Wednesday, 13 January 2016

भरोसा

हम दोनों पैरों से एक साथ
कभी नहीं बढ़ते।

एक पाँव के उठते ही
वहाँ की ज़मीन छूट जाती है
और दूसरा पाँव ये देखता है,
हिचकिचाता है
पर पहले का सहारा लेकर
वो भी छोड़ता है अपनी ज़मीन,

एक भरोसे के साथ ...

इस तरह एक भरोसा
बदल जाता है- एक कदम में...

फिर वो 'एक कदम' बदलता है
सैकड़ों मीलों की दूरी में,
उन सारी संभावनाओं को पूरा करता
जो पहले कदम की
हिचकिचाहट में छुपी थीं।

भरोसा दौड़ना सीख जाता है।

आदमी के इतिहास की
सबसे बड़ी उपलब्धि थी-
वो 'पहला कदम' उठाना|

Friday, 8 January 2016

वे वहीँ ठीक हैं...

(३ जनवरी की रात, जो लिखते-लिखते ४ की हो गई थी. मुंबई)

बिस्तर के सामने लगे ड्रेसिंग टेबल के पास दो बार जाकर उसपर रखी किताबों को कहीं और रखने की नाकाम कोशिश कर चुका हूँ| दो डायरियाँ, कर्णकविता, प्रेमचंद, परसाई साब, रोबर्ट एम. पिरसिग, कालिदास, ओशो एक के ऊपर एक रखे हुए हैं और इन सबके ऊपर ग़ालिब अपने दीवान के साथ वहीँ बैठे मुझे टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं| पर मुझे पता है मैं आज रात इनमें से किसी को हाथ नहीं लगाने वाला| अभी ये लिख रहा हूँ और पढ़ने का आज का कोटा विनोद कुमार शुक्ल जी ने पूरा कर ही दिया है| इसके बाद बस सोना ही बचता है (अगर नींद आ जाए तो )|

दरअसल किताबों को ऐसे बेवजह साथ में रखने की आदत बचपन से है| स्कूल जाते हुए भी बैग भर के किताबें ले जाने की आदत थी| चाहे उस किताब का उस दिन स्कूल के रूटीन से कोई लेना देना हो ना हो मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था| "भई किताबें हैं तो ले जाएँगे"| पर मैंने ये वाली बात कभी बैग को बताई नहीं और ना ही कभी ये सोचा कि एक बार उससे पूछ लूँ कि “भाई तुझे कैसा लगता है एक साथ इतनी सारी किताबें उठा के?” पर गलती मेरी भी कहाँ थी, उस वक़्त कम ज़्यादा जैसा कोई कॉन्सेप्ट दिमाग में था ही नहीं। तब तो जो मन में आया- किया, जितना मन में आया- उतना किया। ना उससे कम और ना उससे ज़्यादा। पर एक दिन जब बैग ने अपनी साइड की सिलाई खोलकर मानहानि का दावा पेश किया तब मुझे उसकी फीलिंग्स का थोड़ा आईडिया हुआ, वो भी मम्मी के बताने पर| उसी दिन शाम को बैग की सिलाई के साथ मुझे भी बिठकर ठीक किया गया और ये तय हुआ कि अब से मैं बस उतनी ही किताबें ले जाया करूँ जितने की मुझे दरअसल ज़रुरत है|


अगले दिन सुबह उठकर दीवार पर चिपके हुए रुटीन के हिसाब से बैग में किताबें सजा लीं। उस वक़्त ये करते हुए मज़ा भी आया। पर घर से स्कूल जाते हुए ऐसा लगा नहीं कि स्कूल जा रहा हूँ| पीठ पर बैग तो डाला हुआ था पर कम किताबें होने की वजह से वो अन्दर से ही हिल रहा था| अपना बैग ही अपना नहीं लग रहा था उस दिन। उस दिन मुझे ठीक ठीक क्या महसूस हुआ था ढंग से याद नहीं, इसलिए उस बारे में लिखना भी बेमानी होगी| पर मुझे इतना ज़रूर याद है कि उस दिन कुछ ऐसा ज़रूर लगा था, जिसकी वजह से घर पहुंचते ही दुबारा वो सारी किताबें, जो मम्मी और मेरे क्लास के रूटीन के हिसाब से एक्स्ट्रा थीं, मैंने अपने बैग में फिर से रख ली थीं| अगले दिन बैग फिर से वही पुराना वाला...  :) वही वजन, वही चौड़ और अपनी सारी पसंदीदा किताबें अपने साथ। बैग अंदर से बिल्कुल भी नहीं हिल रहा था। क्या हो जाता? मम्मी की एक दो बातें सुनने के लिए मैं तैयार था, और अब तो ये भी पता चल चुका था कि बैग की मरम्मत अपने घर पर ही हो जाती है| 


वो फीलिंग मुझे आज इन किताबों को हटा कर कहीं और रखने की नाकाम कोशिश के दौरान समझ आई| इन किताबों का होना उन रिश्तों का होना है, जिनका बस अपनी जगह पर होना ही खुद में एक रिश्ता है, एक तसल्ली है, एक पूर्णता है| फिल्म लंचबॉक्स की आंटी और उसकी नायिका के रिश्ते की तरह... वो आंटी कभी भी फिल्म में दिखती नहीं, पर फिल्म की नायिका के लिए उनकी आवाज़ का होना ही उनका वहाँ मौजूद होना है| उनकी शक्ल भी नहीं, बस आवाज़... ताकि वो जब चाहे उनसे बात कर सकती है| थोड़ा कह सकती हैं, कुछ सुन सकती हैं। और मैं भी जब इन किताबों के कुछ पन्ने यूँ ही उठा कर पढ़ लिया करता हूँ तो लगता है, किसी से कोई बात हो गई...  इन डायरियों पर कुछ दो चार लाइनें लिख लेता हूँ, तो लगता है किसी से कुछ कह दिया| 

फिलहाल इनको उठा कर कहीं और रखने की हिम्मत नहीं है, उन्हें वहीँ रहने देता हूँ| उनका वहाँ होना एक मकसद सिद्ध करता है| और...  क्या ही फर्क पड़ता है, मेरा कमरा वैसे भी मेरे लिए काफी बड़ा है|

