Tuesday, 12 June 2018

तीन साल मुम्बई और एक छोटी सी बात

आज ही के दिन तीन साल पहले पहली बार मुंबई आया था। बारिश होकर बस रुकी ही थी। फिल्में और कहानियों में पढ़ी हुई मुम्बई को ट्रेन की खिड़की से देख रहा था। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाई-वे पर भागते हुए ऑटो में यह तलाश कर रहा था कि इस शहर में मेरी जगह कहाँ होगी? अब तक का जिया हुआ सब पीछे हो गया था और अब एक नई डायरी पर नई कहानी लिखनी थी... हाथ काँप रहे थे। पिछले तीन सालों का सफर काफी उतार चढ़ाव से भरा पर उम्मीद से ज़्यादा मजेदार रहा है। इस शहर में सबके अनुभव अलग होते हैं, पर मेरे अनुभव के हिस्से में यह बात आती है कि आजतक कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने किसी से मदद माँगी और उसने मना किया हो। इस शहर के संघर्ष में लोग कभी संघर्ष नहीं हुए। कई सारे खूबसूरत दोस्त दिए हैं इस शहर ने जो अपनी व्यस्तताओं के बावजूद मेरे लिए तैयार खड़े होते हैं, हौसला बढ़ाते हैं। और मैं इस बात से खुश रहता हूँ कि ये सब मेरे दोस्त हैं... मुंबई ने छोटी छोटी खुशियों को बटोरना सिखाया, काम करना सिखाया और शुरूआती दिनों में कुछ निराशाएँ देकर यह भी सिखाया है कि 'निराशा' हमेशा रहने वाली चीज़ नहीं है। 

इसी शहर ने 'सॉरी' और 'थैंक यू' बोलना सिखाया और बोला कि "Don't be a lazy writer, अपने दुःख से बाहर भी देख, एक बड़ी दुनिया है लिखने के लिए..." काम को लेकर अलग अलग तरह के एक्सपेरिमेंट करने का मौका बस यही शहर दे सकता था। सो किया और कर रहा हूँ... दिल्ली से बैंगलोर जाना और बैंगलोर से मुंबई आना मेरी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण यात्राएँ हैं। 

आज फिर बारह जून है, आज फिर मैं ट्रेन से वापस मुम्बई आ रहा हूँ, आज फिर बारिश के आसार हैं। मुंबई लौटना अब घर लौटने जैसा लगता है। कहानी तो अभी भी चल रही है पर अब हाथ नहीं काँपते, अब संधर्ष यह है कि जो भी लिखूँ पूरी ईमानदारी से लिख पाऊँ। पहली बार जब लोकल की टिकट ली थी तो कुछ सोचकर वो संभाल कर रख ली थी। वह सिलसिला अभी भी चल रहा है। आज तीन साल बाद इन टिकटों में मेरी इस शहर की सारी यात्राएँ मौजूद हैं और इनके अंदर इतनी कहनियाँ, जिसको सोचो तो लगता है कई जीवन जी लिये हों। उम्मीद है यह शहर उन सारी यात्राओं का मौका देगा जिसकी मुझे उम्मीद नहीं पर ज़रूरत ज़रूर है।

Tuesday, 15 May 2018

राज़ी: लगा दे दाँव पर दिल.


पसंद आयी फ़िल्मों की ख़ास बात यह होती है कि उनका एक टुकड़ा फ़िल्म के ख़त्म होने के बाद भी साथ चलता रहता हैइस बार भी ऐसा ही हुआवैसे तो जैसा कहते हैं कि ‘कलेजा मूँह में आ गया’ वैसी फ़ीलिंग तो राज़ी देखते हुए कई सीन में हुई पर एक सीन ऐसा था जो अभी तक साथ चल रहा है। वह सीन जहाँ इक़बाल और सेहमत दोनों आमने सामने एक दूसरे का सच जानने के बाद मिलते हैं। दोनों एक दूसरे से प्यार तो करते हैं पर दोनों की नज़र में ही वतन पहले आता है। यहाँ विकी का किरदार इक़बाल सेहमत से पूछता है कि “क्या अब तक जो हमारे बीच था उसमें कुछ भी सच था?” यह किसी भी इंसान के होने पर सवाल है। उसकी मान्यताओं पर सवाल है। उसके जीए हुए पर सवाल है। हम जो जी लेते हैं हमारी पहचान का हिस्सा होता जाता है। हमारी मान्यताएँ, हमारी बेवक़ूफ़ियाँ, हमारे प्रेम, हमारी नफ़रतें... सबकुछ। फ़र्ज़ करें हमें एक दिन यह पता चले कि जो भी हमने जिया वह सिर्फ़ इसलिए कि कोई ऐसा चाहता था कि हम वैसा ही जिए या महसूस करें जैसा वो चाहता है। क्या वह हमारे होने पर सवाल नहीं है।

