. और किसी के ख़त का इंतज़ार की रस्म भी ख़तम हो गई है.

वो हल्के पीले रंग वाला पोस्ट कार्ड और नीले रंग की अंतर्देशीय घर में मेरी किताब रखने वाली तख्त पर हमेशा लेटी हुई पाई जाती थी. और पापा भी हर रविवार धूप में कुर्सी डालकर रिश्तेदारो के खतों का जवाब लिखा करते थे. कभी गोंद की अनुपस्थिति में भात के दो दानों से लिफ़ाफ़ा चिपकाने की कल्पना भी आज हम नहीं कर सकते, पर ये कभी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हुआ करते थे, तब ख़त लिखने और बाचने का अपना रौब हुआ करता था.

पोस्टकार्ड भाई साब बहूत कम बोलते थे, ऐसे में अगर आपको सीमित शब्दो में बात रखने की कला नहीं आती तो फिर आपकी मदद के लिए अंतर्देशीय दीदी थीं, पूरे साढ़े तीन पन्नो वाली. और अगर उससे भी बात ना बने तो लिफाफे, लिफाफो को तो मैं अपना यार कहूँगा, कई बार मेरे प्रेमपत्र को छुपा कर सही जगह पहुँचने का काम किया है इस दोस्त ने. अक्सर नये साल के आगमन पर खुद से पेंट की हुई ग्रीटिंग्स भी इसी लिफाफे में लेटकर अपने चाहनेवालों तक पहुचती थीं.

ये पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय, लिफाफे रिश्तेदार ही तो थे अपने. और इनमे एक रिश्तेदार था "तार", उस वक़्त के सबसे तेज़ संवाद का माध्यम. "तार" एक ऐसा रिश्तेदार था जो ज़्यादातर बुरी खबर ही लेकर आया करता था... तार में पैसे शब्दो के हिसाब से लगा करते थे तो लोग उसका उपयोग किसी के गुज़र जाने या बीमार होने की खबर देने करते थे. कई बार तो "तार" का मतलब ही यही हो गया था जैसे कोई अनहोनी.

मैं भी जब पहली बार घर से बाहर नौकरी करने गया, तो पूरे हफ्ते अपने जीवन में होने वाली घटना को उन खतों में डालकर ही भेजा करता था, जिसे पढ़कर मेरी माँ को मेरे सही सलामत होने का विश्वास रहता था. और इनके जवाब के इंतज़ार में उठने वाली भावनाएँ और उस इंतज़ार के ख़तम होने का सुकून भी अद्भूत था.
यह सुनकर भी अच्छा लगता था की मेरा खत पूरा परिवार साथ मिलकर सुनता है और इंतज़ार करता है मेरे अगले खत का.

पर आज वक़्त बदलता गया, खतों को फोन ने हर घर से बेदखल कर दिया है. हमने जल्दी से जल्दी बात करने और दुनिया से जुड़ने के कई माध्यम खोज निकले हैं, पेजर से शुरू होकर आज हमारे पास स्मार्ट फोन्स, गूगल हॅंगआउट, स्काइप, फ़ेसबुक, ट्विटर तमाम चीज़े है. पहले कभी पाँच घरों में एक फोन हुआ करता था, फोन करने और सुनने के बहाने रिश्ते बनते थे. और आज एक घर में पाँच फोन है, और नतीज़ा.... मेरा बेटा पीछले एक घंटे से अपने अलग अलग दोस्तो से बात कर रहा है, बेटी कैंडी क्रश मे अपना लेवेल अपडेट कर रही है, बीवी स्काइप पर अपनी माँ से बात कर रही है, और मैं भी फेसबुक पर बैठा अपनी बर्थडेविशहेस गीन रहा हूँ.

हम सब बिज़ी है. हममे से कोई भी एक दूसरे से बात नहीं कर रहा. उमीद्द है रात के खाने पर पूरे परिवार से एक साथ बातचीत होगी.

पर मैं सोच रहा हूँ तब तक बाहर जाकर कुछ लिफाफे यार और अंतर्देशीय दीदी को दोबारा घर ले आउ. उन्हें भी अच्छा लगेगा...

