Saturday, 26 September 2015

विरासत

ये ब्लॉग घर ही तो है,
जिसमें गूंजती हैं किलकारियाँ  
कविताओं की,
और पाँव पसार कर बैठे
होते है कुछ पद्द। 
…अपने अपने कमरों में । 

कभी कोई गुज़रता हुआ पास से 
छोड़ जाता है 
कोई कमेंट, 
जैसे किसी की चिट्ठी आई हो । 

तो कभी कोई पडोसी आकर टोकता भी है 
कि, कविताएँ बिगड़ने लगी हैं अब,
ज़रा ध्यान दो इनपर, माँझो इनको । 

मैं उन्हें सामने रख घंटों बैठता हूँ, पूछता हूँ 
उनकी परेशानी 
अपने बच्चे की तरह 
और कभी 
बस मेरे ठीक होने से 
उनके चेहरे भी चमक उठते हैं   । 

कई बार तारीफ सुनकर 
सीना फूलता तो है ही  
पर खुद के बच्चों पर मुग्ध होना भी 
उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं । 

मेरे रिश्तों के आधार भी मैंने 
इसी की बालकनी में शुरू होते देखे हैं,
वो लोग 
जो आज अजीज़ हैं 
वो कविता की ऊँगली पकडे
ही तो आये थे मेरी तरफ 
… अच्छे लोग हैं । 

उम्मीद है एक उम्र ढलने पर 
ये मुझे रास्ता दिखाएंगी
और चाहत ये कि 
मैं जाना जाऊं 
इन्हीं के नाम से…

मैं विरासत में घर नहीं एक ब्लॉग छोड़ना चाहता हूँ ।

© Neeraj Pandey

Saturday, 29 August 2015

एक पन्ना : रात, चाय, व्हाट्सएप्प और...

फेसबुक पर अनंत ने अभी अभी अपनी कवर फोटो बदली है… चाय का एक गिलास पकड़े  हुए… चाय पीते हुए । कसम से ललचाने वाली फोटो है।  गिलास बिल्कुल वैसा,  जिसमे मैं अपनी कॉफ़ी पीता हूँ। मुझे चाय से ज़्यादा कॉफ़ी पसंद है। स्पेशली फ़िल्टर कॉफ़ी। उसके निचोड़ कर निकाले गए कॉफ़ी बीन्स के रस की थोड़ी मात्रा में मिला दूध और थोड़ी सी शक्कर का जो जादू होता है मैं उसे कह कर शायद बयां नहीं कर सकता। क्योंकि मैं खुद भी इस लाइन को लिखते लिखते यही सोच रहा हूँ कि उसके लिए सही शब्द क्या होगा। मैं लिख नहीं पाया कि मैं कैसा महसूस करता हूँ। पर एक बात तो तय है फ़िल्टर कॉफ़ी से मेरा एक रिश्ता बन गया है। कम से कम मैं ये तो कह ही सकता हूँ कि उबले हुए कॉफ़ी बीन्स को एक कपडे में डालकर निचोड़ना शायद जीवन के उस पल को निचोड़कर एक प्याले में पीने जैसा है  एक प्याले में जीवन के उस पल का सारा रस.… सारा निचोड़। 

पर अभी अनंत की वो फोटो देखकर मुझे चाय पीने का मन हो रहा है। रात के डेढ़ बजे…  पर क्यों? अभी तो कई लोगों की आधी रात गुज़र चुकी होगी। मेरे कमरे में भी बस मैं और मेरा मोबाइल जाग रहे हैं। मैं सोच रहा हूँ की बाहर जाकर चाय पी लूँ। पर वो उस तरह के गिलास में नहीं मिलेगी जिसमें अनंत पी रहा है। मैं चाहता हूँ चाय की एक प्याली के साथ कुछ पढ़ना, पर मेरे अंदर का एम्प्लॉयी मुझे कल ऑफिस जाने की याद दिला रहा है। पर चाय का ख्याल है कि अभी भी जागा हुआ है। मैं किसी के साथ बैठकर पीना चाहता हूँ, भले ही वो किरदार किताबों से निकल कर क्यों न आये। 