मैं एक भारतीय हूँ और देशभक्ति की थोड़ी समझ भी है। बचपन में देशभक्ति गाने सुन कर रोयें खड़े होते आए हैं और स्कूल में बड़े ज़ोरों शोरों के साथ १५ अगस्त और २६ जनवरी की तैयरियाँ करी हैं। पर अब तक जहाँ मुझे फ़िल्म देखते हुए बार बार सेहमत की बेहतरी की चिंता थी कि इसे कुछ ना हो, वह उस सीन में आकर पलट गयी। यहाँ पर आकर मैंने ख़ुद को इक़बाल के साथ खड़ा पाया। दोनों मुल्कों की लड़ाई में खिंची हुई लकीर इक़बाल और सेहमत के बीच खिंच गयी थी। यह लक़ीर जितनी बाहर थी उतनी ही दोनों के अंदर तक उतरती गई। इक़बाल के लिए ज़्यादा बुरा इसलिए भी लगा क्योंकि शायद वो इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। कम से कम सेहमत को अपना मोहरा होने का पता था। इक़बाल ने तो बस भरोसा किया था सेहमत का अपने रिश्ते पर भरोसा कर के।
“क्या अब तक जो उनके बीच था उसमें कुछ भी सच था?” बार बार कानों में गूँजता हुआ अंदर तक उतरता रहा। ऐसे सवाल तो हमने भी कई बार अपनी ज़िंदगी की कहानियों को लेकर किए हैं ना...? एक दौर जी लेने के बाद पीछे पलट कर देखा है और यह सवाल गूंजा है कि “जो जी लिया वो कितना सच था”। कितना मुश्किल होता है यह मान लेना या इस बात का एहसास होना कि हम एक झूठ को सच मान रहे थे। शायद इसी वजह से हमारे पास अलग अलग वक़्त पर हमारे जी जिए हुए सच के अलग अलग संस्करण होते हैं, जिसे हम यह सोचकर तैयार करते हैं कि जो जिया गया वो जीने लायक था। यह हमारी ख़ुद से एक अरेंज्मेंट है। पर इक़बाल को अपनी कहानी के और संस्करण तैयार करने का मौक़ा भी नहीं मिला।


प्यार सेहमत को भी था, यह हमें एक दर्शक के नज़रिए से पता है पर इक़बाल की ज़िंदगी एक सच, झूठ और जाने क्या के बीच लटकती हुई ख़त्म हो जाती है। उसकी कहानी ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होती।

राज़ी दो मुल्कों की कहानी नहीं है। मेरे लिए यह कहानी एक दो ऐसे लोगों के क़रीबी रिश्ते की कहानी है जिसमें राजनीति दख़ल देती है। एक हिंदुस्तानी होने के नाते यह अच्छा लगता है कि पाकिस्तान की हमारे मुल्क पर हमले का मनसूबा कामयाब नहीं होता पर एक इंसान के नाते मैं चाहता था कि काश, इक़बाल और सेहमत के रिश्ते में वो वक़्त ना आया होता जहाँ इक़बाल को यह पूछना पड़ा कि ““क्या अब तक जो हमारे बीच था उसमें कुछ भी सच था?”