(आपकी राय का कमेंट सेक्शन में स्वागत है।)
-नीरज 

Tuesday, 5 January 2016

कोर्ट/आईना क्यूँ न दूँ

कहते हैं "किसी को अगर जानना हो तो उसकी दिनचर्या के बारे में पता लगाओ, देखो वो अपने जीवन की छोटी छोटी चीज़ों को कैसे करता है। और आपको पता चलता है कि उसका चरित्र कैसा है। कोर्टदेखते वक़्त भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ। पारम्परिक सिनेमा के स्ट्रक्चर से अलग हट कर हर किरदार के साथ उसके पर्सनल स्पेस में जाती यह फिल्म उनके बारें में बहुत कुछ दिखाती है।

कोर्ट न तो सिर्फ कोर्ट के बारे में है, और न ही इसके मुख्य किरदार नारायन कांबले के बारे में। यह फिल्म हमारे बारे में है, हमारे बीच के किरदारों के बारे में। चाहे वो पब्लिक प्रॉसिक्यूटर जो कोर्ट से घर जाते हुए रास्ते में कॉटन साड़ी और ओलिव आयल की बात करती है, घर पर जाकर डेली सोप देख रहे पति के लिए खाना बनाती है। या फिर डिफेंस लॉयर जो कोर्ट के बाद एक सुपर मार्किट में शॉपिंग करते हुए रोज़मर्रा की ज़रूरतों के सामान से लेकर शराब तक की खरीददारी करता है और पार्लर में फेशियल करवाता है। या फिर वो कोर्ट का जज जो एक महिला के केस की सुनवानी इसलिए नहीं करता क्योँकि उसने स्लीवलेस टॉप पहना हुआ है। 

कई बार फिल्म देखते हुए ये भी लगता है कि इस सीन की क्या ज़रुरत थी, ये तो नारायन कांबले का केस से नहीं जुड़ा, पर कुछ आपको पता चलने लगता है कि नारायन कांबले का केस तो एक जरिया है जिसकी ऊँगली पकड़ कर कोर्ट के वो कोने तलाशे जा रहे हैं, जिसके अंदर शायद हम अपना दिमाग रख कर भूल गए है। और उसके कारण हम कांबले के गाने में छिपे मेटाफोर को न समझ कर एक सीवर सफाईकर्मी की मौत की ज़िम्मेदारी हम उसके ऊपर मढ़ने लग जाते हैं| जबकि मौत की वजहें कुछ और ही हैं। उस सफाई कर्मचारी की बीवी से पूछे जाने वाले सवाल के दौरान कैमरा सिर्फ उसी का चेहरा दिखाता है और अपने पति के मौत के बारे में वो हर सवाल का ऐसे जवाब देती है जैसे कोई आम सी बात है। वो जानती है कि हर सीवर साफ़ करने वाले की मौत शायद ऐसी ही होती है। ये सीन हमारे समाज की विसंगतियों पर एक तमाचा है। ठीक उसके बाद जब डिफेन्स लॉयर जाते हुए वो अपने काम की बात करने लगती है। उसके पति की मौत उसके लिए स्वीकार्य हैं। 


दूसरी तरफ एक किताब लिख देने पर या सरकार की नीतियों के खिलाफ गाना गा देने पर नारायन कांबले को गिरफ्तार कर लिया जाना हमारी सरकार की तानाशाही का सूचक तो है ही, साथ ही साथ यह एक तरीका भी है जिससे ये बताया जा सकता है कि हम तुम्हारे आका है और ये सारे नियम हमारे हैं, इसमें रहना है तो हमारे हिसाब से रहना पड़ेगा। 

फिल्म के कुछ जिरह के सीन ये सवाल भी लेकर आते हैं कि आखिर हम कब तक अंग्रेज़ों के जमाने के बने हुए कानून के हिसाब से लोगों को सजा देते रहेंगे। दूसरी तरफ किस तरह हम लोगों ने लिखी हुई चीज़ को पत्थर की लकीर मान लिया है। हमारी सोच उस पैराग्राफ के पहले शब्द से शुरू होती है और आखिरी शब्द तक जाते जाते समाप्त हो जाती है। और आखिर हो भी क्यों ना क्योंकि हमारे पास और कुछ सोचने का टाइम ही नहीं है क्योंकि हमारा इवनिंग टाइम एंटरटेर्मेंट भी मराठी मानुस के अहम को बढ़ावा देना में जाता है या फिर किसी पब में बैठ कर गप्पियाने में। 

आखिरकार जब कोर्ट एक महीने के लिए बंद होता है, तब तक नारायन कांबले के केस का फैसला नहीं हुआ होता और अब उसको एक महीना जेल में ही रहना होगा। उसके बाद भी उसका क्या होगा पता नहीं शायद इसीलिए उस सीन में सारी लाइट्स धीरे धीरे बंद होती है और दर्शक को अन्धकार में छोड़ती हैं। 

दूसरी तरफ वेकेशन के लिए वही जज अपने दोस्तों के साथ शहर के पास के रिज़ॉर्ट में जाता है और वहाँ अपने दोस्त को उसके बेटे के बोलने के लिए सलाह देता दिखता है कि "इसे अंगूठी पहनाओ तब जाकर ये बोलने लगेगा", वो आईआईएम और आईआईटी में मिलने वाले पैकेज की बात करता है। इस तरह फिल्म हमें उस जज के पर्सनल स्पेस में भी ले जाती है और दिखाती है कि जिन्हें हम सबसे समझदार और दिमाग वाला मानते हैं और शायद इसी वजह से हमारे समाज के बड़े फैसलों पर निर्णय लेने का अधिकार उन्हें देते हैं उनकी खुद की बुद्धि कैसी है। 

फिल्म देख कर थोड़ा गुस्सा आना तो लाजमी हैं| पर ये सोच कर मैं भी करुणा से भर जाता हूँ कि जैसे हम हैं न ... बस आप समझ जाइये| 

(www.indiaree.com के दिसंबर,२०१५. अंक में प्रकाशित)

अपडेट:  

