Monday, 13 June 2016

डिअर भावना.

एक देश के रूप में हमने हमेशा से ही दिखने से ज़्यादा ना दिखने वाली चीजों को महत्त्व दिया है, परवाह ज़्यादा की है. जीवित से ज़्यादा पूज्य वो है जो मृत है. जो हमें दिखता नहीं वो देवतुल्य हो जाता है जैसे कोई बात समझ ना आने पर गहरी बात... हमारी बात बात पर आहात होती 'भावना' भी ऐसी ही अदृश्य शक्ति का उदाहरण है. ऐसी सारी अदृश्य शक्तिओं के बचाव के लिए किए जाने वाले यत्न पुरखों के नाम पर किया जाने वाला वो पिंडदान है जिसपर कोई भी सवाल नहीं उठाता बस कर देते हैं. इसकी बात करो तो सारे जीवित मुद्दों को एक तरफ करते हुए अचानक 'भावना' सर्वोपरि हो जाती है. आहात भावना का मानना हमारे और लोकतंत्र की मौलिक ज़रुरत बन जाता है. पर हमें पता नहीं कि भावना का इस बारे में क्या कहना है. वो सोचती क्या है?...तो यह चिठ्ठी एक कोशिश है उससे बात शुरू करने की उसे समझने की कि इसके बाद उन मुद्दों पर भी बात की जा सके जो ज़िंदा है, जो ज़रूरी हैं...जो दिखते हैं.


"देखिए दोस्त मिहिर देसाई द्वारा निर्देशित, मेरे द्वारा लिखी हुई 'डिअर भावना' स्वानंद किरकिरे साब की अद्वितीय आवाज़ में."


अपडेट: मेरे पसंदीदा फ़िल्मकार अनुराग कश्यप को डिअर भावना पसंद आई और उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इसे शेयर किया .





Saturday, 28 May 2016

जानकी पुल पर इस महीने पाँच कविताएँ छपी है. पढने के लिए लिंक पर जाएँ.
प्रभात रंजन जी का बहुत बहुत शुक्रिया.

यहाँ क्लिक करें


Thursday, 21 April 2016

जब हमने करी एक्टिंग.

सुबह सुबह व्हाट्सएप्प पर मैसेज की आवाज़ के साथ नींद खुली. देखा तो आकांक्षा (मिश्रा) का मेसेज था.
"आंकाक्षा - सुनो एक्टिंग करोगे? कल?
मैं- टाइम कितना जाएगा?
आकांक्षा - २ घंटे
मैं - कर लेंगे"

इसके बाद अपनी थोड़ी बात इस बारे में हुई की कैसे और क्या करना है . गले दिन अँधेरी में शूट हुआ और  बहुत मज़ा आया. अब ये विडियो  बन कर आ गया है. आप भी देखिए और बताइएगा कैसा लगा. :)




Sunday, 3 April 2016

कहानी-संभावनाएँ. www.thelallantop.com पर.

जिस टेबल पर वो दोनों बैठे थे वहाँ आस पास कोई भी नहीं था। कल्चरल वेन्यू होने के बावजूद आज कैफ़े वाला एरिया बिल्कुल खाली था। इसकी एक वजह थी वीक डे का होना और दूसरी यह कि जो थोड़े लोग आज आये थे वे भी अपने अपने इवेंट में बिजी हो गए थे। यहाँ कैफ़े में हरकत के नाम पर कैफेटेरिया में एक औरत कॉफ़ी बना रही थी और दूसरी तरफ लम्बी टेबल जिसपर खूब सारी पुरानी किताबों का ढेर रखा होता, एक बिल्ली करवटें बदल रही थी। इक्का दुक्का लोग पतली बाँस की बनी दीवार के पीछे थोड़ी देर खड़े होते, सिगरेट फूंकते और फिर ऐसे निकल जाते जैसे वहाँ किसी को जानते ही नहीं। पूरे कैफ़े में अलग अलग बल्बों की पीली रौशनी, कैफ़े में बिखरने वाली रात को और गाढ़ा बना रही थी। युग और अनु ऐसे ही किसी एक बल्ब के नीचे बैठे कुछ देर से बातें कर रहे थे। दोनों आज दूसरी बार मिल रहे थे। पहली बार भी यहीं मिले थे, एक इवेंट के दौरान ही, और अब मिलने का बहाना फिर से एक ऐसा ही इवेंट था। बहाना इसलिए, क्योंकि इवेंट तो हॉल में बंद दरवाज़े के अंदर कब का शुरू हो चुका था। पर दोनों इस बात को जानते हुए भी इग्नोर कर रहे थे। उनकी अपनी दुनिया और बाकी की दुनिया के घटने के बीच कुछ था तो बस एक दरवाज़ा। लकड़ी का मोटा, भारी दरवाज़ा। जिसे युग की एक आँख ने लगातार बंद कर के रखा हुआ था। उसे डर था कि उसके आँख हटाते ही वो दरवाज़ा खुल जाएगा और अन्दर की दुनिया उसकी इस दुनिया में घुसपैठ कर बैठेगी। जितनी देर भी हो सकता था वो अनु के साथ इसी दुनिया में रहना चाहता था।  

मैं कुछ और... दस पंद्रह दिनों के लिए ही यहाँ हूँ  अनु ने बातों ही बातों में अपना सर बाएं कंधे की तरफ झुकाते हुए कहा और फिर चुप हो गई। युग जो अब तक काफी खुश था, अनु की इस बात से  उसकी ख़ुशी की आँख में अचानक एक तिनका गिर पड़ा। वो यह सुनने के लिए तैयार नहीं था।  उसके दोनों होठ अभी भी अपनी जगह पकड़ कर वैसे ही बैठे हुए थे पर आखें कुछ और ही हो गई थीं। थोड़ी देर तक वो इधर उधर की बातें करता हुआ खुद को और अनु को भी यही बताता रहा कि शायद उसे फर्क नहीं पड़ता। पर जब मन के अन्दर की सारी गांठे खुल गई तो उससे रहा नहीं गया दुबारा आओगी?उसने पूछा। दरअसल वो पूछना चाहता था दुबारा आओगी ना... पर इस वक़्त कुछ सोच कर उसने सिर्फ इतना ही पूछा दुबारा आओगी?। शायद उस ‘...ना में उसे एक हक़ के छुपे होने की आहट महसूस हुई थी। वो हक़ जिसके बारे में उसे पता नहीं था कि वो उसका है भी या नहीं। क्या वो यह उसे कह सकता था या फिर नहीं... इसी कशमकश में ‘...ना’ कहीं पीछे छूट गया था।