दरअसल मैं अभी भी जागना चाहता हूँ… चाय तो जागने का बहाना है बस। मैं किसी को भी फ़ोन करके रात के इस वक़्त डिस्टर्ब नहीं करना चाहता।  और सभी मेरे इस पागलपन में अपनी हिस्सेदारी देख भी नहीं सकते। मैंने ये सब सोचते सोचते दुबारा मोबाइल उठा लिया, कुछ लोग व्हाट्सऐप पर अभी भी ऑनलाइन हैं। मैंने एक दोस्त के लिए कुछ शब्द टाइप किया पर कुछ सोचकर मिटा दिया। तभी मुझे याद आया, तुम जाग रही होगी। मुझे अमेरिका की अच्छी बात यही लगी कि देर रात भी अगर मैं तुमसे बात करना चाहूँ तो तुम जाग रही होगी। तो मैंने तुम्हे पिंग किया…  हमनें बातों बातों में जीवन में चल रही कुछ बातों को व्हाट्सप्प के नेटवर्क पर हमेशा के लिए दर्ज़ कर दिया। अपने जीवन में हो रहे उतार चढाव के साथ फिल्मों की बात भी की, शायद जो किरदार मैं ज़िंदा करना चाहता था, कई हद्द तक तुमसे बात कर के मैंने गढ़ लिया। 

ये बातें इतनी पर्सनल सी हो गयीं कि मुझे एक कोने की ज़रुरत महसूस होने लगी। जहाँ सिर्फ हम बात कर पाएं, पर ऐसा संभव ना होता हुआ देख मैंने कम्बल ओढ़ लिया और उसके अंदर मोबाइल रखकर तुमसे बातें करने लगा। हमारी बातें अलगे बीस मिनट तक चलती रहीं, जितने में शायद एक कहानी और दो चाय के छोटे छोटे प्याले ख़त्म हो जाते। वैसे ही प्याले जिसमे अनंत चाय पी रहा था। मुझे अचानक याद आया वक़्त भी 1:40 हो चुका है, और तुम अभी ऑफिस में हो। पता नहीं कैसे पर तुमसे बात कर के वो मेरी चाय पीने की इच्छा की तृप्ति भी हो गई है। मैंने कुछ किरदार भी ज़िंदा कर लिए हैं अब मुझे अपने कम्बल में ही उन किरदारों को रखना है। कम्बल और बातों की गर्मी ने मुझे खासा आराम दिया है, मुझे अब नींद आ रही है । मैंने तुम्हे 'गुड आफ्टर नून 'और तुमने मुझे  'गुड नाईट, सी यू' एक स्माइली के साथ कहा। मैं भी जवाब में दो स्माइली भेज कर खुद में ही मुस्कुराया। अब मैं अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर रहा हूँ। 

Wednesday, 12 August 2015

ये प्यार नहीं

मैं तुमसे प्यार नहीं करता,
हाँ, अच्छी लगती हो,इतना ज़रूर है । 

क्योंकि,
प्यार जब भी होता था 
वो आता था एक डर के साथ,
जन्म जन्मान्तर का बर्डन डाले । 

एक खुद को बदलने की जद्दोज़हद भी 
कि मैं भी उस साँचे में बंध  जाऊँ
जिसे दुनिया सोलमेट कहती है । 

मैं भी करूँ वही पुरानी क्लिशे हरकतें 
जो दशकों से घिसे पिटे प्यार का प्रमाण हैं । 
मैं सोचूँ कुछ और, और बोल दूँ कुछ,
क्योंकि डेटिंग की किताबों में वैसा ही कुछ लिखा है । 

और जानता हूँ तुम्हें भी मुझसे प्यार नहीं,
क्योंकि, हमारा कोई करार नहीं
और न ही कोई उम्मीद है … 
 हम डरते भी नहीं एक दुसरे से 
और ना हीं ये ख्याल कि 
तुम बिन मेरा क्या होगा । 