Monday, 4 January 2016

आस्था भी कोई चीज़ है |

वो शिरडी से दर्शन कर के आये थे । एक हाथ से साई बाबा का गुणगान किये जा रहे थे और दुसरे से अपनी आस्था बघार रहे थे । बता रहे थे कैसे वहाँ धर्म कर्म के काम में उन्होंने बढ़ चढ़ कर दिलचस्पी ली। कैसे उनका जीवन साल में बस एक बार शिरडी के दर्शन करने मात्र से सुचारू रूप से चलता रहता है। मैं भी हाथ जोड़े और मुँह फाडे सब सुन रहा था । भई आस्था तो मुझे भी है। तभी उन्होंने अपनी नाक छिनकी और अपनी शर्ट में पोंछते हुए बोले " ट्रेन के सफर में ठंड लग गई।" फिर थोड़ी देर बाद रुक कर ऊपर उँगली दिखाते हुए बोले "चलो अब सर्दी भी तो उसी की माया है। बाबा सब हर लेंगे। बस हमारी आस्था और उनकी कृपा बनी रहे। जय साई राम । " 'कृपा' शब्द सुनते ही मुझे याद आया कि बातों बातों में मेरा अपना आध्यात्मिक कार्यक्रम छूट रहा था। मैंने टीवी ऑन किया और 'निर्मल बाबा ' वाला प्रोग्राम लगा कर बैठा और हाथ जोड़कर सुनने लगा। कृपा आनी शुरू हो गई थी। और मेरे पीछे खड़े वो ये सब देख कर अपनी नाक छिनकते हुए बड़बड़ाते रहे " अरे चूतिया हो क्या?… ऐसे भी कहीं कृपा आती है… , बेवकूफ बना रहा है वो.… , अरे तुम तो पढ़े लिखे हो… वगैरह वगैरह… " पर मैं भी उनको इग्नोर कर के अपनी आस्था में लगा रहा । क्योंकि जब मेरी नाक बहती थी तब 'निर्मल बाबा ' की कृपा से ही ठीक होती थी । मैं कृपा बटोरता रहा, वो बड़बड़ाते रहे …

Saturday, 2 January 2016

क्यों? ठीक ठीक पता नहीं

(कांदिवली से एयरपोर्ट, के दौरान  1/1/16. 10:20 P.M. मुंबई .)
अभी अभी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचा हूँ, सौरव से मिलने। आदतन मैं जल्दी पहुँच गया और सौरव के आने में अभी थोड़ा वक़्त है। मैं अभी एक कमाल की ख़ुशी से भरा हुआ हूँ। वजह मुझे पता नहीं। सोचा किसी को फ़ोन कर के अपने अंदर अभी जो भी चल रहा है वो बाँट लूँ। फिर यह सोच कर रहने दिया कि इसको लिख लेना ज़्यादा बेहतर होगा। अक्सर मेरे दोस्तों की शिकायत जो मेरे तनाव को लिखने के लिए रहती है, शायद इससे थोड़ी कम हो सके।
मुम्बई में हल्की ठण्ड का मौसम है। ठण्ड इतनी ही की मैं हाफ टीशर्ट पहन कर बैठा हुआ हूँ।  हाँ सर्दी की इज़्ज़त रखने के लिए सर पर एक कैप ज़रूर डाल ली है। थोड़ी देर पहले ही एक कविता लिखी थी और अब सौरव से मिलने निकल पड़ा। कांदिवली के हाईवे से मैंने बस ली, मैं पहली बार एयरपोर्ट  बस से जा रहा था तो आशंका थी कि अगर ट्रैफिक मिला तो मैं कहीं लेट ना हो जाऊँ। इसलिए घर से पहले निकल लिया था। सड़कें और बस दोनों आज उम्मीद से बहुत ख़ाली दिख रहे थे। मैंने कंडक्टर से टिकट ली और पीछे से 2 सीट्स छोड़ कर खिड़की पकड़ पर बैठ गया। बस चली जा रही थी एक के बाद एक फ्लाईओवर फांदती हुई। खिड़की से हल्की ठंढी हवा बस के अंदर आ रही थी, मुझे अच्छा लगने लगा। और एकाएक मैं वो तमाशा का गाना "वत वत वत..." का अंतरा गाने लगा।
"ओ.. हम हमहीं से, तोहरी बतिया
कर के बकत बतावें हैं,
खुद ही हँसते, खुद ही रोते,
खुद ही खुद को सतावें हैं..."
मैं ज़ोर ज़ोर से गा रहा था,जैसे बस की रफ़्तार से कोई मुक़ाबला हो। इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे सामने की सीट पर बैठी हुई लड़की ने पलट कर मुझे देखा। मुझे एक पल के लिए लगा कि उसको अजीब लगा पर वो एक स्माइल दे कर दुबारा सामने की ओर देखने लगी।
तभी बस का एक झटका आया और मैं सीट पर अपना बैलेंस खोने लगा।गाने का 'बेसुर' बार बार
बिगड़ रहा था|  पर मुझे अभी गाना गाने में मज़ा आ रहा था। एक ख़ुशी मिल रही थी| पता नहीं क्यों मुझे जब भी ऐसा कुछ अच्छा लगता है, मुझे दिल्ली की याद आने लगती है। मुम्बई का हाईवे दिल्ली का रिंग रोड बन गया और बेस्ट की बस 'DTC' की। फिर मुझे एहसास हुआ कि अगर टायर के ऊपर वाली सीट से हटकर पीछे बैठ जाए तो शायद सीट इतनी ना हिले, और इस लड़की से थोड़ा फासला भी बढ़ जाएगा। फिर क्या था, मैंने पीछे देखा, सीट पूरी तरह से खाली थी। मैं कूदकर उसपर बैठ गया। पर मैंने इस बार सामने वाली सीट का रॉड पकड़ा, खिड़की की तरफ झुककर बैठा जैसे बच्चे किसी amusement पार्क में किसी राइड पर बैठते है। बस हाईवे पर वैसे ही दौड़ती चली जा रही थी, हवा वैसे ही हल्की ठंडक बस के अंदर ला रही थी। सीट का हिलना अभी भी वैसा ही था,  मैंने गाना चालू रखा, और वहीँ बैठे बैठे एक ख़ुशी से भरता गया। जिसकी वजह का मुझे अभी भी ठीक ठीक पता नहीं| एयरपोर्ट का स्टैंड अभी आया नहीं था, पर अब तक गाने का दूसरा अंतरा आ गया था... :)
"जान गए लेके सुर्खी कजरा
टेप टाप के, लटके झटके
मार तू हमका फँसावत...
पर ई तो बता
तू कौन दिसा, तू कौन मुल्किया
हाँक ले जावे...
हौले हौले बात पे तू
हमारी वाट लगा..."
...बस कहीं और ले जा रही थी और मैं कहीं और ही चला जा रहा था।
- नीरज


नाटक शुरू होने से ठीक पहले...