(पूरी कहानी नीचे दिए हुए link पर पढ़ी जा सकती है)
http://www.thelallantop.com/bherant/ek-kahani-roz-neeraj-pandeys-story-sambhavnaayen/

Tuesday, 1 March 2016

इंडियरी मार्च में प्रकाशित...'डियर भावना'



डियर भावना,कैसी हो? अभी भी कहीं आहत तो नहीं हो तुम? तुम्हारे बारे में सोचा तो थोड़ी चिंता हुई, सोचा मिल कर तुमसे बातकरूँ। ढूँढने की भी कोशिश की पर तुम मिली नहीं। मैं नहीं जानता तुम कैसी दिखती हो, तुम्हारी उम्र क्या है या तुम कहाँ रहती हो। मुझे कुछ भी पता नहीं। पर पिछले कुछ सालों से जब तुम्हारे बारे में सुन रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, देख रहा हूँ मुझे लगता है तुम एक बच्ची हो। एक ऐसी बच्ची जिसकी उम्र वक़्त के साथ और कम होती चली जा रही है। और यह भी मेरी चिंता की वजह है। इसलिए इस उम्मीद के साथ लिख रहा हूँ कि अगर कहीं तुम्हें ये चिट्ठी मिले तो मैं अपनी बात तुम तक पहुँचा सकूँगा।उदाहरण के लिए तुम महेंद्र सिंह धोनी वाली घटना को ले लो। कुछ दिनों पहले मैंने सुना, तुम धोनी की वजह से आहत हुई थी। पहली बार तो मुझे लगा कि इसमें ज़रूर ही धोनी की कोई बदमाशी रही होगी। यह सोच कर मैंने थोड़ी जाँच पड़ताल भी की, पता चला धोनी इस मामले में बिल्कुल सूफ़ी है| मैंने वो लेख पढ़ा भी और वो फोटो भी देखी, जिसको लेकर इतना बवाल हुआ था। उसमें धोनी का चेहरा फोटोशॉप कर के लगाया हुआ है, और जहाँ तक मुझे लगता है धोनी फोटोशॉप तो नहीं जानता। नहीं, नहीं मैं धोनी की तरफदारी नहीं कर रहा, अरे मैं तो क्रिकेट भी नहीं देखता| और मुझे भी तुम्हारी तरह अमीर लोगों से थोड़ी परेशानी ही रहती है।...

(पूरा लेख नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है.)
http://indiaree.com/magazines/examples/magazine.php?lang=Hindi&issue=022016&Submit=+Read+

Thursday, 25 February 2016

कुश की चटाई

तुम चटाई हो
कुश की
जिसे अपने साथ लिए
दिन भर भटकता हूँ
किसी जोगी की तरह
गाता हुआ एक राग
विरह का...

हर शाम बिछाकर
लेटता हूँ जिसे
थक कर चकनाचूर होने पर
तो नाप लेता हूँ
तुम्हारा हर कोना
बंद आँखों से ही

सुबह...
तुम्हारे कुछ निशान
जब छपे मिलते हैं
मेरे शरीर पर
काफी देर तक उन्हें
छूता, सहलाता हुआ
खुद में
तुम्हारे होने को
महसूस करता हूँ।

- नीरज पाण्डेय 

Wednesday, 24 February 2016

इस शोर की 'आवाज़' कहाँ है?

बातें इतनी सारी हैं कि कहाँ से शुरू की जाए समझ नहीं आ रहा। बहुत सारी बातों के बहुत से अनजाने पहलू, जिनको समझना मेरे लिए अभी बाकी है। चारो तरफ शोर इतना मचा हुआ है कि इसके बीच इस छोटी सी बात के खो जाने का डर भी है। यह क्या सही और क्या गलत वाली बात नहीं है और ना ही किसी पर उंगली उठाने की कोई कोशिश। यह लिखना अब एक मजबूरी है। 

हर रोज़ सुबह उठते ही ट्विटर पर ख़बरों का संक्षेपण ऐसे मिलता है जैसे रोज़ सुबह हमें एक विवाद (बहस नहीं) का टॉपिक दे दिया गया हो। जिसपर या तो हमें उसके पक्ष में बोलना है या इसके 
विरोध में। यह संक्षेपण ट्विटर से फेसबुक तक आते आते उन्हीं विषयों पर लम्बा चौड़ा लेख बन जाता है। लेख के हर तरफ भर भर के कमेंट्स दिखते हैं। जिसके जरिए हम दूसरे की बात को गलत साबित करने की कोशिश करते नज़र आते हैं... बिना सुने-बिना समझे। हम सब एक दुसरे से विवाद कर रहे होते हैं पर बात कोई नहीं करता। बिल्कुल वैसे ही जैसे स्कूल के दिनों में ग्रुप डिस्कशन में होता था। उसमें भी कोई किसी की सुनता कहाँ था। हमारे बोलने के बीच इतना भी अंतराल नहीं होता था, जिसमें रुक कर हम यही सुन लें कि हम कह क्या रहे हैं। और इसी वजह से क्लास टीचर को वो ग्रुप डिस्कशन के नाम पर हो रहा मच्छी बाज़ार बर्खास्त करना पड़ता था। पर अब कोई क्लास टीचर नहीं है। शायद इसीलिए एक विवाद तब तक चलता है जब तक हम किसी नए विवाद की पूँछ नहीं पकड़ लेते। ऐसा नहीं है कि मैं कभी ऐसे किसी ऑनलाइन विवाद या बहस का हिस्सा नहीं बना हूँ, ये मैंने भी किया है और शायद इसी वजह से अब 'बहस करने' और 'बात करने' के बीच के फर्क को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। 