एक वक़्त है , एक फ़ोन है, कुछ यादें हैं, 
और कभी कभी ही सही, पर घंटों बातें हैं … 
देखो ये प्यार है ही नहीं,
हाँ,तुम्हेंअच्छा लगता होऊंगा,इतना ज़रूर है ।

Monday, 27 July 2015

'मसान' और मैं


बचपन में एक बार बनारस गया था । दसवीं बोर्ड के बाद  CHS की परीक्षा के सिलसिले में BHU का चक्कर लगा था । बनारस उस वक़्त मेरे लिए एक बड़ा शहर था । मेरे दिमाग में ये भी था कि यहाँ के रहने वाले लोग, लड़के, लड़कियाँ  मुझसे काफी फॉरवर्ड होंगे । मुझे यह भी लगता था, यहाँ लड़के गाली नहीं देते होंगे । क्योंकि गाली देना गन्दी बात है और बड़े शहर के लड़के गंदी बातें नहीं करते । इस बात को करीब बारह - तेरह साल हो गए । इस वक़्त के दौरान मेरे अंदर और बाहर बहुत कुछ बदल गया था । बनारस एक क़स्बा हो चुका था । कुछ दोस्तों ने बुलाया भी कि "आओ घूम जाओ बनारस " पर हो नहीं पाया ।  पर दुबारा बनारस देखा, फिल्म 'मसान' में ।

बिना बनारस गए ही मैं इन जगहों और किरदारों से वाकिफ था । फिल्म देखते हुए कई बार मुझे लगा कि मैं 'देवी' को जानता हूँ, ये वही लड़की है जो फलाना गली में रहती थी और जब ट्यूशन पढ़ने जाया करती तो लड़के उसे उसके नाम से कम और 'रंडी' कह कर ज़्यादा सम्बोधित करते थे । क्योंकि वह लड़की किसी लड़के से प्यार करती थी और ये खबर सबको पता थी कि वो उस लड़के से कभी कभार मिला भी करती है । बाकी आगे पीछे की क्या कहानी थी मुझे नहीं पता, और यकीन है कि उन्हें भी पता नहीं होगी जो ऐसा कहा करते थे । पर उस वक़्त अपना कोई नजरिया नहीं था जो लोगों ने कह दिया उसपर भरोसा करना होता था । वजह ये भी थी कि बाहर की दुनिया का पता था ही नहीं और ये भी कि जब आस पास के इतने सारे लोग यह कह रहे हैं तो सच ही होगा । फिल्म देखते हुए मुझे उन सारी देवियों के लिए बुरा लगा जिनको मैंने भभुआ की सड़कों पर देखा था ।

फिल्म के एक सीन में जहाँ 'देवी' का एक सहकर्मी उससे ये बोलता है कि "देगी क्या ? उसको भी तो दिया था । " मैं इस किरदार को भी जानता था, जैसे ही उसने मुँह खोला मुझे पता था ये क्या बोलेगा । वो सीन जैसे जैसे खुला मैं घीन से भरता गया । देवी को किये जाने वाले गंदे कॉल्स और लोगों को 'देवी' को देखने का नजरिया 'देवी' के बारे में नहीं हमारे और हमारे सभ्य समाज के बारे में बहुत कुछ बतलाता है । और जो मुझे दिखा, वो ये था कि सभ्य समाज और कुछ भी नहीं 'गिफ्टरैप्ड टट्टी' है । ऊपर ऊपर से तो बहुत अच्छी लगती है देखने में, पर थोड़ी परत हटाते ही बास आनी शुरू हो जाती है।

देवी के पापा विद्याधर पाठक जी से भी अपना पुराना परिचय था । जिनका गिल्ट समाज और जिम्मेदारियों का थोपा हुआ था । वो भी उस समाज से ऐसे ही डरते नज़र आये जैसे अँधेरे में रस्सी देखकर साँप होने का डर । 