Tuesday, 17 April 2018

उम्मीद की ख़ुशबू और शिऊली के फूल: October

पसंद आई फिल्मों के बारे में लिखना भूल जाने का दुःख वैसा ही है जैसे किसी जरूरी बात को वक्त रहते ना कह पाने का दुःख. कई बार ऐसा कर चुका हूं और उसका दुःख हर बार कुछ अच्छा देख लेने पर और बढ़ जाता है. इसलिए आज मैं ऐसा नहीं होने दूंगा. अभी-अभी जूही चतुर्वेदी की लिखी फ़िल्म ‘अक्टूबर’ देख कर आया हूं. फ़ैमिली के साथ गया था पर फिल्म ख़त्म होने के बाद तुरंत किसी से बात करने का मन नहीं किया. ऐसा लगता है जैसे कहानी एक अंदर की यात्रा थी, जिस पर होता हुआ मैं कहीं भीतर बैठ गया हूं. लग रहा है मुंह खोलने से आवाज़ के साथ यह यात्रा ख़त्म हो जाएगी. ऐसा कुछ भी तो नहीं था, जो फिल्म के किरदारों की ज़िंदगी और मेरी ज़िंदगी में एक जैसा हो, फिर भी कहीं ना कहीं मैं उनकी कहानी महसूस कर सकता हूं. एक राइटिंग वर्कशॉप के दौरान अंजुम (रजबअली) सर ने यह बताया था कि अगर कहानी पूरी ईमानदारी से कही जाए तो देखने वाले के दिल तक पहुंचती है, फिर राइटिंग के सारे नियम बैकफुट पर चले जाते हैं. यह बात ‘अक्टूबर’ देखने के बाद और पुख़्ता होती है


शुरू होने के कुछ ही देर बाद फिल्म ने गला पकड़ कर बैठा लिया. गला पकड़ कर इसलिए क्योंकि मैं भी उन किरदारों के दुःख में वहीं कहीं उस अस्पताल में उनके साथ था. बीच-बीच में यह भी ख्याल आता कि अगर अपनी ज़िंदगी में कोई ऐसी दुर्घटना घट जाए तो मैं क्या करूंगा? पता नहीं क्यों पर हर उस बात से जिससे मुझे डर लगता है, मैं उसे कल्पना में तो एक बार जी ही लेता हूं. कुछ मामलों में मैं बहुत ही डरपोक क़िस्म का आदमी हूं. खुद को या किसी करीबी को अस्पताल के बेड पर ऐसे नहीं देख पाऊंगा. पर फ़िल्म की कहानी कुछ देर बाद ही संघर्ष की कहानी से ज़्यादा उम्मीद की कहानी में बदल जाती है. उम्मीद, जो डैन के किरदार में अंदर तक उतरी हुई है.
शिउली (नायिका) की ज़िंदगी में कोई उम्मीद नहीं देख पाने पर उसका चाचा वेंटिलेटर का प्लग बंद करने की बात करते हुए कहता है- ‘क्या उसे पूरी ज़िंदगी ऐसे ही रखना है, बच भी गई, तो किसी को पहचान नहीं पाएगी’. उस पर डैन जवाब देता है ‘वो आप लोगों को नहीं पहचानेगी तो क्या, आप तो उसे पहचानते हैं ना.’ वाह! ऐसा तो कोई वही इंसान बोल सकता है जो उम्मीद में सराबोर हो.


थिएटर से निकलते हुए यह सोचता रहा कि फिल्म की कहानी खत्म होने के बाद डैन ने अपनी कहानी में क्या किया होगा? वो घर जाकर शिउली के पेड़ को लगाएगा क्या? क्या उसे देखकर वो सब याद किया करेगा जिससे होकर वो गुज़रा है या जो उसपर बीती है? हम भी तो शहर में, अपने आस-पास, जान पहचान के लोगों में हो रही बातों में अपनी बीती हुई कहानियों के अंश ढूंढते रहते हैं.
आज सुबह ही पढ़ा था ‘तू ज़िंदा है, तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर…’ डैन वही किरदार है. उसे ज़िंदगी की जीत पर यक़ीन है. सारा वक़्त उम्मीद को दे दिया उसने. पगला है वो… लापरवाह है… पर उसे फर्क क्या पड़ता है. वैसे वो लापरवाह भी कहां है, बस उसकी प्राथमिकताएं अलग हैं. वो जिनसे चिढ़ता है, उनसे चिढ़ता है. पर जिनकी परवाह करता है, उनके लिए खुद को भी भूल जाता है.
हमें भी प्रतिकूल परिस्थितियों में जीए जाने के लिए एक उम्मीद की जरूरत तो हमेशा ही रहती है. यह अलग बात है कि हर उम्मीद पूरी नहीं होती और बिलकुल भी जरूरी नहीं कि हमारी हर उम्मीद पूरी हो. कुछ उम्मीदें बस इसलिए भी होनी चाहिए ताकि हमें यह पता लग सके कि हम ज़िंदगी को किस नज़रिए से देखते हैं. उम्मीद, शिउली के फूलों की खुशबू की तरह है जिसे सूंघते हुए ज़िंदगी को थोड़ा और जी लेने का मन करता है. एक कोमा में पड़े किरदार की नाक में एक हरकत हो सकती है. और वही खुशबू उसके आसपास के किरदारों के अंदर ज़िंदा हो उठती है. किसी उम्मीद की तरह. अगली बार कहीं भी शिउली के फूल दिखें तो उन्हें पास से सूंघ लूंगा और सीना उम्मीदों से भर जाएगा. हम सबको एक शिउली का पेड़ अपने आसपास लगा लेना चाहिए…है ना!