पिछले कुछ दिनों से ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो चिंताजनक है। मेरे कम न्यूज़ देखते हुए भी यह 'बहुत कुछ' कहीं ना कहीं से दिख ही जाता है। पहले भी हमारे देश में समाज में ऐसा काफी कुछ होता आया है जो व्यवस्था और खासकर हमारे एक समाज के रूप में सवाल उठाने के लिए काफी है। और अब तक हमने खूब सारे सवाल उठाए भी हैं। पर क्या हमारे सवाल किसी जवाब की तरफ बढ़ भी रहे हैं? हमारे सवाल का जवाब भी एक नया और पुराने से ज़्यादा नुकीला एक सवाल ही है। देश कबड्डी का मैदान हो गया है जहाँ दो विचारधाराओं के बीच एक लकीर खींच दी गई है और फेसबुक उसका स्कोरबोर्ड बना पड़ा है। किसी भी विचारधारा का जीतना या हारना लाइक्स और कमेंट्स से निर्धारित होने लगा है।  इसीबीच अगर कोई चुप रह जाए या किसी बात का जवाब ना दे तो उसे हारा हुआ मान लिया जाता है। हम एक विचारधारा को लेकर दूसरी विचारधारा रखनेवालों को पछाड़ने लिए पहले से रटी रटाई लाइन रटते हुए टूट पड़ते हैं। जो हमारे कुछ नया सोचने या समझने की गुंजाइश को खत्म कर रहा है। ... और यहीं पर बात बहस और बहस से विवाद बन जाती है। मुद्दा चाहे जो भी हो सवाल आने से पहले हमारे जवाब तैयार रहते हैं।


दो दिन पहले मेरी एक दोस्त से बातचीत के दौरान मुझे हरियाणा वाली घटना के बारे में पता चला था और आज इसी वजह से एक दूसरे दोस्त की मुंबई से दिल्ली जाने वाली ट्रेन रद्द हुई तो इस मुद्दे के बारे में थोड़ा और जानने की उत्सुकता हुई|  मैं ऑनलाइन ये सब पढ़ ही रहा था कि इसी बीच एक दोस्त ने इनबॉक्स में JNU से रिलेटेड एक लिंक भेजा। इसी वीडियो भेजने के साथ साथ उसने यह भी बताया कि वह इस वीडियो में बात करने वाला फलाना व्यक्ति उसे दूसरे फलाना व्यक्ति से ज़्यादा समझदार लगता है। अगर इस बात की तह में जाया जाए तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि अब हम (हम मतलब हम सब ,मेरा दोस्त तो बस एक उदाहरण है।) बस ऐसे व्यक्ति या चेहरे तलाशने लग गए हैं जो हमारे पूर्वाग्रहों को और मजबूत कर सकें। क्योंकि बातें हमें वही करनी हैं जो हम पहले से सोच कर बैठे हैं। हमारी तथाकथित समझदारी और बेवकूफ़ी दोनों एक ही जुलूस का हिस्सा हो गए हैं, एक ही जैसे कपड़ों में... हम समझदार बनते बनते इतनी बेवकूफ हो गए हैं कि किसी एक चेहरे को देश से बड़ा समझ कर पार्टीबाज़ी करने से बाज़ नहीं आ रहे। तिरंगे की बात करते करते हम अलग अलग रंगों की बात करने लगे हैं। 
...या तो गलती सत्ताधारी दल की है या विपक्ष की... हर चीज़ को या तो सफ़ेद पेंट किया जा रहा है या काला, या तो तुम देशद्रोही हो या देशभक्त...

पिछले महीने मेरे साथ भी हुई पीवीआर वाली घटना में मेरा सबसे बड़ा रोना यही था कि आखिर दोनों दल के लोग जो भले ही मेरी तरफ से बोल रहे थे या मेरे विरोध में... आपस में बात क्यों नहीं कर रहे। क्यों उस शाम वो सिनेमाघर भी एक छोटा सा फेसबुक बन गया था, जहाँ पांच - सात लोगों का अलग अलग समूह एक दूसरे को गलत साबित करने में कुछ भी बोले जा रहा था। सच बताऊँ तो जितनी ख़ुशी मुझे इस बात की थी कि चलो कुछ लोग हैं जो मेरी तरफ से   बोलने के लिए आगे आये हैं उतना ही दुःख इस बात का भी था कि सब बस बोलना ही चाहते हैं। सुनना और समझना कोई नहीं। हमें बोलने की इतनी जल्दी है कि क्या हम जो खुद कह रहे हैं वही समझ पा रहे हैं।  

लगता है हमारे पास वक़्त की कमी हो गई है कि थोड़ी देर रुक कर साँस ले ले, थोड़ा सोच लें कि आखिर हम किस बात के लिए इतना उत्पात मचायें पड़े हैं। ...और आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। हम सबका देश के प्रति इतना प्यार उमड़ रहा है कि देश को बर्दाश्त करना मुश्किल होता जा रहा है। बुद्धिजीवी और देशभक्त होने के नाम पर हम लोग ऐसी ऐसी हरकतें करने पर उतारू हैं जो हमें उस व्यक्ति के बराबर में लाकर खड़ा कर रही हैं जिसे हम बेवकूफ कहते रहे हैं। 

एक बात और... किसी के कुछ भी अलग बोलने पर हम उसे एक विशेष प्रकार का तमगा दे देते हैं और फिर खुश होते हैं कि इस तमगे का काट तो है हमारे पास, हम फिर से जीत गए। क्या हमारी सारी वैचारिक लड़ाई बस सामने वाले को गलत साबित करने की है? या इसका कुछ बड़ा मतलब भी है? हम खुद को सही दूसरे को गलत साबित करने में इतने आगे चले आए हैं कि हमने ये भी टटोलना बंद कर दिया है कि आखिर ये बात शुरू क्यों हुई थी। कहीं हम एक विशेष चीज़   समुदाय या वर्ग से नफरत करते करते वैसे ही तो नहीं बनते जा रहे? और ये सवाल हम दोनों पालों में बटें लोगों को खुद से पूछना होगा कि क्या हम बीच में खींची लकीर को नज़रअंदाज़ कर एक दूसरे के पक्ष को थोड़ा समझने और सुनने को तैयार हैं? 