दूसरी तरफ दीपक और शालू का प्यार, उनका पहला चुम्बन । काफी कुछ मेरे पहले प्यार से मिलता जुलता था । वो प्यार जिसकी शुरुआत ही शादी के ख्याल से होती थी । और उस प्यार को पाने के लिए साथ देते थे कुछ जिगरी दोस्त । दीपक और शालू एक दुसरे को जब स्क्रीन पर पहली बार एक दुसरे को चूमते हैं ,  मैंने भी फिर से एक बार, पहली बार किसी को चूम लिया । हमारा प्यार जो अगर किसी पेड़ के नीचे समाज से छुप कर किया जाये तो कितना मधुर और अगर वही हमारे समाज के दायरों में आ जाये तो 'देवी' के प्यार की तरह बाजारू करार दे दिया जाता है  । दीपक का कुछ होना और कुछ और हो जाने की चाहत रखना… हम सबके अंदर एक दीपक है ।

वैसे तो वो आधी नींद से उठकर भी बिना किसी तकलीफ के मुर्दे जला सकता है । पर जब उसे ये दिखता है कि उसके सामने शालू की लाश पड़ी हुई है उसे ठीक ठीक समझ नहीं आता की ये अचानक क्या हुआ ।  उस वक़्त मुझे भी लगा था की दीपक की क्या प्रतिक्रिया होगी ? उधर दीपक दर्द में था पर  चुपचाप बैठा था और इधर अपने अंदर एक बवंडर सा चल  रहा था । दीपक के सामने सिर्फ शालू नहीं बल्कि उसके साथ देखे हुए सारे सपने जलकर ख़ाक हो गए थे |  मेरे अन्दर का बवंडर भी तब टूटा जब दोस्तों के साथ बैठा हुआ दीपक फूट फूट कर रोया । थोड़ी  देर के लिए चश्मा हटा कर मैंने अपनी आँखे पोंछी ।  



पर मसान कोई उपदेश नहीं है , मसान एक गीत है । मसान  हमें यह नहीं बताती कि क्या सही है और क्या गलत है । एक अच्छी कविता की तरह हमें दिखाती है, जो भी हमारे आस पास चल रहा है ।  कबीर के एक दोहे की तंज पर इस फिल्म से भी जिसको जो लेना है वो वही ले पाएगा । यहाँ तक की फिल्म मृत्यु जैसे विषयों को भी बहुत ही सहजता से दर्शाती है । जैसे मृत्यु तो इस जीवन का अंग ही हैं, एक जगह से निकल कर दूसरी जगह पर जाना । एक नयेपन की तलाश और उस तलाश में खुद को ढूंढ लेने की उम्मीद । देवी और दीपक का बनारस छोड़ कर इलाहाबाद जाना भी उसी जीवन प्रवाह का अंग है और एक बदलाव का संकेत देता हैं । एक नई जगह जहाँ शायद पिछले जीवन की बेड़ियाँ पांवों में न उलझें । मसान शायद यह भी कहती है कि जीवन में कुछ भी हो चाहे कितना भी बड़ा या बुरा जीवन से बड़ा नहीं हो सकता। 

मैं खुद भी उसी दीपक की तरह एक छोटे शहर से चलता हुआ, एक शहर से दुसरे शहर घूमता हुआ खुद की तलाश कर रहा हूँ । इस सफर में भी बहुत कुछ ऐसा देखा है जो हमें बताई हुई जीवन की सच्चाइयों से कहीं अलग है ।  हमें तो आगे देख कर चलने के लिए कहा गया था पर कभी कभी ज़िंदगी अचानक से धप्पा भी दे देती है । बस इस खेल को खेलना सीख रहा हूँ, ताकी धप्पों में भी मज़े लिए जा सकें । और अभी तक जो सीखा वो यही कि "मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे … 

Update:
This piece was also published here:  https://www.bollywoodirect.com/मसान-और-मैं/