Monday, 28 April 2014

दादी का तोहफ़ा

जब मैं आज सवेरे से अपना मूँह छुपाते हुए अपनी नींद रूपी माशुका से दुबारा मिल रहा था तभी मेरे मोबाइल की रिंगटोन बजरंग दल के किसी कार्यकर्ता की तरह मेरे प्रेम संबंध में खलल डालने आ टपकी.

देखा तो अरुण का फोन था.

- भेन्चोद!!! (अब सुबह सुबह कोई फोन करे तो उसका अभिवादन ऐसा ही होगा)

इसे क्या हो गया आज तो छुट्टी है, कम से कम आज तो ढंग से सो लेने देता. दस ही तो बजे हैं, इंसान ढंग से सोए भी ना?

पर तब तक मेरा रुझान मेरे दोस्त की कॉल में देखकर मेरी नींद रूपी माशुका भी मेरा साथ छोड़ कर जा चुकी थी.

फोन उठाया तो पता चला की अरुण की दादी का देहांत हो गया है, बीती रात.
वैसे तो ऑफीस से छुटटी लेने के लिए वो अपनी दादी को पहले भी मार चुका है, पर इस बार सच में ऐसा था.

उसने ये बताया की शाम को पास वाले डोमिनोस में मिलते है, बताउँगा क्या हुआ था. और वैसे भी यार घर पर खाना वाना बनाने वाला है नहीं.

मुझे भी थोड़ा अजीब लगा की अभी इसकी दादी का देहांत हुआ है और ये पार्टी करने की बात कर रहा है.

- ओ भाई तेरे घर में मातम चल रहा है, और तू शाम को डोमिनोस पर मिलने की बात कर रहा है?

- भाई क्रिया कर्म तो आज सुबह ही कर के आ गये, कुछ एक हफ्ते की बात है, उसके बाद घर मे सब नॉर्मल हो जाने वाला है, कल रात से कुछ ढंग का खाया भी नहीं है, और तुझे फोन कर रहा हूँ तो तू ज्ञान दे रहा है.

- साले दादी मारी है तेरी और तुझे खाने की सूझ रही है और वो भी डोमिनोस.

- दादी के मरने का गम तो मुझे भी है भाई, पर नब्बे से उपर की हो रही थीं यार.

- पर साले, तुझे ये नहीं लग रहा की घर में ऐसा माहौल है और तू पार्टी करेगा?

- भाई मैं तेरे से मिलकर कुछ बताने वाला हूँ, देख, दादी के चक्कर मे मेरी प्रेम कहानी का गला घोटा जा रहा था, वो तो निकिता प्यार करती है मुझसे जो इतने सालों तक इंतज़ार कर लिया. दादी के रहते तो मैं निकिता से शादी कर ही नहीं सकता था. और ऐसा मैं नहीं कह रहा वही कहती थी, कि मेरे जीते जी नही होने दूँगी मैं ये अनर्थ. कहती थी ब्राह्मण तो ठीक है पर वो वाली ब्राह्मण नहीं हैं, जैसे आज कल की आंटी लोग करते है, कि पर्फ्यूम तो है पर वो ब्रांड वाला नहीं है.  इट्स नोट दैट क्लासी टाइप्स. कहती थी हमारा कुल बड़ा है. और ये उच्चकुल का ब्राह्मण हो कर मैने क्या उखाड़ लिया, वही कर रहा हूँ जो सब करते है.

मैं चुपचाप फोन के इस तरफ उसकी दादी को "ना आना इस देश लाडो" के महिला खलनायक की भूमिका मे देखता रहा. और दूसरी तरफ अरुण ने बोलना जारी रखा...

- पापा मम्मी सारे तैयार थे, लड़की अच्छी है, वर्किंग भी है, हम एक दूसरे से प्यार भी करते है ,पर दादी के लिए ये काफ़ी नहीं था. जब दादी तक बात जाती तो वो अपने शास्त्र बीच मे घुसा देती थीं, जो शायद आज तक उन्होने देखे भी नहीं होंगे. अब तू ही बता यार ये शास्त्र काम बनाने के लिए बने थे या खराब करने के लिए, मुझे तो समझ नहीं आता. वैसे अभी तो बस इतना समझ ले की ये सब ख़तम होते ही तेरा भाई शादी करने वाला है.