आपकी राय का कमेंट सेक्शन में स्वागत है 

Wednesday, 13 January 2016

भरोसा

हम दोनों पैरों से एक साथ
कभी नहीं बढ़ते।

एक पाँव के उठते ही
वहाँ की ज़मीन छूट जाती है
और दूसरा पाँव ये देखता है,
हिचकिचाता है
पर पहले का सहारा लेकर
वो भी छोड़ता है अपनी ज़मीन,

एक भरोसे के साथ ...

इस तरह एक भरोसा
बदल जाता है- एक कदम में...

फिर वो 'एक कदम' बदलता है
सैकड़ों मीलों की दूरी में,
उन सारी संभावनाओं को पूरा करता
जो पहले कदम की
हिचकिचाहट में छुपी थीं।

भरोसा दौड़ना सीख जाता है।

आदमी के इतिहास की
सबसे बड़ी उपलब्धि थी-
वो 'पहला कदम' उठाना|

Friday, 8 January 2016

वे वहीँ ठीक हैं...

(३ जनवरी की रात, जो लिखते-लिखते ४ की हो गई थी. मुंबई)

बिस्तर के सामने लगे ड्रेसिंग टेबल के पास दो बार जाकर उसपर रखी किताबों को कहीं और रखने की नाकाम कोशिश कर चुका हूँ| दो डायरियाँ, कर्णकविता, प्रेमचंद, परसाई साब, रोबर्ट एम. पिरसिग, कालिदास, ओशो एक के ऊपर एक रखे हुए हैं और इन सबके ऊपर ग़ालिब अपने दीवान के साथ वहीँ बैठे मुझे टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं| पर मुझे पता है मैं आज रात इनमें से किसी को हाथ नहीं लगाने वाला| अभी ये लिख रहा हूँ और पढ़ने का आज का कोटा विनोद कुमार शुक्ल जी ने पूरा कर ही दिया है| इसके बाद बस सोना ही बचता है (अगर नींद आ जाए तो )|

दरअसल किताबों को ऐसे बेवजह साथ में रखने की आदत बचपन से है| स्कूल जाते हुए भी बैग भर के किताबें ले जाने की आदत थी| चाहे उस किताब का उस दिन स्कूल के रूटीन से कोई लेना देना हो ना हो मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था| "भई किताबें हैं तो ले जाएँगे"| पर मैंने ये वाली बात कभी बैग को बताई नहीं और ना ही कभी ये सोचा कि एक बार उससे पूछ लूँ कि “भाई तुझे कैसा लगता है एक साथ इतनी सारी किताबें उठा के?” पर गलती मेरी भी कहाँ थी, उस वक़्त कम ज़्यादा जैसा कोई कॉन्सेप्ट दिमाग में था ही नहीं। तब तो जो मन में आया- किया, जितना मन में आया- उतना किया। ना उससे कम और ना उससे ज़्यादा। पर एक दिन जब बैग ने अपनी साइड की सिलाई खोलकर मानहानि का दावा पेश किया तब मुझे उसकी फीलिंग्स का थोड़ा आईडिया हुआ, वो भी मम्मी के बताने पर| उसी दिन शाम को बैग की सिलाई के साथ मुझे भी बिठकर ठीक किया गया और ये तय हुआ कि अब से मैं बस उतनी ही किताबें ले जाया करूँ जितने की मुझे दरअसल ज़रुरत है|


अगले दिन सुबह उठकर दीवार पर चिपके हुए रुटीन के हिसाब से बैग में किताबें सजा लीं। उस वक़्त ये करते हुए मज़ा भी आया। पर घर से स्कूल जाते हुए ऐसा लगा नहीं कि स्कूल जा रहा हूँ| पीठ पर बैग तो डाला हुआ था पर कम किताबें होने की वजह से वो अन्दर से ही हिल रहा था| अपना बैग ही अपना नहीं लग रहा था उस दिन। उस दिन मुझे ठीक ठीक क्या महसूस हुआ था ढंग से याद नहीं, इसलिए उस बारे में लिखना भी बेमानी होगी| पर मुझे इतना ज़रूर याद है कि उस दिन कुछ ऐसा ज़रूर लगा था, जिसकी वजह से घर पहुंचते ही दुबारा वो सारी किताबें, जो मम्मी और मेरे क्लास के रूटीन के हिसाब से एक्स्ट्रा थीं, मैंने अपने बैग में फिर से रख ली थीं| अगले दिन बैग फिर से वही पुराना वाला...  :) वही वजन, वही चौड़ और अपनी सारी पसंदीदा किताबें अपने साथ। बैग अंदर से बिल्कुल भी नहीं हिल रहा था। क्या हो जाता? मम्मी की एक दो बातें सुनने के लिए मैं तैयार था, और अब तो ये भी पता चल चुका था कि बैग की मरम्मत अपने घर पर ही हो जाती है| 


वो फीलिंग मुझे आज इन किताबों को हटा कर कहीं और रखने की नाकाम कोशिश के दौरान समझ आई| इन किताबों का होना उन रिश्तों का होना है, जिनका बस अपनी जगह पर होना ही खुद में एक रिश्ता है, एक तसल्ली है, एक पूर्णता है| फिल्म लंचबॉक्स की आंटी और उसकी नायिका के रिश्ते की तरह... वो आंटी कभी भी फिल्म में दिखती नहीं, पर फिल्म की नायिका के लिए उनकी आवाज़ का होना ही उनका वहाँ मौजूद होना है| उनकी शक्ल भी नहीं, बस आवाज़... ताकि वो जब चाहे उनसे बात कर सकती है| थोड़ा कह सकती हैं, कुछ सुन सकती हैं। और मैं भी जब इन किताबों के कुछ पन्ने यूँ ही उठा कर पढ़ लिया करता हूँ तो लगता है, किसी से कोई बात हो गई...  इन डायरियों पर कुछ दो चार लाइनें लिख लेता हूँ, तो लगता है किसी से कुछ कह दिया| 