Thursday, 25 June 2015

एक पन्ना : रात की चाय

कभी गौर किया है तुमने ? रात के कुछ ढलने के बाद कई बार एक तलब चढ़ती है… चाय या कॉफ़ी पीने की । ये वो तलब होती है जब चाय या कॉफ़ी में से कुछ भी मिल जाये तो काम हो जाता है । तुम्हारे पास ऑप्शन ढूंढने के कोई हालात बचते ही नहीं । जो भी सामने आता है वो तुम स्वीकार करते हो, या कहो कि उसमें घुल लेते हो । अक्सर रात के बारह बजने के आस पास या उसके बाद मेरी भी यह इच्छा तीव्र हो जाती है । कई बार दोस्तों के साथ या अकेले एक प्याली चाय या कॉफ़ी ढूंढने निकल पड़ता हूँ । बैंगलोर के कई चौराहों, नुक्कड़ और गलियों में कुछ दूकानदार स्ट्रीट लैंप की पीली रौशनी के नीचे अपनी साइकिल पर चाय के थरमस के साथ सिगरेट और चकली लिए अक्सर खड़े होते हैं । और उनके आस पास होती है, दस से पंद्रह लोगों की भीड़, चाय या सिगरेट पीते हुए । सब अपनी बाइक और गाड़ियों को रोक कर चाय का लुत्फ़ ले रहे होते हैं । मैं उन्हीं में से किसी एक नुक्कड़ पर चाय पीने निकल जाता हूँ … जहाँ भी मिल जाए । बैंगलोर की हल्की ठंढी रातों में किसी बंद दूकान की सीढ़ियों या किसी फूटपाथ पर बैठ कर समय को गुज़रते हुए देखना मुझे पसंद है । 


खैर बात हो रही थी चाय की... दरअसल रात की चाय को बस 'चाय' कहना अपराध होगा...लेखन की भाषा में कहूँ तो बड़ा ही फ्लैट होगा । रात की चाय एक टोकन है कुछ और वक़्त खरीदने के लिए… नींद की आगोश में जाने से पहले अगर रात थोड़ी और जी जा सके इसकी सम्भावना लिए हर चाय की प्याली आती है । भले ही देर रात गली नुक्कड़ पर बिकने वाली चाय हो या घर में देर रात बनाई हुई मेरी कॉफ़ी । ये सभी एक टोकन हैं, जो मुझे थोड़ी और देर जगाने में मदद करते हैं । मुझे रात पसंद है, रात में बाहर निकलो तो ऐसा लगता है आसमान मानों एक बड़ा सा तंबू तना हो और टिमटिमाते तारे ऐसे जैसे उस तंबू में लगी छोटी छोटी लाइट्स, और रात के इस वक़्त इस तम्बू के नीचे चल रही बहुत सी कहानियों को थोड़ा ठहराव मिलता दिखता है… एक कहानी शुरू होकर अपने एक मोड तक आती दिखती है, जैसे दिन के पाँव दुःख गए हो और वो रात के पीछे छुप कर थोड़ी देर आराम करना चाहता हो । मुझे यह सब देखना बहुत पसंद है, अलग अलग किरदारों को देखना, उनको गढ़ना, उनके बारे मे सोचना ये सब उसी तंबू के तले होते हैं | मैं रात में सोना बस मजबूरी से करता हूँ। मैं कभी अपनी छत पर बैठे बैठे पूरी रात, रात के साथ सफर करना चाहता हूँ, तब तक, जब तक रात सरकते-सरकते सुबह ना बन जाये… पर ऐसा मुमकिन नहीं हो पाता । पर मेरी कॉफ़ी का मग या प्याली की चाय मुझे कुछ और देर जागने में मदद करते हैं , इसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ । मेरे लिए दिन और रात के अलग अलग वक़्त पर गटके गए प्यालों का अलग अलग मतलब है । 
खैर अभी अभी बाहर से आया हूँ , आज कोई चायवाला नहीं मिला । मैं अनायास ही लगभग तीन किलोमीटर का सफर कर के खाली हाथ वापस आ गया । रसोई में जाकर देखा तो थोड़ा दूध बचा हुआ था … जैसे मेरे लिए ही छोड़ा गया हो । रात के एक बज रहे हैं … और मैं अपनी कॉफ़ी बना रहा हूँ ।




© Neeraj Pandey

Saturday, 20 June 2015

जीवन प्रवाह

हर गर्मी की कोशिश होती है 
ज़रा सी ठंढक में घुल जाना, 
और वैसी ही कोशिश
ठंडक की गर्मी की तरफ.… 