अँधेरे में, साफ ना दिखना
कई सारी कल्पनाओं को
जन्म देता है।

सामने खेले जाने वाले
नाटक की परिकल्पना मात्र
एक कुलबुलाहट पैदा करती है।

ये कुलबुलाहट, हमेशा
एक उम्मीद के साथ आती है,
और, मेरे सामने
तैयार करती है - एक दृश्य
सुनहरी रौशनी का...

एक नाटक ठीक मेरे सामने
जीवित हो उठता है।

... वाह!

इसके किरदारों को देखने की,
जानने की, मिलने की इच्छा
इस कुलबुलाहट को
गुदगुदी में बदल देती है...
और, मैं उनसे मिलने
मंच पर पहुँच जाता हूँ

पर यहाँ इनकी आवाज़े
बदली हुई हैं,
उनके चेहरे कुछ और हैं...
मैं उन्हें उनकी पहचान बताता हूँ
- वो मुकर जाते हैं।
मैं कहता हूँ - "मैं तुम्हें जानता हूँ",
- वो हँस पड़ते हैं।
उनकी हँसी मुझे अट्टाहास लगती है।

वो अपना संवाद भूलकर
कुछ और बड़बड़ाते हुए,
कहीं और चले जाते हैं।
दृश्य गायब हो जाता है,
गुदगुदी, सिहरन में
तब्दील हो जाती है...

मेरे दर्शक से पात्र बनते ही
कहानी बदल जाती है|
... परदे के उठते ही
मेरी कल्पनाओं वाला नाटक
ख़त्म हो जाता है।

Wednesday, 23 December 2015

फाइंडिंग फैनी/कल्पना और यथार्थ के बीच की चिट्ठी

साल खत्म हो रहा है, और इस साल कुछ कमाल की फिल्में आई हैं। मसान, तलवार, दम लगा के हईशा, NH 10, तमाशा वगैरह मेरी इस साल की लिस्ट में कुछ अच्छी फिल्में हैं। दूसरी तरफ कुछ और फ़िल्में हैं जो मैंने पिछले साल यानि कि 2014 में देखी थीं पर उनका हैंगओवर मैं अभी तक महसूस करता हूँ | उनमें से आनंद गांधी की ‘शिप ऑफ़ थीसियस और रजत कपूर की ‘आँखों देखी‘ हैं। ये दोनों फिल्में मेरे साथ साथ बढ़ रही हैं। हर रोज़ मैं इन फिल्मों को अपने आस पास घटित होता हुआ देखता हूँ। पर साल 2014 में एक और फिल्म रिलीज़ हुई थी जो उस वक़्त मुझे बहुत पसंद आई थी पर मैंने उसे दुबारा कभी नहीं देखा। यह फिल्म कहीं न कहीं उस इम्पोर्टेन्ट नोट की तरह थी जो साल के कलैंडर में कहीं खोकर रही गई। वो फिल्म है 'फाइंडिंग फैनी'| आज जब मेरा दोस्त ये फिल्म देख रहा था तो मुझे लगा जब ये अचानक से सामने आ ही गया है तो इस इम्पोर्टेन्ट नोट को दुबारा से पढ़ना चाहिए।

2014 में फिल्म की रिलीज़ के बारे में अगर विकिपीडिया की मानें तो 'फाइंडिंग फैनी' एक कॉमेडी फिल्म हैं। पर मेरे विचार में यह फिल्म कॉमेडी की सतह से काफ़ी अंदर की तरफ गोता लगाती है, और हमारी स्मृति की कल्पनाओं और वर्तमान के यथार्थ के बीच की कोई जगह तलाशती है, जिसे हम सब अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से तैयार करते हैं।

फ्रेडी (नसीरुद्दीन शाह) जो कि लगभग 60 साल का एक बुज़ुर्ग है| उसे एक रात एक खत मिलता है जो उसने उस लड़की स्टेफनी फर्नांडिस (फैनी) के लिए लिखा था, वो आज भी जिससे  प्यार करता है| इस बात को 46 साल बीत चुके हैं, पर ये खत फैनी तक कभी पहुँचा ही नहीं और फैनी को तो पता ही नहीं है कि फ्रेडी उसके बारे में क्या सोचता है।
एंगी (दीपिका पादुकोण) जो कि एक यंग विडो है को ये बात पता चलती है और वो फैनी को ढूंढने में फ्रेडी की मदद करना चाहती है। इसमें उसका साथ देने के लिए ‘रोज़लिन’ (डिम्पल कपाड़िया), ‘पेंटर डॉन पेद्रो’ (पंकज कपूर) और एंगी का बचपन का दोस्त ‘सवियो’(अर्जुन कपूर) एक साथ आते हैं। इन सबकी ज़िंदगी के अधूरेपन की अपनी अलग कहानी है, जिससे ये जूझ रहे हैं| फैनी को ढूंढने के दौरान एक दूसरे से तालमेल बिठाते उस टुकड़े को ढूंढने की कोशिश करते हैं जिसे पाकर वो थोड़ा संतुष्ट महसूस कर सकें। हम सबकी तरह...

यह फिल्म दरअसल ‘फैनी’ की खोज कम और के उस टुकड़े की ख़ोज ज़्यादा है जिसकी तलाश जाने अनजाने हम सबको है| और यह उम्मीद भी कि शायद उसके मिल जाने पर हमें 'पूरा' होने का एहसास हो। फैनी को ढूँढ़ते हुए इन पाँचों का रास्ता भटक जाना और उस भटकने में एंगी और सवियो के उस प्यार का मिलना जो शायद वक़्त के साथ बंट कर अलग अलग दिशाओं में चला गया था | …थोड़ा भटककर खुद को पाने वाला एहसास तो है ही, जिसकी कल्पना हम हमेशा करते रहे हैं। पर एक दुसरे को पाने के बाद भी वहाँ एक अनिश्चितता का बना रहना और फिर भी उस अनिश्चितता में भी प्यार का पनपना, यथार्थ के धरातल की कहानी कह जाता है। इन सारे भटकने, खोने और मिल जाने के बीच मैं ये देखना चाह रहा था की फ्रेडी जब फैनी को मिलेगा तो उससे क्या कहेगा? ...कैसा महसूस करेगा वो, जब वो अपनी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत एहसास से मिलेगा, जो ज़िन्दगी जीने के तरीकों के बीच खोकर बस उसकी कल्पनाओं में इस उम्र तक ज़िंदा है।  ...और फ्रेडी की फीलिंग्स जानकर फैनी कैसा महसूस करेगी? कैसे रियेक्ट करेगी वो? 