फिलहाल इनको उठा कर कहीं और रखने की हिम्मत नहीं है, उन्हें वहीँ रहने देता हूँ| उनका वहाँ होना एक मकसद सिद्ध करता है| और...  क्या ही फर्क पड़ता है, मेरा कमरा वैसे भी मेरे लिए काफी बड़ा है|

(आपकी राय का कमेंट सेक्शन में स्वागत है।)
-नीरज 

Tuesday, 5 January 2016

कोर्ट/आईना क्यूँ न दूँ

कहते हैं "किसी को अगर जानना हो तो उसकी दिनचर्या के बारे में पता लगाओ, देखो वो अपने जीवन की छोटी छोटी चीज़ों को कैसे करता है। और आपको पता चलता है कि उसका चरित्र कैसा है। कोर्टदेखते वक़्त भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ। पारम्परिक सिनेमा के स्ट्रक्चर से अलग हट कर हर किरदार के साथ उसके पर्सनल स्पेस में जाती यह फिल्म उनके बारें में बहुत कुछ दिखाती है।

कोर्ट न तो सिर्फ कोर्ट के बारे में है, और न ही इसके मुख्य किरदार नारायन कांबले के बारे में। यह फिल्म हमारे बारे में है, हमारे बीच के किरदारों के बारे में। चाहे वो पब्लिक प्रॉसिक्यूटर जो कोर्ट से घर जाते हुए रास्ते में कॉटन साड़ी और ओलिव आयल की बात करती है, घर पर जाकर डेली सोप देख रहे पति के लिए खाना बनाती है। या फिर डिफेंस लॉयर जो कोर्ट के बाद एक सुपर मार्किट में शॉपिंग करते हुए रोज़मर्रा की ज़रूरतों के सामान से लेकर शराब तक की खरीददारी करता है और पार्लर में फेशियल करवाता है। या फिर वो कोर्ट का जज जो एक महिला के केस की सुनवानी इसलिए नहीं करता क्योँकि उसने स्लीवलेस टॉप पहना हुआ है। 

कई बार फिल्म देखते हुए ये भी लगता है कि इस सीन की क्या ज़रुरत थी, ये तो नारायन कांबले का केस से नहीं जुड़ा, पर कुछ आपको पता चलने लगता है कि नारायन कांबले का केस तो एक जरिया है जिसकी ऊँगली पकड़ कर कोर्ट के वो कोने तलाशे जा रहे हैं, जिसके अंदर शायद हम अपना दिमाग रख कर भूल गए है। और उसके कारण हम कांबले के गाने में छिपे मेटाफोर को न समझ कर एक सीवर सफाईकर्मी की मौत की ज़िम्मेदारी हम उसके ऊपर मढ़ने लग जाते हैं| जबकि मौत की वजहें कुछ और ही हैं। उस सफाई कर्मचारी की बीवी से पूछे जाने वाले सवाल के दौरान कैमरा सिर्फ उसी का चेहरा दिखाता है और अपने पति के मौत के बारे में वो हर सवाल का ऐसे जवाब देती है जैसे कोई आम सी बात है। वो जानती है कि हर सीवर साफ़ करने वाले की मौत शायद ऐसी ही होती है। ये सीन हमारे समाज की विसंगतियों पर एक तमाचा है। ठीक उसके बाद जब डिफेन्स लॉयर जाते हुए वो अपने काम की बात करने लगती है। उसके पति की मौत उसके लिए स्वीकार्य हैं। 


दूसरी तरफ एक किताब लिख देने पर या सरकार की नीतियों के खिलाफ गाना गा देने पर नारायन कांबले को गिरफ्तार कर लिया जाना हमारी सरकार की तानाशाही का सूचक तो है ही, साथ ही साथ यह एक तरीका भी है जिससे ये बताया जा सकता है कि हम तुम्हारे आका है और ये सारे नियम हमारे हैं, इसमें रहना है तो हमारे हिसाब से रहना पड़ेगा। 

फिल्म के कुछ जिरह के सीन ये सवाल भी लेकर आते हैं कि आखिर हम कब तक अंग्रेज़ों के जमाने के बने हुए कानून के हिसाब से लोगों को सजा देते रहेंगे। दूसरी तरफ किस तरह हम लोगों ने लिखी हुई चीज़ को पत्थर की लकीर मान लिया है। हमारी सोच उस पैराग्राफ के पहले शब्द से शुरू होती है और आखिरी शब्द तक जाते जाते समाप्त हो जाती है। और आखिर हो भी क्यों ना क्योंकि हमारे पास और कुछ सोचने का टाइम ही नहीं है क्योंकि हमारा इवनिंग टाइम एंटरटेर्मेंट भी मराठी मानुस के अहम को बढ़ावा देना में जाता है या फिर किसी पब में बैठ कर गप्पियाने में। 

आखिरकार जब कोर्ट एक महीने के लिए बंद होता है, तब तक नारायन कांबले के केस का फैसला नहीं हुआ होता और अब उसको एक महीना जेल में ही रहना होगा। उसके बाद भी उसका क्या होगा पता नहीं शायद इसीलिए उस सीन में सारी लाइट्स धीरे धीरे बंद होती है और दर्शक को अन्धकार में छोड़ती हैं। 