रात दिन में घुल जाती है 
और दिन बढ़ता है धीरे धीरे 
रात की तरफ.… 

समंदर का पानी भी घुल रहा है 
बादलों में,
फिर.… बादल भी नदी में बहकर 
घुल जाते हैं समंदर में 

जीवन काल में घुल रहा है 
जैसे पल पल.…  
काल भी धीरे धीरे 
जीवित हो उठता है । 

सब कुछ घुल रहा है,
एक दुसरे में जैसे,
खुद को थोड़ा थोड़ा खोकर 
घुल जाना ही 
जीवन की शुरुआत है । 

© Neeraj Pandey

Tuesday, 9 June 2015

ग़ार्बेज इन ग़ार्बेज आउट...


हम पैदा किए जा रहे हैं, ऐसे लगातार...
जैसे फोटो स्टेट की मशीन
ऑटोमोड़ पर डाल रक्खीं हो |

वो  जितनी भी औरतें कर रक्खीं हैं
पेट से  हमने...
हमारी गलती थी ही नहीं,
हम कामुक इतने थे कि ये काम तो बकरी
 या किसी जानवर से  भी ले लेते हम |

ये जो रेंग रहे हैं, हमारे आस्  पास
हमें अपना 'बाप' बतलाते
और हम भी जिनको ठाट से
 बतला रहे  हैं... ' भविष्य'
दरअसल इनके पाँव अभी भी
भूतकाल  में लटके हैं|

ये जो विचारों से गूँगे बहरों की फौज खड़ी कर रक्खीं है,
ये भी हमारी तरह भीड़ में भेड़ बनने वाले हैं|

... और अगर हमने पाल  रक्खीं है कोई गलतफहमी
इनके अ‍ॅलौकिक होने की
तब यही जानना बेहतर होगा
ये हमसे भी बद्त्तर मौत मरेंगे|

जीवन दर्शन के नाम पर हमने बांचे हैं बस...
कुतर्क
और करनी के नाम पर...
हवस की गैर जिम्मेदाराना हरकतें|
विरासत में  हम दे  जाएंगे इन्हें
गिरते बाल, बढ़ते पेट,
गंदी शक्ल और बांझ सोच...

क्योंकि कल निकलेगा इसी आज से,
और आज में हमने कर रक्खीं है
खूब सारी टट्टी |

ग़ार्बेज इन ग़ार्बेज आउट...

© Neeraj Pandey

Friday, 5 June 2015

अपने गांव की तलाश में...

सफर के दौरान
मुझे एक गाँव दिखता है
जो मेरा नहीं हैं …

मैं थोड़ी देर रुककर
देखता हूँ उसे ,

गाँव में पसरी चाँदनी
और रुनझुन सन्नाटे के बीच
दिखते हैं कई घर
नजर आते हैं कुछ लोग |

एक छोटा सा मैदान,
बच्चों का ,
पूरे दिन खेलकर थक गया है |
एक हैंड पम्प,
जिसने उचक-उचक कर
पिलाया है दिन भर पानी
दोनों एक साथ ही अब ऊंघ रहे हैं|

खेत खलिहान के पेड़ों ने
साध ली है चुप्पी
और बोझे भी पलथि मारे
बैठे हैं चौपाल में।

एक छोटा सा तालाब भी है,
जिसमें चंद्रमा सो रहा है
और एक जीवन रेखा सा लंबा
रास्ता जोड़ रहा है इन सबको।

कुछ घरों के बाहर बल्ब
नाईट ड्यूटी पर
मुस्तैद खड़े हैं ,
और दूर उछलते पटाखे भी
मना रहे हैं
जीवन का जश्न |

...मै इस गांव को देखकर
ये सोचकर मुस्कुरा पड़ा
शायद यूँ ही सफर में कभी
 मैँ ढूँढ निकलुंगा अपना गाँव |