Update: This article was also published by thelallantop.com. 

Tuesday, 10 April 2018

सपने जगह हैं।

आज सुबह आँख खुली तो रात के सपने का भार सर पर महसूस हुआ। अपना क़द थोड़ा कम लगा और चेहरे के सामने एक दीवार सी थी का एहसास हुआ। उठते ही पहला काम मोबाइल में सर्च किया 'killing Dream Interpretation '। कुछ ऑप्शन आए, पढ़ने की कोशिश की पर तभी घड़ी पर नज़र गयी। मेरे पास आधे घाटे का वक़्त था घर से निकलने के लिए। मैं बाथरूम की तरफ़ भागा। तैयार हुआ और फटाफट  नाश्ता कर घर से निकल पड़ा। सर का भार अभी भी वैसा ही था। 'कोई ऑटो वाला ना ना करे बस' मुझे किसी से ज़्यादा बात करने का मन नहीं है... बहस तो बिल्कुल नहीं। शहर में गर्मी भी बढ़ती जा रही है।

ऑटो में बैठे बैठे Dream Interpretation पढ़ते हुए बार बार मुझे बीती रात का सपना याद आ रहा था। कुछ छः से सात लोगों ने मिलकर एक आदमी का गला रेत कर मार डाला था। यह लोग चालीस से पचास साल के बीच की उम्र के थे, सबने सफ़ेद कपड़े पहन रखे थे । वो एक साथ आए और एक आदमी जो उनके जैसा सा ही था को उठा कर एक दीवार के पीछे ले गए, उनमें से कुछ उसका गला रेतने में लग गए और कुछ उनको घेर कर ज़ोर ज़ोर से गाना गाने लगे ताकि जिसका गला काटा जा रहा है की आवाज़ दब जाए और सड़क पर चलते लोगों का ध्यान उसपर ना जाए। आह्ह्ह... सपने में थोड़ी देर बाद मुझे समझ आया कि उस आदमी को मेरे बिस्तर पर ही मारा गया है। हालाँकि उसकी लाश वहाँ नहीं है मेरे बिस्तर के गद्दे के नीचे अभी भी उसका ख़ून लगा हुआ है...टपक रहा है। मुझे वो साफ़ करना था। पता नहीं क्यूँ पर बार बार यह डर भी मन में कहीं था कि अगर पुलिस को पता चला तो मुझे जेल में जाना होगा।

इसी बीच उस दोस्त की शक्ल भी बार बार याद आती रही जो यह सब होने के बाद सपने में आया था। वह मुझसे काफ़ी वक़्त से नाराज़ है। उससे ढंग से बात किए हुए भी एक साल से ज़्यादा हो गया। कई बार मैंने ख़ुद से भी कहा है कि  ये ठीक है, पर सोच और एहसास में तो फ़र्क़ होता है ना। कहीं ना कहीं यह बात मुझे खलती भी है पर इस बारे में अब कुछ नहीं किया जा सकता। कुछ चीज़ें बस होती हैं। Dream Interpretation वाले पेज ने बताया कि जिस तरह का सपना मैंने देखा उसका मतलब यह भी हो सकता है कि अंदर ही अंदर मैं किसी से बहुत ग़ुस्सा हूँ। तो क्या मैं उस दोस्त से ही ग़ुस्सा हूँ जो मेरे सपने में आया था? हाँ शायद, थोड़ा सा। यह  अपनी बात ना कह पाने का और उसकी ना सुन पाने का  ग़ुस्सा है। नज़रों के सामने आकर भी मूँह पर टेप मार दी हो वैसा सा कुछ है। Dream Interpretation वैसे भी कितना सही है और उसपर कितना भरोसा किया जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। यह तो मन को बहलाने की कई आदतों में से एक है।