दूसरी तरफ वेकेशन के लिए वही जज अपने दोस्तों के साथ शहर के पास के रिज़ॉर्ट में जाता है और वहाँ अपने दोस्त को उसके बेटे के बोलने के लिए सलाह देता दिखता है कि "इसे अंगूठी पहनाओ तब जाकर ये बोलने लगेगा", वो आईआईएम और आईआईटी में मिलने वाले पैकेज की बात करता है। इस तरह फिल्म हमें उस जज के पर्सनल स्पेस में भी ले जाती है और दिखाती है कि जिन्हें हम सबसे समझदार और दिमाग वाला मानते हैं और शायद इसी वजह से हमारे समाज के बड़े फैसलों पर निर्णय लेने का अधिकार उन्हें देते हैं उनकी खुद की बुद्धि कैसी है। 

फिल्म देख कर थोड़ा गुस्सा आना तो लाजमी हैं| पर ये सोच कर मैं भी करुणा से भर जाता हूँ कि जैसे हम हैं न ... बस आप समझ जाइये| 

(www.indiaree.com के दिसंबर,२०१५. अंक में प्रकाशित)

अपडेट:  

Monday, 4 January 2016

आस्था भी कोई चीज़ है |

वो शिरडी से दर्शन कर के आये थे । एक हाथ से साई बाबा का गुणगान किये जा रहे थे और दुसरे से अपनी आस्था बघार रहे थे । बता रहे थे कैसे वहाँ धर्म कर्म के काम में उन्होंने बढ़ चढ़ कर दिलचस्पी ली। कैसे उनका जीवन साल में बस एक बार शिरडी के दर्शन करने मात्र से सुचारू रूप से चलता रहता है। मैं भी हाथ जोड़े और मुँह फाडे सब सुन रहा था । भई आस्था तो मुझे भी है। तभी उन्होंने अपनी नाक छिनकी और अपनी शर्ट में पोंछते हुए बोले " ट्रेन के सफर में ठंड लग गई।" फिर थोड़ी देर बाद रुक कर ऊपर उँगली दिखाते हुए बोले "चलो अब सर्दी भी तो उसी की माया है। बाबा सब हर लेंगे। बस हमारी आस्था और उनकी कृपा बनी रहे। जय साई राम । " 'कृपा' शब्द सुनते ही मुझे याद आया कि बातों बातों में मेरा अपना आध्यात्मिक कार्यक्रम छूट रहा था। मैंने टीवी ऑन किया और 'निर्मल बाबा ' वाला प्रोग्राम लगा कर बैठा और हाथ जोड़कर सुनने लगा। कृपा आनी शुरू हो गई थी। और मेरे पीछे खड़े वो ये सब देख कर अपनी नाक छिनकते हुए बड़बड़ाते रहे " अरे चूतिया हो क्या?… ऐसे भी कहीं कृपा आती है… , बेवकूफ बना रहा है वो.… , अरे तुम तो पढ़े लिखे हो… वगैरह वगैरह… " पर मैं भी उनको इग्नोर कर के अपनी आस्था में लगा रहा । क्योंकि जब मेरी नाक बहती थी तब 'निर्मल बाबा ' की कृपा से ही ठीक होती थी । मैं कृपा बटोरता रहा, वो बड़बड़ाते रहे …

Saturday, 2 January 2016

क्यों? ठीक ठीक पता नहीं

(कांदिवली से एयरपोर्ट, के दौरान  1/1/16. 10:20 P.M. मुंबई .)
अभी अभी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचा हूँ, सौरव से मिलने। आदतन मैं जल्दी पहुँच गया और सौरव के आने में अभी थोड़ा वक़्त है। मैं अभी एक कमाल की ख़ुशी से भरा हुआ हूँ। वजह मुझे पता नहीं। सोचा किसी को फ़ोन कर के अपने अंदर अभी जो भी चल रहा है वो बाँट लूँ। फिर यह सोच कर रहने दिया कि इसको लिख लेना ज़्यादा बेहतर होगा। अक्सर मेरे दोस्तों की शिकायत जो मेरे तनाव को लिखने के लिए रहती है, शायद इससे थोड़ी कम हो सके।
मुम्बई में हल्की ठण्ड का मौसम है। ठण्ड इतनी ही की मैं हाफ टीशर्ट पहन कर बैठा हुआ हूँ।  हाँ सर्दी की इज़्ज़त रखने के लिए सर पर एक कैप ज़रूर डाल ली है। थोड़ी देर पहले ही एक कविता लिखी थी और अब सौरव से मिलने निकल पड़ा। कांदिवली के हाईवे से मैंने बस ली, मैं पहली बार एयरपोर्ट  बस से जा रहा था तो आशंका थी कि अगर ट्रैफिक मिला तो मैं कहीं लेट ना हो जाऊँ। इसलिए घर से पहले निकल लिया था। सड़कें और बस दोनों आज उम्मीद से बहुत ख़ाली दिख रहे थे। मैंने कंडक्टर से टिकट ली और पीछे से 2 सीट्स छोड़ कर खिड़की पकड़ पर बैठ गया। बस चली जा रही थी एक के बाद एक फ्लाईओवर फांदती हुई। खिड़की से हल्की ठंढी हवा बस के अंदर आ रही थी, मुझे अच्छा लगने लगा। और एकाएक मैं वो तमाशा का गाना "वत वत वत..." का अंतरा गाने लगा।
"ओ.. हम हमहीं से, तोहरी बतिया
कर के बकत बतावें हैं,
खुद ही हँसते, खुद ही रोते,
खुद ही खुद को सतावें हैं..."
मैं ज़ोर ज़ोर से गा रहा था,जैसे बस की रफ़्तार से कोई मुक़ाबला हो। इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे सामने की सीट पर बैठी हुई लड़की ने पलट कर मुझे देखा। मुझे एक पल के लिए लगा कि उसको अजीब लगा पर वो एक स्माइल दे कर दुबारा सामने की ओर देखने लगी।
तभी बस का एक झटका आया और मैं सीट पर अपना बैलेंस खोने लगा।गाने का 'बेसुर' बार बार
बिगड़ रहा था|  पर मुझे अभी गाना गाने में मज़ा आ रहा था। एक ख़ुशी मिल रही थी| पता नहीं क्यों मुझे जब भी ऐसा कुछ अच्छा लगता है, मुझे दिल्ली की याद आने लगती है। मुम्बई का हाईवे दिल्ली का रिंग रोड बन गया और बेस्ट की बस 'DTC' की। फिर मुझे एहसास हुआ कि अगर टायर के ऊपर वाली सीट से हटकर पीछे बैठ जाए तो शायद सीट इतनी ना हिले, और इस लड़की से थोड़ा फासला भी बढ़ जाएगा। फिर क्या था, मैंने पीछे देखा, सीट पूरी तरह से खाली थी। मैं कूदकर उसपर बैठ गया। पर मैंने इस बार सामने वाली सीट का रॉड पकड़ा, खिड़की की तरफ झुककर बैठा जैसे बच्चे किसी amusement पार्क में किसी राइड पर बैठते है। बस हाईवे पर वैसे ही दौड़ती चली जा रही थी, हवा वैसे ही हल्की ठंडक बस के अंदर ला रही थी। सीट का हिलना अभी भी वैसा ही था,  मैंने गाना चालू रखा, और वहीँ बैठे बैठे एक ख़ुशी से भरता गया। जिसकी वजह का मुझे अभी भी ठीक ठीक पता नहीं| एयरपोर्ट का स्टैंड अभी आया नहीं था, पर अब तक गाने का दूसरा अंतरा आ गया था... :)
"जान गए लेके सुर्खी कजरा
टेप टाप के, लटके झटके
मार तू हमका फँसावत...
पर ई तो बता
तू कौन दिसा, तू कौन मुल्किया
हाँक ले जावे...
हौले हौले बात पे तू
हमारी वाट लगा..."
...बस कहीं और ले जा रही थी और मैं कहीं और ही चला जा रहा था।
- नीरज