फ्रेडी की नज़रों में फैनी आज भी वैसी ही है, जैसा उसने उसे आख़िरी बार देखा था। बिल्कुल हमारी कल्पनाओं की तरह जैसे हम अपने किसी खूबसूरत पल का स्क्रीनशॉट लेकर रख लेते हैं, और हमें उम्मीद होती है की वो चीज़ आज भी वैसी ही होगी| शायद हम उसकी खूबसरती के तिलिस्म से कभी निकलना नहीं चाहते| पर यथार्थ के सामने आने पर उसकी शक्ल इतनी बदल चुकी होती है कि हमें कुछ वक़्त लगता है हमारी कल्पनाओं और यथार्थ के बीच  सामंजस्य ढूंढने में। ठीक इसी तरह जब आखिरकार फ्रेडी फैनी को मिलता है तो अपनी पुरानी कल्पना की वजह से फैनी की बेटी को फैनी समझ बैठता है, जो हू-बहू जवानी के दिनों की फैनी जैसी दिखती है| पर तुरन्त ही उसे पता चलता है कि फैनी तो मर चुकी है। वो ताबूत में लेटी हुई फैनी की  तरफ देखता है, पर ये क्या... फ्रेडी खुद भी उसे पहचान नहीं पाता। पर वो खुद की तसल्ली के लिए उसकी बेटी से पूछता है कि “क्या फैनी ने कभी उसका नाम  लिया था? क्या फैनी ने कभी उसके बारे में कोई बात की थी?” क्योंकि फ्रेडी को यह भी लगता है कि फैनी उसका  इंतज़ार अब तक कर रही थी। और वो इसी उम्मीद से उसे ढूँढ रहा था कि जिस फैनी को वो पिछले 46 साल से भूला नहीं है, उसे भी उसकी याद तोहोगी ही। पर दुबारा यथार्थ फैनी की कल्पनाओं पर भारी पड़ता है "फैनी ने उसे कभी याद नहीं किया। फैनी की बेटी ने तो कभी फ्रेडी का नाम भी नहीं सुना।" यह पूरा सीन देखकर मैं फ्रेडी के लिए एक दुःख से भरा बस मुस्कुराता रहा (इस एहसास के लिए शायद एक नए शब्द की ज़रुरत है|) । क्योंकि मैं सच में चाहता था कि फ्रेडी एक आखिरी बार तो फैनी से मिल ले। कम से कम वो फैनी को बता तो दे कि वो उसके बारे में क्या सोचता है। पर यहाँ तो फैनी को फ्रेडी का नाम तक याद नहीं है|

पर जैसा कि कहते हैं कि "हर अंत के बाद एक शुरुआत भी पनपती है।" ठीक वैसे ही फिल्म का हर कैरक्टर इस सफर के दौरान अपनी ख़ुशी पाने की एक नई शुरुआत फिल्म के अंत में करता है। और अपनी कल्पनाओं से निकल यथार्य को चुन लेता है| पर ये तो फ्रेडी की कहानी थी। हमारी ज़िन्दगी में यथार्थ और कल्पना दोनों में से किसे चुनने का सुख ज़्यादा है वो तो तब ही पता चलेगा जब हमारी कल्पनाएँ हमारे अपने यथार्थ से टकराएंगी।  पर अभी के लिए मैं यही कहूँगा कि "लिखी हुई चिट्ठियों को वक़्त रहते उनके पते पर पहुँचना बहुत ज़रूरी है।" क्या पता कब कौन सा लिफ़ाफ़ा खुलकर हमारी 'कल्पना' को 'यथार्थ' में  बदल दे।
(आपकी राय का कमेंट सेक्शन में स्वागत है।)
- Neeraj Pandey

Saturday, 19 December 2015

सहना और जीना

वो जो तैयार कर रहा है
उसका सुख वो कभी जी नहीं पाता।

वो तो बस सहता है
इसके तैयार होने को,
इसके तैयार होने तक,
एक न्यूनतम मजूरी पर,
हर क्षण...

और एक दिन चुपचाप
वक़्त के सरकने पर
धीरे धीरे सरकता हुआ
अपनी शक्ल समेटता
वो हो जाता है कहीं गायब,

फिर सालों बाद
कोई और आकर
भोगता है वो सारा सुख
जो उसने कभी सह सह कर
पार किया था।

मैंने भी कई बार पलट कर
देखा है
तो चकित हुआ हूँ,
वो कौन था जो सह रहा था
वर्षों से?

क्योंकि, अब जो ये जी रहा है
वो, वो नहीं है।
सहने वाला हर बार निकल जाता है
शांत क़दमों से,
और फिर मैं ढूँढने लगता हूँ
खुद को
उस सहने वाले और इस जीने वाले के बीच कहीं।

Monday, 9 November 2015

संभावनाएँ

तुम निकल रही हो
अपनी संभावनाओं की तलाश में,
पर छोड़ जा रही हो
एक बिंदु मेरे पास...

बिंदु, जिसमें संभावनाएं थी
लकीर बनने की
लकीर, जिसके साथ हम तय कर सकते थे
क्षितिज तक की दूरी
या शायद उससे भी कहीं पार...