शहर की गर्मी, ट्रैफ़िक और उसके साथ होती सुबह की भागदौड़ आज थोड़ी ज़्यादा ही लग रही है। दूसरी तरफ़ दिमाग़ में घड़ी उल्टी चल रही है कि नौ बजे तक अंधेरी पहुँचना है।आज का दिन ऐसा ही शुरू हुआ है अब इसका कुछ किया नहीं जा सकता। की जा सकती है तो बस एक उम्मीद कि अपने ख़राब दिन का असर किसी और पर ना हो। ऐसे में मैं बस अपने रीऐक्शन को delay कर सकता हूँ।

अंधेरी पहुँच का कुछ देर कार्तिक के साथ काम किया। UKC आज CBI के ऑफ़िस गया हुआ है। चंदा कोचर वाले केस के सिलसिले में। यहाँ आकर तो मन थोड़ा बदला तो ज़रूर है। बारह बजे तक वहाँ से काम निबटाकर मैं सात बंगला कॉलिन के पास गया। यहाँ भी हम दोनों ने थोड़ी देर काम किया पर आज मेरी एनर्जी थोड़ी डाउन ही है। सर के भार ने सर में अपनी जगह बना ली है और दर्द  बन गया था। मैंने कॉलिन को कहा कि 'आज का सेशन छोटा ही रखते हैं, I am not feeling well'। उसने पूछा तो मैंने अपने बीती रात के सपने के बारे में बताया। वो हँस रहा था और फिर उसने मुझसे अपने बीती रात के सपने के बारे में बताया।उसका सपना इतना रियल था कि उठने के बाद उसे यही लग रहा था कि जो उसने सपने में देखा है वो सच में हुआ है। हम दोनों को यह लगता है कि सपने सिर्फ़ सपने नहीं बल्कि कोई जगह होते हैं, जहाँ जाकर वहाँ से लौटते हुए उसका असर हम पर रह जाता है।

चार बज चुके हैं। मैं वहाँ से निकलकर आज जल्दी घर आ गया हूँ। थोड़ा आराम किया है सर का दर्द अब नहीं है। थोड़ी दोस्तों से फ़ोन पर बात हुई और अब मूड ठीक है। एक 'not so good day' ख़त्म हुआ है। अब कल से एक नए दिन में क़दम रखना है जैसे हम हर रात सपनों में क़दम रखते हैं।

Thursday, 22 March 2018

पाण्डेय तुम चलोगे...?


स्क्रिप्ट् पर कुछ फ़ीड्बैक थे तो उसी सिलसिले में मैंकार्तिक और उत्कर्ष एक साथ बैठे थे। रात के क़रीब नौ बजे का समय था। उत्कर्ष ऑफ़िस से कुछ देर पहले ही आया था। हम तीनों मिलकर कहानी के लूपहोल्स को ठीक कर रहे थे तभी उत्कर्ष का फ़ोन बजा। फ़ोन रखने के बाद उसने बताया कि दस बजे तक उसको फ़ुट्बॉल खेलने पहुँचना है तो फटाफट आज के लिए काम निबटाना होगा। उसने मुझसे भी पूछा 'पाण्डेय तुम चलोगे फ़ुट्बॉल खेलने?' मैंने आख़िरी बार फ़ुट्बॉल कुछ पंद्रह साल पहले खेला था पर  फ़्लो-फ़्लो में मैंने 'हाँकह दिया। 9:30 होते ही उत्कर्ष मुझे खींच कर ले गया और कार्तिक ने बचे हुए दस मिनट के काम को निबटाने का ज़िम्मा लिया। उत्कर्ष की कार में बैठ कर हम दोनों कपड़े चेंज करने के लिए उसके घर आए जो कि वहीं पास में वीर-देसाई रोड पर है। उसने मुझे एक स्पोर्ट्स लोअर और एक जोड़ी पुराने हो चुके स्पोर्ट्स शूज़ दिए। तब तक अभिनव और उसके साथ उसका एक और दोस्त भी  गए थे। कपड़े बदलकर हम चारों इन्फ़िनिटी मॉलअंधेरी के पीछे एक ग्राउंड में पहुँचे जहाँ कुछ और दोस्त पहले से मौजूद थे। 