ये सब बोलते हुए उसकी आवाज़ मे एक विजेता का भाव था,जैसे काफ़ी मेहनत की बाद आख़िरकार उसने कोई किला फ़तह कर लिया हो...

- और तेरे पापा? वो क्या कहेंगे? उनकी तो माँ मरी है. इतनी जल्दी सब कुछ करने देंगे?

- पापा तो तैयार बैठे है यार, ये आइडिया ही उनका है, वो भी यही कह रहे थे की माँ के रहते तो ये सब नहीं हो सकता, थोड़ा इंतज़ार कर ले, और मैनें भी सोचा की भाई लोगो को मिलकर खुशख़बरी दे दूं. इसलिए शाम को सात बजे डोमिनोस मे मिलते है.

-अच्छा, चल ठीक है शाम को मिलते है, कहकर मैने फोन काट दिया.

दरवाज़ा खोलकर बाहर देखा तो सूरज चढ़ चुका था, पर आसमान में कुछ बादल मंडरा रहे थे. उन बादलो में मैने अरुण की दादी की जाती हुई आत्मा की कल्पना कर उनको धन्यवाद किया. किसी का इस दुनिया से दूर जाना किसी दो की दुनिया को पास तो ला रहा था. अरुण और निकिता की प्रेम कहानी थी भी आठ साल पुरानी. पर ऐसा क्यों हो रहा है की हमारे समाज में उन ना बोलती किताबों को तो लोग समझते हैं, पर किसी के ज़िंदा रिश्ते को समझने के लिए लोगों के पास ना ही दिमाग़ है, ना ही दिल और ना ही आँखें.
और मुझे ये भी पता है की मेरे कई दोस्त और कई अजनबी अपने ही किसी ऐसे दादा या दादी के मरने का इंतज़ार कर रहे है.

Wednesday, 23 April 2014

कुछ वक़्त मिले अपने साथ..

शाम के छः बज चुके है, अपने ऑफीस की सीट पर बैठे- बैठे बाहर जाती हुई सड़क पर देखा, कुछ लोग बैग लटकाए अपने अपने घर जाने को तैयार है, वही पास में ही एक चार लोगो का समूह सिगेरते और चाय पीते हुए पूरे दिन की थकान मिटा रहा है, और वो चाय की टपरि मुझे टपरि कम और समाज सेविका ज़्यादा लग रही है. एक भाई साब अपनी बीवी को फोन कर के अपने ऑफीस से निकल जाने की सूचना दे रहे है, और उन्हे इस बात की खुशी है की आज वो अपने वैवाहिक जीवन को बेहतर दिशा दे पाएँगे.

मैं बाहर ये नौ से पाँच वाली दुनिया को देख ही रहा था, तभी मुझे याद आया की आज तो मुझे घर जल्दी निकलना था...(जी हाँ छः बजे घर के लिए निकलना जल्दी होता है) मेरे दिमाग़ मे आज ऑफीस से घर जाकर करने वाले सारे कार्यक्रम की रंगोली सी तैयार थी, कितना सुखद अपनी छत पर बैठ कर पास वाले पेड़ से बातें करना, बच्चो को गली मे खेलते हुए देखना, पास ही किसी दोस्त से मिल कर आना या फिर अपने हाथों से खुद के लिए कुछ पकाना.

पर तभी मेरी सारी कल्पनाओ को चकनाचूर करता हुआ सबमिशन बीच मे आ टपका, अब शायद दस बज़ेंगें....

मानो ऐसा लगा जैसे वहीं गली में खेलते हुए किसी बच्चे की साइकल मेरी रंगोली के उपर से निकल कर चली गई हो.

रंगोली बिखर गई थी.

हर रोज़, बार बार यही तो होता है, और मैं भी अपने मन को मना कर यह कहता रहता हूँ , अरे पगले चल कोई बात नहीं, आज एक दिन और सही, कल से वक़्त पर निकल जाया करूँगा.