-नीरज पाण्डेय

Sunday, 19 April 2015

मेरी बेचैनी

(A piece written a year ago at write club, from where I got my Theatre thing started in Bangalore, Have a look)Death bed monologue for scene.
ज़िंदगी को परत दर परत उधेड़ता, बेचैन, आज इसकी आख़िर परत तक आ पहुँचा हूँ. पर वो शोर आज भी थमा नहीं है.शरीर ने कब का साथ देना छोड़ दिया था पर दिमाग़ की बेचैनी और तलाश रुकने का नाम नहीं लेती | कहीं का कहीं वो शोर सन्नाटा बन कर मेरे ज़हन में चीखें मारता है. ये दो चट्टानों के बीच से गुज़रती हुई, चिंघाड़े मारती हुई, हवा का शोर शायद ये मेरी मौत के साथ ही दफ़न हो |...या फिर शायद कभी नहीं |मैं आज अपनी मरन्शैया पर लेटा अपनी ज़िंदगी को फिल्म की तरह रीवैइंड कर कर देख रहा हूँ की वो कौन सा पल था जब ये बेचैनी शुरू हुई थी. उसका भी कोई निशान नहीं मिलता |ज़िंदगी की कड़ियों  को जोड़ते जोड़ते मैं खुद ही उलझ गया, और मैं भी उन्हे सुलझाने के लिए अलग अलग तरीके तलासता रहा, सरकारी नौकरी मे होने के बावजूद , पैंटिंग किया, सोशियल वर्क किया, दुनिया भी घूमा पर बेचैनी जस की तस | हर बार नई खोज एक नशे की तरह काम करती और नशा उतरते ही मैं फिर से बेचैन |हर बार ज़िंदगी को समझने के लिए ज़िंदगी की एक परत उधेड़ता तो फिर नई परत दिखाई पड़ती, पर कुछ वक़्त बाद उसका भी रंग वही, पहले जैसा |ऐसा भी नहीं है की इस परत दर परत ज़िंदगी को समझने मे मैं अकेला था ,सब तो था मेरे पास, पर फिर ये बेचैनी क्यों?इसका जवाब तो इस जन्म मे नहीं मिला, और शायद इस सवाल को करने का ये सही वक़्त भी नहीं है. क्या नहीं था मेरे पास मेरी बीवी थी, बच्चे थे, दोस्त थे, पैसा था. सब कुछ था पर एक बेचैनी के साथ |पर यह शोर शायद थोड़ा कम ज़रूर है, शायद तूफान से पहले का सन्नाटा.क्या पता फिर से कोई नई परत खुलने वाली है |बेचैन रहने की ऐसी आदत पड़ी है तो लगता है मर कर भी चैन नहीं आएगा |मेरी  बेचैनी शायद मेरी कब्र के उपर लगे उसे पेंड के फल में फलेगी,शायद मेरी कब्र के मिट्टी की खुश्बू ले जाती उस हवा में बहेगी , या फिर शायद उस मिट्टी में जो बरसात का पानी एक जगह से दूसरी जगह बहा कर ले जाएगा उसके साथ भटकेगी| कभी वो ही बारिश का पानी नदी से मिल आएगा तो कभी वही नदी समंदर से |मेरी बेचैनी और भी व्यापक होगी, बेचैन तो मैं रहूँगा |
© Neeraj Pandey

Tuesday, 31 March 2015

एक रैप... एक शॉर्ट प्ले के लिए

A rap written for one of my Play (Ice Paais) which was part of Short and Sweet Theatre festival, Bangalore 2015. Compositions was provided by the director of the play Sarbajeet Das.  


धुन...
(धूम पिचक धूम.…  पिचक धूम.…  धूम पिचक धूम
पिचक धूम.…  धूम पिचक धूम
पिचक धूम.…  धूम पिचक धूम...)

ये बेचारा आदत का मारा,
डेमोक्रेसी के सपने लेकर 
फिरता रहता,मारा मारा

(धूम पिचक धूम.…  पिचक धूम.…  धूम पिचक धूम
पिचक धूम.…  धूम पिचक धूम
पिचक धूम.…  धूम पिचक... धूम )

गाँव आ गया वोट डालने 
डेमोक्रेसी का बेबी पालने 
डेमोक्रेसी की रेलमपेली 
इसके साथ भी खेल ये खेली 

फिरता रहा वो सब अपनों में 
जब उसने अपनी जेब टटोली
फिर... 