मैंने उस बिंदु को फिलहाल
रख लिया है संभालकर,
अपनी हथेलियों में दबाकर,
तिल बनाकर,
कि
तुम्हारे वापस आने पर
जब कभी संभावनाएं अनुकूल होंगी,
ये तिल जीवन रेखा में बदल जाएगा,
वो बिंदु लकीर हो जाएगी|

© Neeraj Pandey

Wednesday, 21 October 2015

अनुवाद : भोजपुरी से हिंदी : मैना

'मैना' 
[कवि - गोरख पाण्डेय / अनुवाद - नीरज पाण्डेय ]

राजा ने एक दिन मारी 
आसमान में उडती मैना 
बाँध के घर वो लाए मैना 

इसी के पिछले जन्म के कर्म,
किया मैंने शिकार का धर्म 
राजा बोले राजकुमार से 
अब तुम लेकर खेलो मैना,
देखो कितनी सुन्दर मैना ।

खेलने लगा जब राजकुमार
उनके मन में उठा शिकार 
पंख क़तर कर बोला उसने 
मेहनत कर के उड जा मैना । 

है पंख बिना कोई  उड़ पाया, 
राजकुमार को गुस्सा आया 
तब फिर तोड़ी टाँग और बोला 
अब तुम नाचो मैना
ठुमक ठुमक कर नाचो मैना । 

है पाँव बिना कोई नाच पाया 
राजकुमार थोड़ा पगलाया 
तब फिर बोला गला दबा के 
अब तुम गाओ मैना
प्रेम सा मीठा गाओ मैना । 

मरकर कैसे गाने पाए 
राजकुमार राजा बुलवाए 
बोले, बड़ी दुष्‍ट है ये
अब एक बात न माने मैना
सारा खेल बिगाड़े मैना। 

जब तक खून पीया न जाए 
तब तक कोई काम न आए 
राजा कहें कि सीखो कैसे 
चूसी जाए मैना 
कैसे स्वाद बढ़ाए मैना । 

Saturday, 10 October 2015

भूखा कटोरा

एक खाली कटोरा
अपने ही पेट से धँसा हुआ,
जो सिर्फ समा लेना जानता है |

यह देनेवाले की
शक्ल नहीं पहचानता
और ना ही इसे परवाह है ।
...बस हिसाब लगाता रहता है
और हरबार पाता है
खुद को - अतृप्त |

ये भूखा कटोरा
वहम खा सकता है,
परछाइयाँ निगल सकता है,
धुन्ध चबा सकता है
और आहार बना सकता है
सारी माया को |

इसकी भूख इतनी है
कि
एक पूरा समानांतर विश्व
समा सकता है इसमें
और ये साला कभी एक
डकार तक नहीं मारेगा |

पड़ा हुआ है अपने जन्म से ये
यूं ही खोखला
और ऐसा ही रहेगा |

तुम्हें वहम था...
यह किसी फ़कीर का नहीं,
भिखारी का कटोरा है। 

© Neeraj Pandey

Thursday, 1 October 2015

मिडनाइट इन पेरिस : बीते कल की गर्म चादर

जैसा कि अक्सर मेरे दोस्तों की शिकायत रही है कि " तुम जब खुश होते हो तब उस ख़ुशी को क्यों नहीं लिखते ?" इसलिए आज लिख रहा हूँ कि "मैं खुश हूँ" । इतना खुश कि अभी अपनी कुर्सी से उठकर नाचने का मन हो रहा है ।  इतना खुश कि किसी को कसकर गले लगाने का मन हो रहा है। पर दोस्त जिसके साथ में रहता हूँ वो भी 2 दिनों के लिए शहर में नहीं है और मैं घर में अकेला…  । खैर, खुश होने की दरअसल दो वजहें हैं । पहली ये कि मैं फिल्में देखना सीख रहा हूँ । ये अपने आप में बैंगलोर में रह कर 'कन्नड़' और मुंबई में रहकर 'मराठी' सीखने की कोशिश जैसा है... एक नई भाषा । और दूसरी वजह ये कि वुडी एलन की फिल्म " मिडनाइट इन पेरिस " अभी अभी थोड़ी देर पहले देख कर शुरू की … हाँ "देखकर शुरू की " क्योंकि  मुझे पता है ये फिल्म मैं कई बार देखने वाला हूँ, इसका स्क्रीनप्ले पढ़ने वाला हूँ, मेकिंग देखने वाला हूँ वगैरह वगैरह ।


मैंने अनेक बार अपने आस पास के लोगों, दोस्तों और खुद को यह कहते सुना है कि " भाई असली वक़्त तो वो था जो पांच साल पहले था । जब हम लोग ऐसा करते थे, वैसा करते थे।  क्या बढ़िया टाइम था वो।" दरअसल इस तरह से वक़्त को नापने का ये कार्यक्रम मैं लगभल पिछले कुछ दस बारह सालों से हर उम्र और हर वर्ग के लोगों में देख रहा हूँ । किसी उम्रदराज अंकल से भी बात होती है तो वो भी यही कहते हैं | 

"वो भी क्या दिन थे ।" 
"और…अंकल जी आज ?" 
"अरे आज तो झंड है। " 

जवानी में - बचपन, और बुढ़ापे में - जवानी का खूबसूरत लगना एक आम सी कहावत है। मुझे अक्सर लगता है, हम सबको बीते हुए वक़्त की चादर की गर्मी ज़्यादा सुकून देने वाली लगती है। उसकी गर्माहट में एक आराम होता है और हम वहीँ पड़े रहना चाहते हैं और शायद इसी वजह से हम आज में जो कमाल घट रहा है उसे नहीं देख पाते या उसको उतना तवज्जो नहीं देते। कई बार मैं ये देखने के लिए कि मेरा आज कैसा दिखता है ? मैं मानसिक तौर पर थोड़ी देर रुक जाता हूँ और फिर कुछ साल आगे जाकर (जो कि भविष्य होगा) खुद की 'आज' की ज़िंदगी को देखना चालू करता हूँ… किसी जिये जा चुके अतीत की तरह। फिर मैं क्या देखता हूँ ? मुझे नज़र आता है " उफ्फ्फ वो भी क्या दिन थे :) । " और मेरे अंदर का आदमी जो अभी वर्तमान में ही बैठा हुआ है वो जीवन का धन्यवाद करता है, हल्का सा स्माइल करता है और कहता है "जीवन बहुत खूबसूरत है। और अभी जो मेरे साथ चल रहा है आगे जाकर मेरी कहानी का एक खूबसूरत अध्याय बनने  वाला है । " 