पर कहाँ...

ये सिर्फ़ मेरी हालत नहीं है, मेरे जैसे जाने कितने लोग हैं जो इस रुबिकू की पहेली में उलझे हुए हैं, और वो बहूत कम लोग हैं जिन्हे ये पहेली सुलझाने आ गई है. हमसारे लोग उस प्रॉजेक्ट रूपी दानव से रोज़ डटकर मुकाबला करते हैं, और यह कम्बख़त भिन्न भिन्न रूप धरकर हमारे सामने आता रहता है ,मानो हमें चिढ़ा रहा हो. कभी एफीशियेन्सी तो कभी डेडलाइन तो कभी सबमिशन. अपना मास डालकर हम लोग इसका पेट भरते है, पर ये दानव है... दानव, ये कभी संतुष्ट नहीं होगा.


ऐसा भी नहीं की हमें इससे मोहबत्त नहीं है, ये कम्बक्त दानव से पहले महबूब ही हुआ करता था, पर किस आशिक़ को ये पसंद होगा की उसकी मोहब्बत का बार बार इम्तहान लिया जाए?

सच कहूँ तो ये मुझे बस एक परछाई की तरह लगता है, जिसके पीछे हम सब भाग तो रहे हैं पर ये परछाई कभी हाथ नहीं आने वाली. और दिन के ढलने के साथ ये भी विलूपत हो जाएगी, शायद तब कहीं जाकर हमें अपनी शक्ल देखते का वक़्त मिले, और शायद तभी हमें इस बात का भी एहसास हो की इसके पीछे भाग भाग कर हमारे चेहरे पर कितनी धूल जम गई है, और अगर हम इसी तरह इसके पीछे भागते रहे तो शायद कुछ वक़्त बाद खुद का चेहरा भी ना पहचान पाए...

Monday, 7 April 2014

उत्सव बलिदान का


बकरे सारे खुश हो रहे हैं 
कुछ अच्छा होने वाला है ... 
सुना है ईद आ रही है, 
मंदिर भी बनाने वाला है. 

हर बार यही क्यों होता है, 
इतिहास खंघाला जाता है... 
उज्वल भविष्य की शर्तों पर फिर 
इनको कटा जाता है| 

कुछ बकरे ये भी सोच रहे 
चलो अपना बलिदान सही... 
शाहिद तो हम कहलाएँगे 
वो अपने भगवान सही| 

पर ये तो रस्म है उत्सव की, 
ऐसा ही होता दिखता है... 
माँस शहादत तक का यहाँ 
दुकानों में बिकता है| 

अपना हिसाब भी लगा रहा है, 
जो दुकान का लाला है... 
सुना है ईद आ रही है, 
मंदिर भी बनने वाला है|

Sunday, 6 April 2014

खुश हूँ

ज़िंदगी है छोटी हर पल मे खुश हूँ
हर वक़्त मे खुश हूँ,हालात मे खुश हूँ

जो मिल गया उसके साथ खुश हूँ
जो ना मिला उसकी याद मे खुश हूँ,
जाने... दिन का सूरज कब निकलेगा,
मैं अभी इस रात मे खुश हूँ.


सपने तो अपने भी टूटे...
फिर भी उस फरियाद मे खुश हूँ.

लगता था डर खोने का तुझको
पर पाकर तेरी याद मैं खुश  हूँ

देख नही सकता हू तुझको
सुनकर बस आवाज़ मैं खुश हूँ.

वक़्त का भी दोष कहाँ क्या
जब मैं इस अंदाज़ मे खुश हूँ

कहते है वो ,दुनिया है यह
मैं अब इसके राज़ मे खुश हूँ,
खुद मे जीना सिख रह हूँ
तुम्हारे "दोगले" समाज मे खुश हूँ.

Thursday, 23 January 2014

आज के हालात

कई बार जद्दोजहद में , दिमाग़ ये पथ्हर हुआ.
ये जो हो रहा है क्या इसे ऐसे ही होना था...