Story continues to follow from here
© Neeraj Pandey

Monday, 9 March 2015

ये कुक्कड़

कसाइयों की दुकानों के बाहर
बास मारते दड़बे,
पीभ, थूक, खून, लार से
मवाद से हैं सने हुए
… और उनके अंदर कुक्कड़
चुपचाप अपनी जगह पकड़
कोस रहे नसीब को |

सड़क पर चलता आदमी उन्हें देख कर सोचता …

गुस्सा इन्हें भी आता होगा,
जब पंख नोचे जाते होंगे,
जब अपने खूब चिल्लाते होंगे,


जब थर थर करती गरदन पर
तेज़ छुरी चल जाती होगी ...
जब आधी गरदन लटके मारती
गहरे ड्रम में जाती होगी |

अपनी तरह क्या इनका भी
खून खोलता होगा ?
क्या, कर देते हैं क्रांति कोई
कुक्कड़ बोलता होगा ?

या फिर मौन धरकर सारे
शोक सजाते  होंगे,
और, थोड़ी जगह और मिल जाने का
जश्न मनाते  होंगे |


© Neeraj Pandey

Saturday, 17 January 2015

आओ ना

तुम्हें अक्सर कहते सुना है
        - ज़िंदगी के सफर में बहुत लेट हो गई हूँ मैं।
मैं अपनी रेल बचाकर लाया हूँ
इस शातिर दुनिया की नज़रों से,
आओ मेरा हाथ पकड़ चल चलो,
एक सफर के लिए।
आओ ना ।

© Neeraj Pandey

Wednesday, 24 December 2014

ऐलिस इन वंडर लैंड का कुवां

किताबों को उनके किये की सजा मिल रही है ।
बिन बुलाये मेहमान सी
हालत है अब इनकी ।

किताबें सवाल करती थीं ।

पूछती, मुझसे मेरे होने का मकसद ।
बतलाती, दुनिया में कितनी भूख मरी है।
समझती, कि लाल और नीली गोलियों में फर्क होता है।
हिलाती, मान्यताएँ और झझकोरती कम्फर्ट जोन को ।

पर स्क्रीन,
जैसे ऐलिस इन वंडर लैंड का कुवां
एक बार कूदो और गिरते जाओ,
खुद के प्रतिबिम्ब में,
बन लो अपनी दुनिया जैसी तुम चाहते हो ।
उगा लो, खेत और बना लो कारखाने
दूर कर दो भूखमरी और बेरोज़गारी ।
बचा लो किसी शहर को
किसी एलियन के अटैक से ।
दिखा दो सबको कि तुम्हारे अवतार
विष्णु से भी कहीं ज़्यादा हैं ।
सबके वाऊ, हाव्, आव्व के बीच
बन जाओ पूजनीय ।
सुलझा कर सारी पहेलियाँ
बन बैठो इस दुनिया के
सबसे सुलझे हुए शक्स।


© Neeraj Pandey

Saturday, 20 December 2014

रंगीन बादलों के ख्वाब

बाग़ में खेलते हुए रंगीन बादलों को देख 
हैरान होता था वो। 
उडते पंछी आदर्श थे उसके,
वो छुना चाहता था आसमान,
गढ़ना चाहता था बादल। 

तरीका?  उसे पता कहाँ था । 

उसके सपनों से अनजान,
जीवन की ज़रूरतों ने बतलाया उसे 
कि ये पेड़ ऊपर तक जाता है। 

आसमान पाने की चाहत में, 
चढ़ता रहा वो उसी पेड़ पर,
पर ऊपर जाकर हैरान हुआ,
धोखा हुआ था उसके साथ,
छाला गया था वो ।
पेड़ की अपनी सीमाएं थीं, 
बंट जाता था वो शाखाओं में,
कुछ टूटी, पतली, निर्बल तो कुछ सूखी ।  

एक-एक पाँव संभलकर रखता है अब वो
ज़मीन पर गिरने के डर से, 
आसमान का स्वप्न तो कब का
जीवन बचाने के यत्न का शिकार हो चूका है |  

© Neeraj Pandey