'वुडी एलन' की ये फिल्म भी कुछ ऐसा ही कहती है, उसके मुख्य किरदार 'गिल' जो की 2010 में जीने वाला एक राइटर है। एक रात सड़क के किनारे रास्ता भटककर बैठा हुआ है। तभी वहाँ एक टैक्सी आकर रुकती है… उसमें से कुछ लोग निकल कर उसे बुलाते हैं। और 'गिल'' उस टैक्सी में बैठ कर उन लोगों के साथ 1920's में चला जाता है। पिकासो के वक़्त में… वो वक़्त जो 'गिल' के हिसाब से साहित्य और कला एक गोल्डन एरा है। सब कुछ बहुत कमाल -सुनहरा। वो वहाँ जाकर उन लोगों से मिलता है जो उसके जीवन के सबसे बड़े इन्फ्लुएंस रहे हैं । जिनसे वो हमेशा से मिलना चाहता था। जिनका वो फैन रहा है। वो 'हेमिंग्वे' को अपनी किताब दिखाता है।  है न कमाल की बात ! सोचों अगर कभी तुम्हारे साथ भी ऐसा हो !!  कुछ वक़्त के लिए तो उसे इस पर यकीन नहीं होता पर अब हर रात वो वही टैक्सी पकड़ कर उस एरा में आ जाता है… उस बीते हुए कल के किरदारों के साथ जीने। धीरे धीरे उस वक़्त और किरदारों से 'गिल' का एक रिश्ता बनने लगता है। वो 'एड्रिआना' से मिलता है जो कि 'पिकासो' की गर्लफ्रेंड  है। इस मिलने जुलने के दौरान 'गिल'' और 'एड्रिआना' एक दुसरे के प्यार में पड़ जाते हैं ।


एक रात दोनों पेरिस की सड़कों पर घूम रहे हैं और फिर एक बार एक वैसी ही टैक्सी आकर उनके पास रुकती है, और वैसे ही लोग निकल कर 'गिल' और 'एड्रिआना' को अपनी तरफ बुला रहे होते हैं। दोनों इस टैक्सी में बैठते है और एक बार फिर ये टैक्सी इन दोनों को एक ऐसे वक़्त में लेकर जाती है जो 'एड्रिआना' के लिए एक बिता हुआ एरा है। यहाँ 'एड्रिआना' के लिए सब कुछ बहुत कमाल और सुनहरा है। वो यहाँ उन लोगों से मिलती है जो उसके जीवन के इंस्पिरेशन रहे हैं। वो वहीँ रहना चाहती है, वो वापस उस एरा में नहीं जाना चाहती जो उसके लिए अभी भी वर्तमान है, '1920's' ।  पर 'गिल' इस बात के लिए तैयार नहीं होता उसे कुछ और भी समझ आने लगा है और वो वहाँ से वापस आ जाता है ।


पूरी फिल्म इस बात को तह दर तह पलटती जाती है कि किस तरह हम ये सोचते हैं कि जो हमारा बिता हुआ वक़्त था, कितना शानदार रहा होगा। वो वक़्त भी, जिसको शायद हमने कभी जिया भी नहीं, बस उसके बारे में पढ़ा है या सुना है। पर अगर हम सच में उस वक़्त के लोगों से मिलें तो हमें पता चलेगा कि उस वक़्त की कठिनाइयाँ क्या थीं। और यही बात 'गिल' को फिल्म के आखिर होते होते समझ आ जाती है। जिस बीते हुए कल में वो जाकर पिकासो, हेमिंग्वे, स्टीन, दली, एड्रिआना और भी जाने कितने किरदारों से मिलता है। दरअसल वो वक़्त उसके लिए तो गोल्डन एरा है, पर उस वक़्त के भी अपने उतार चढ़ाव है, अपनी परेशानियाँ भी है। और अगर वो वहाँ रहने लगा तो शायद वो वक़्त भी अपनी खूबसूरती धीरे धीरे छोड़ने लगेगा। उसे समझ में आता है कि जो आज वो जी रहा है, इस वक़्त के अपने मायने और महत्त्व हैं। जिसको किसी भी एरा से कम्पेयर करना ठीक नहीं होगा। इसीलिए फिल्म के अंत में वो ये निर्णय लेता है कि उसे आज में ही रहना है, 2010 में। क्योंकि अगर भविष्य की दूरबीन से इस वक़्त को देखा जा सके तो यह वक़्त भी किसी भी सुनहरे वक़्त से कहीं भी कम नहीं है। 


बाकि फिल्म में और भी बहुत कुछ है जो बहुत ही कमाल का और सुहाना सा है, जिसकी वजह से मैं खुश हूँ । हाँ मैं खुश हूँ, इस फिल्म को देखकर और मैंने इसे लिख भी दिया है । आज रात मैं रोज के मुकाबले थोड़ी और देर तक जागूँगा |  क्योंकि आज और अभी में रहने और इस ख़ुशी को महसूस करने के लिए आँखे खुली रखना बेहद ज़रूरी है।

© Neeraj Pandey

Saturday, 26 September 2015

विरासत

ये ब्लॉग घर ही तो है,
जिसमें गूंजती हैं किलकारियाँ  
कविताओं की,
और पाँव पसार कर बैठे
होते है कुछ पद्द। 
…अपने अपने कमरों में । 

कभी कोई गुज़रता हुआ पास से 
छोड़ जाता है 
कोई कमेंट, 
जैसे किसी की चिट्ठी आई हो । 

तो कभी कोई पडोसी आकर टोकता भी है 
कि, कविताएँ बिगड़ने लगी हैं अब,
ज़रा ध्यान दो इनपर, माँझो इनको । 

मैं उन्हें सामने रख घंटों बैठता हूँ, पूछता हूँ 
उनकी परेशानी 
अपने बच्चे की तरह 
और कभी 
बस मेरे ठीक होने से 
उनके चेहरे भी चमक उठते हैं   । 

कई बार तारीफ सुनकर 
सीना फूलता तो है ही  
पर खुद के बच्चों पर मुग्ध होना भी 
उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं । 

मेरे रिश्तों के आधार भी मैंने 
इसी की बालकनी में शुरू होते देखे हैं,
वो लोग 
जो आज अजीज़ हैं 
वो कविता की ऊँगली पकडे
ही तो आये थे मेरी तरफ 
… अच्छे लोग हैं । 

उम्मीद है एक उम्र ढलने पर 
ये मुझे रास्ता दिखाएंगी
और चाहत ये कि 
मैं जाना जाऊं 
इन्हीं के नाम से…

मैं विरासत में घर नहीं एक ब्लॉग छोड़ना चाहता हूँ ।

© Neeraj Pandey

Saturday, 29 August 2015

एक पन्ना : रात, चाय, व्हाट्सएप्प और...