नाटक शुरू होने से ठीक पहले...

अँधेरे में, साफ ना दिखना
कई सारी कल्पनाओं को
जन्म देता है।

सामने खेले जाने वाले
नाटक की परिकल्पना मात्र
एक कुलबुलाहट पैदा करती है।

ये कुलबुलाहट, हमेशा
एक उम्मीद के साथ आती है,
और, मेरे सामने
तैयार करती है - एक दृश्य
सुनहरी रौशनी का...

एक नाटक ठीक मेरे सामने
जीवित हो उठता है।

... वाह!

इसके किरदारों को देखने की,
जानने की, मिलने की इच्छा
इस कुलबुलाहट को
गुदगुदी में बदल देती है...
और, मैं उनसे मिलने
मंच पर पहुँच जाता हूँ

पर यहाँ इनकी आवाज़े
बदली हुई हैं,
उनके चेहरे कुछ और हैं...
मैं उन्हें उनकी पहचान बताता हूँ
- वो मुकर जाते हैं।
मैं कहता हूँ - "मैं तुम्हें जानता हूँ",
- वो हँस पड़ते हैं।
उनकी हँसी मुझे अट्टाहास लगती है।

वो अपना संवाद भूलकर
कुछ और बड़बड़ाते हुए,
कहीं और चले जाते हैं।
दृश्य गायब हो जाता है,
गुदगुदी, सिहरन में
तब्दील हो जाती है...

मेरे दर्शक से पात्र बनते ही
कहानी बदल जाती है|
... परदे के उठते ही
मेरी कल्पनाओं वाला नाटक
ख़त्म हो जाता है।

Wednesday, 23 December 2015

फाइंडिंग फैनी/कल्पना और यथार्थ के बीच की चिट्ठी

साल खत्म हो रहा है, और इस साल कुछ कमाल की फिल्में आई हैं। मसान, तलवार, दम लगा के हईशा, NH 10, तमाशा वगैरह मेरी इस साल की लिस्ट में कुछ अच्छी फिल्में हैं। दूसरी तरफ कुछ और फ़िल्में हैं जो मैंने पिछले साल यानि कि 2014 में देखी थीं पर उनका हैंगओवर मैं अभी तक महसूस करता हूँ | उनमें से आनंद गांधी की ‘शिप ऑफ़ थीसियस और रजत कपूर की ‘आँखों देखी‘ हैं। ये दोनों फिल्में मेरे साथ साथ बढ़ रही हैं। हर रोज़ मैं इन फिल्मों को अपने आस पास घटित होता हुआ देखता हूँ। पर साल 2014 में एक और फिल्म रिलीज़ हुई थी जो उस वक़्त मुझे बहुत पसंद आई थी पर मैंने उसे दुबारा कभी नहीं देखा। यह फिल्म कहीं न कहीं उस इम्पोर्टेन्ट नोट की तरह थी जो साल के कलैंडर में कहीं खोकर रही गई। वो फिल्म है 'फाइंडिंग फैनी'| आज जब मेरा दोस्त ये फिल्म देख रहा था तो मुझे लगा जब ये अचानक से सामने आ ही गया है तो इस इम्पोर्टेन्ट नोट को दुबारा से पढ़ना चाहिए।

2014 में फिल्म की रिलीज़ के बारे में अगर विकिपीडिया की मानें तो 'फाइंडिंग फैनी' एक कॉमेडी फिल्म हैं। पर मेरे विचार में यह फिल्म कॉमेडी की सतह से काफ़ी अंदर की तरफ गोता लगाती है, और हमारी स्मृति की कल्पनाओं और वर्तमान के यथार्थ के बीच की कोई जगह तलाशती है, जिसे हम सब अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से तैयार करते हैं।

फ्रेडी (नसीरुद्दीन शाह) जो कि लगभग 60 साल का एक बुज़ुर्ग है| उसे एक रात एक खत मिलता है जो उसने उस लड़की स्टेफनी फर्नांडिस (फैनी) के लिए लिखा था, वो आज भी जिससे  प्यार करता है| इस बात को 46 साल बीत चुके हैं, पर ये खत फैनी तक कभी पहुँचा ही नहीं और फैनी को तो पता ही नहीं है कि फ्रेडी उसके बारे में क्या सोचता है।
एंगी (दीपिका पादुकोण) जो कि एक यंग विडो है को ये बात पता चलती है और वो फैनी को ढूंढने में फ्रेडी की मदद करना चाहती है। इसमें उसका साथ देने के लिए ‘रोज़लिन’ (डिम्पल कपाड़िया), ‘पेंटर डॉन पेद्रो’ (पंकज कपूर) और एंगी का बचपन का दोस्त ‘सवियो’(अर्जुन कपूर) एक साथ आते हैं। इन सबकी ज़िंदगी के अधूरेपन की अपनी अलग कहानी है, जिससे ये जूझ रहे हैं| फैनी को ढूंढने के दौरान एक दूसरे से तालमेल बिठाते उस टुकड़े को ढूंढने की कोशिश करते हैं जिसे पाकर वो थोड़ा संतुष्ट महसूस कर सकें। हम सबकी तरह...