अब तक थे सब हैप्पी हैप्पी करते हुए गुलामी.
किसी नें इनकी बात करी तो इनको रोना था.

क्यों पुरखों नें खून बहाया,क्यूँ इतने बलिदान करे,
जब उनके बच्चो को मंजूर गुलाम ही होना था.

ये जो हो रहा है क्या इसे ऐसे ही होना था...

लूट रही थी अस्मत माँ की, जाने क्या क्या हो रहा था.
सवाल पूछने वाला अपना छोटा टॉमी सो रहा था.

राम नाम की रटन लगा के, चन्द सिक्को की हड्डी चबा के
जीभ तले अफ़ीम दबा के, इसको तो बस सोना था...

ये जो हो रहा है क्या इसे ऐसे ही होना था...

देख आज फिर हस्तिनापुर में इतिहास दूहराया
फिर से आज खड़ा दुर्योधन, धर्मयुध्य गरमाया..

कर चीर हरण भारत का, तुझे दुःसासन होना था.
ये जो हो रहा है क्या इसे ऐसे ही होना था...

एक संजय फिर से दिखा आज है, मीडीया नाम बताए.
रन्छेत्र की घटना भी सटीक ना ये बतलाए

सेवक वेवेक कुछ ना इसे, व्यापारी होना था.
ये जो हो रहा है क्या इसे ऐसे ही होना था...

Monday, 13 January 2014

मुक्कम्मल है ये नींद तेरे ख़्वाबों से

मुक्कम्मल है ये नींद तेरे ख़्वाबों से
तुझसे मिलने की उम्मीद मे सो लेता हूँ.
एक मासूम सी तस्वीर तुम्हारी ,जैसे नदी का कल कल करता हुआ पानी...
जैसे सुबह के पाँच बजे मेरे ख्याबो में सूरज की रोशनी...
जैसे एक मंदिर की घंटी किसी ने हौले से बजा दी हो...
और उसकी आवाज़ कानों से होते हुए मेरी आत्मा तक आ रही हो..
और फिर मैं भी उस भंवरे की तरह हूँ
जो फूल पर बैठा हुआ बस उसे देख रहा है...
तो कभी उस बच्चे की तरह जो तितली के पीछे दौड़ कर ही खुश है.
और कभी उस कबीर की तरह जिसने अपने खुदा को अपना सब कुछ दे दिया हो.
तभी अलार्म बजता है, पर तुम्हारा हॅंगओवर कायम है.
ज़िंदगी की रेस मे मुझे आज फिर से दौड़ना होगा,
थोड़ी देर के लिए तुमसे फिर से बिछड़ना होगा.
ताकि जब दिन भर मैं थक हार कर आउँ
तो तुमसे मुलाकात हो सके.
फिर से वो पानी कल कल करता बह सके,
फिर से वो भँवरा उस फूल को देख सके.
फिर से वो बच्चा तितली के पीछे दौड़ सके
और फिर कोई कबीर किसी का पूरी तरह से हो सके.

काँच

कभी कभी किसी छोटी सी ही बात पर कुछ ऐसा महसूस हुआ
जैसे अंदर दिल के रखा काँच चटक सा गया हो.

ना जाने कितनी ऐसी चटकने आई हैं इस पर,
हर बार लगता है बस अब ये चकनाचूर हुआ.

पर ढीठ है ये भी मेरी तरह,
मेरी हर उदासी को उसकी उम्र तक संभाल कर रखता है.

और मेरी उदासी भी पानी का उस बुलबुले की तरह ही तो है,
जो पल में बनता और पल में बिखरता रहता है.


इस काँच के चटकेने में किसी का अपराध नहीं है,
इस अजीब सी घुटन में ना ही किसी की हिस्सेदारी है.

खुद के मन में रखी किताबे पढ़ता हूँ, फिर कहानिया गढ़ता हूँ,
कोई और कहाँ वजह है इसकी, ये तो मेरी अपनी बिमारी है.

इस काँच में मुझे आज कोई उदासी तो नहीं दिखती,
पर आज भी सारी चटकने इसके जिस्म पर ज़िंदा हैं.