फेसबुक पर अनंत ने अभी अभी अपनी कवर फोटो बदली है… चाय का एक गिलास पकड़े  हुए… चाय पीते हुए । कसम से ललचाने वाली फोटो है।  गिलास बिल्कुल वैसा,  जिसमे मैं अपनी कॉफ़ी पीता हूँ। मुझे चाय से ज़्यादा कॉफ़ी पसंद है। स्पेशली फ़िल्टर कॉफ़ी। उसके निचोड़ कर निकाले गए कॉफ़ी बीन्स के रस की थोड़ी मात्रा में मिला दूध और थोड़ी सी शक्कर का जो जादू होता है मैं उसे कह कर शायद बयां नहीं कर सकता। क्योंकि मैं खुद भी इस लाइन को लिखते लिखते यही सोच रहा हूँ कि उसके लिए सही शब्द क्या होगा। मैं लिख नहीं पाया कि मैं कैसा महसूस करता हूँ। पर एक बात तो तय है फ़िल्टर कॉफ़ी से मेरा एक रिश्ता बन गया है। कम से कम मैं ये तो कह ही सकता हूँ कि उबले हुए कॉफ़ी बीन्स को एक कपडे में डालकर निचोड़ना शायद जीवन के उस पल को निचोड़कर एक प्याले में पीने जैसा है  एक प्याले में जीवन के उस पल का सारा रस.… सारा निचोड़। 

पर अभी अनंत की वो फोटो देखकर मुझे चाय पीने का मन हो रहा है। रात के डेढ़ बजे…  पर क्यों? अभी तो कई लोगों की आधी रात गुज़र चुकी होगी। मेरे कमरे में भी बस मैं और मेरा मोबाइल जाग रहे हैं। मैं सोच रहा हूँ की बाहर जाकर चाय पी लूँ। पर वो उस तरह के गिलास में नहीं मिलेगी जिसमें अनंत पी रहा है। मैं चाहता हूँ चाय की एक प्याली के साथ कुछ पढ़ना, पर मेरे अंदर का एम्प्लॉयी मुझे कल ऑफिस जाने की याद दिला रहा है। पर चाय का ख्याल है कि अभी भी जागा हुआ है। मैं किसी के साथ बैठकर पीना चाहता हूँ, भले ही वो किरदार किताबों से निकल कर क्यों न आये। 

दरअसल मैं अभी भी जागना चाहता हूँ… चाय तो जागने का बहाना है बस। मैं किसी को भी फ़ोन करके रात के इस वक़्त डिस्टर्ब नहीं करना चाहता।  और सभी मेरे इस पागलपन में अपनी हिस्सेदारी देख भी नहीं सकते। मैंने ये सब सोचते सोचते दुबारा मोबाइल उठा लिया, कुछ लोग व्हाट्सऐप पर अभी भी ऑनलाइन हैं। मैंने एक दोस्त के लिए कुछ शब्द टाइप किया पर कुछ सोचकर मिटा दिया। तभी मुझे याद आया, तुम जाग रही होगी। मुझे अमेरिका की अच्छी बात यही लगी कि देर रात भी अगर मैं तुमसे बात करना चाहूँ तो तुम जाग रही होगी। तो मैंने तुम्हे पिंग किया…  हमनें बातों बातों में जीवन में चल रही कुछ बातों को व्हाट्सप्प के नेटवर्क पर हमेशा के लिए दर्ज़ कर दिया। अपने जीवन में हो रहे उतार चढाव के साथ फिल्मों की बात भी की, शायद जो किरदार मैं ज़िंदा करना चाहता था, कई हद्द तक तुमसे बात कर के मैंने गढ़ लिया। 

ये बातें इतनी पर्सनल सी हो गयीं कि मुझे एक कोने की ज़रुरत महसूस होने लगी। जहाँ सिर्फ हम बात कर पाएं, पर ऐसा संभव ना होता हुआ देख मैंने कम्बल ओढ़ लिया और उसके अंदर मोबाइल रखकर तुमसे बातें करने लगा। हमारी बातें अलगे बीस मिनट तक चलती रहीं, जितने में शायद एक कहानी और दो चाय के छोटे छोटे प्याले ख़त्म हो जाते। वैसे ही प्याले जिसमे अनंत चाय पी रहा था। मुझे अचानक याद आया वक़्त भी 1:40 हो चुका है, और तुम अभी ऑफिस में हो। पता नहीं कैसे पर तुमसे बात कर के वो मेरी चाय पीने की इच्छा की तृप्ति भी हो गई है। मैंने कुछ किरदार भी ज़िंदा कर लिए हैं अब मुझे अपने कम्बल में ही उन किरदारों को रखना है। कम्बल और बातों की गर्मी ने मुझे खासा आराम दिया है, मुझे अब नींद आ रही है । मैंने तुम्हे 'गुड आफ्टर नून 'और तुमने मुझे  'गुड नाईट, सी यू' एक स्माइली के साथ कहा। मैं भी जवाब में दो स्माइली भेज कर खुद में ही मुस्कुराया। अब मैं अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर रहा हूँ। 

Wednesday, 12 August 2015

ये प्यार नहीं

मैं तुमसे प्यार नहीं करता,
हाँ, अच्छी लगती हो,इतना ज़रूर है । 

क्योंकि,
प्यार जब भी होता था 
वो आता था एक डर के साथ,
जन्म जन्मान्तर का बर्डन डाले । 

एक खुद को बदलने की जद्दोज़हद भी 
कि मैं भी उस साँचे में बंध  जाऊँ
जिसे दुनिया सोलमेट कहती है । 

मैं भी करूँ वही पुरानी क्लिशे हरकतें 
जो दशकों से घिसे पिटे प्यार का प्रमाण हैं । 
मैं सोचूँ कुछ और, और बोल दूँ कुछ,
क्योंकि डेटिंग की किताबों में वैसा ही कुछ लिखा है । 

और जानता हूँ तुम्हें भी मुझसे प्यार नहीं,
क्योंकि, हमारा कोई करार नहीं
और न ही कोई उम्मीद है … 
 हम डरते भी नहीं एक दुसरे से 
और ना हीं ये ख्याल कि 
तुम बिन मेरा क्या होगा । 

एक वक़्त है , एक फ़ोन है, कुछ यादें हैं, 
और कभी कभी ही सही, पर घंटों बातें हैं … 
देखो ये प्यार है ही नहीं,
हाँ,तुम्हेंअच्छा लगता होऊंगा,इतना ज़रूर है ।