यह फिल्म दरअसल ‘फैनी’ की खोज कम और के उस टुकड़े की ख़ोज ज़्यादा है जिसकी तलाश जाने अनजाने हम सबको है| और यह उम्मीद भी कि शायद उसके मिल जाने पर हमें 'पूरा' होने का एहसास हो। फैनी को ढूँढ़ते हुए इन पाँचों का रास्ता भटक जाना और उस भटकने में एंगी और सवियो के उस प्यार का मिलना जो शायद वक़्त के साथ बंट कर अलग अलग दिशाओं में चला गया था | …थोड़ा भटककर खुद को पाने वाला एहसास तो है ही, जिसकी कल्पना हम हमेशा करते रहे हैं। पर एक दुसरे को पाने के बाद भी वहाँ एक अनिश्चितता का बना रहना और फिर भी उस अनिश्चितता में भी प्यार का पनपना, यथार्थ के धरातल की कहानी कह जाता है। इन सारे भटकने, खोने और मिल जाने के बीच मैं ये देखना चाह रहा था की फ्रेडी जब फैनी को मिलेगा तो उससे क्या कहेगा? ...कैसा महसूस करेगा वो, जब वो अपनी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत एहसास से मिलेगा, जो ज़िन्दगी जीने के तरीकों के बीच खोकर बस उसकी कल्पनाओं में इस उम्र तक ज़िंदा है।  ...और फ्रेडी की फीलिंग्स जानकर फैनी कैसा महसूस करेगी? कैसे रियेक्ट करेगी वो? 

फ्रेडी की नज़रों में फैनी आज भी वैसी ही है, जैसा उसने उसे आख़िरी बार देखा था। बिल्कुल हमारी कल्पनाओं की तरह जैसे हम अपने किसी खूबसूरत पल का स्क्रीनशॉट लेकर रख लेते हैं, और हमें उम्मीद होती है की वो चीज़ आज भी वैसी ही होगी| शायद हम उसकी खूबसरती के तिलिस्म से कभी निकलना नहीं चाहते| पर यथार्थ के सामने आने पर उसकी शक्ल इतनी बदल चुकी होती है कि हमें कुछ वक़्त लगता है हमारी कल्पनाओं और यथार्थ के बीच  सामंजस्य ढूंढने में। ठीक इसी तरह जब आखिरकार फ्रेडी फैनी को मिलता है तो अपनी पुरानी कल्पना की वजह से फैनी की बेटी को फैनी समझ बैठता है, जो हू-बहू जवानी के दिनों की फैनी जैसी दिखती है| पर तुरन्त ही उसे पता चलता है कि फैनी तो मर चुकी है। वो ताबूत में लेटी हुई फैनी की  तरफ देखता है, पर ये क्या... फ्रेडी खुद भी उसे पहचान नहीं पाता। पर वो खुद की तसल्ली के लिए उसकी बेटी से पूछता है कि “क्या फैनी ने कभी उसका नाम  लिया था? क्या फैनी ने कभी उसके बारे में कोई बात की थी?” क्योंकि फ्रेडी को यह भी लगता है कि फैनी उसका  इंतज़ार अब तक कर रही थी। और वो इसी उम्मीद से उसे ढूँढ रहा था कि जिस फैनी को वो पिछले 46 साल से भूला नहीं है, उसे भी उसकी याद तोहोगी ही। पर दुबारा यथार्थ फैनी की कल्पनाओं पर भारी पड़ता है "फैनी ने उसे कभी याद नहीं किया। फैनी की बेटी ने तो कभी फ्रेडी का नाम भी नहीं सुना।" यह पूरा सीन देखकर मैं फ्रेडी के लिए एक दुःख से भरा बस मुस्कुराता रहा (इस एहसास के लिए शायद एक नए शब्द की ज़रुरत है|) । क्योंकि मैं सच में चाहता था कि फ्रेडी एक आखिरी बार तो फैनी से मिल ले। कम से कम वो फैनी को बता तो दे कि वो उसके बारे में क्या सोचता है। पर यहाँ तो फैनी को फ्रेडी का नाम तक याद नहीं है|

पर जैसा कि कहते हैं कि "हर अंत के बाद एक शुरुआत भी पनपती है।" ठीक वैसे ही फिल्म का हर कैरक्टर इस सफर के दौरान अपनी ख़ुशी पाने की एक नई शुरुआत फिल्म के अंत में करता है। और अपनी कल्पनाओं से निकल यथार्य को चुन लेता है| पर ये तो फ्रेडी की कहानी थी। हमारी ज़िन्दगी में यथार्थ और कल्पना दोनों में से किसे चुनने का सुख ज़्यादा है वो तो तब ही पता चलेगा जब हमारी कल्पनाएँ हमारे अपने यथार्थ से टकराएंगी।  पर अभी के लिए मैं यही कहूँगा कि "लिखी हुई चिट्ठियों को वक़्त रहते उनके पते पर पहुँचना बहुत ज़रूरी है।" क्या पता कब कौन सा लिफ़ाफ़ा खुलकर हमारी 'कल्पना' को 'यथार्थ' में  बदल दे।
(आपकी राय का कमेंट सेक्शन में स्वागत है।)
- Neeraj Pandey