सब एक दूसरे को यही बता रहे थे कि कैसे फ़ुट्बॉल में उनका भरोसा ना किया जाए क्योंकि उन्हें खेलना नहीं आता। मुझे जानकार अच्छा लगा कि चलो अपनी इज़्ज़त जाने का ख़तरा कम हैफिर भी सब मुझसे बेहतर तो होंगे ही का ख़याल मेरे दिमाग़ में कहीं था। इस टीम में कुल 10 लोग थे जिनमें से मैं क़रीब आठ या नौ लोगों को किसी ना किसी तरह से पहले से जानता था। दो टीमें पाँच पाँच लोगों की बँट गयीं। सब एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए खेल रहे थे। शुरू में मैं डिफ़ेन्स पर थाधीरे धीरे थोड़ा खुलना शुरू हुआ। मुझे बीच बीच में डर भी लगता कि बॉल किसी तेज़ी से आकर मूँह पर ना लगे का किसी खिलाड़ी के पैर से पैर पर चोट ना लगे। बॉल मेरे पास आती तो पैरों को समझ नहीं आता कि उनके साथ कैसा बर्ताव करना हैवे बस चल जाते और बॉल अपनी दिशा बदल लेती। 'भागती बॉल पर मेरे पैरों का आत्मविश्वास एकदम कम हो जाता है।

बीच बीच में उत्कर्षअभिनव और सौरभ के 'बहुत बढ़िया पाण्डेयऔर 'शाबाशजैसे शब्द आते रहे। कुछ देर बाद मैं विपक्ष के गोल पोस्ट की तरफ़ जा कर खेलने लगा इस उम्मीद में कि अगर इस तरफ़ बॉल आयी तो मैं गोल कर पाउँगा...शायद। सौरभ इस तरफ़ गोलकीपिंग कर रहा था। सौरभ और मैं खड़े खड़े अपने इंटर्नल जोक्स भी मार रहे थे। दरसल सौरभ और मैंने एक फ़िल्म पर साथ में काम किया था तो हम एक दूसरे को पहले से जानते थे। खेल धीरे धीरे गरमा रहा था। इस बार बॉल मेरी तरफ़ आयी जिसकी उम्मीद में मैं इस तरफ़ आया था। मैंने सामने से आती बॉल को देखा और घूम कर गोल पोस्ट की तरफ़ मार दिया। हाव्वव...!!! गोल हो गयाहो गया गोलमेरी टीम ख़ुश थी और मैं आश्चर्य में। सच बोलता हूँ मैंने बस अनुमान कर के उस बॉल को एक दिशा दी थी बस। उसे मारते हुए मुझे एक साथ दोनों कभी नहीं दिखे। या तो बॉल दिखती या फ़िट गोल पोस्ट। पाँवों में इतना ज़ोर भी नहीं था कि वो सट्ट कर के गोल कर सकें...पर गोल हो चुका था। खेल आगे पढ़ चुका था।

थोड़ी देर बार विपक्षी टीम ने भी अपना पहला गोल कर दियाफिर दूसरा। प्रणय बहुत अच्छा खेलता हैफ़ुट्बॉल और उसकी गति मैदान पर बराबर है। सब यह भी बोल रहे थे कि 'वो अर्जुन है इस टीम का मछली की आँख पर ध्यान रहता है उसका'... मुझे कुछ नियम पता नहीं थे इस वजह से मेरी टीम का थोड़ा नुक़सान भी उठाना पड़ा जैसे एक बार मैंने बॉल को हाथ लगा दिया जिसकी वजह से एक पेनल्टी मेरी टीम को झेलनी पड़ी। खेल के आख़िरी पंद्रह मिनट में मैंने गोल कीपिंग की। एक गोल हुआ जिसके बाद मुझे यह बताया गया कि मैं अगर गोल कीपर हूँ तो हाथ लगा कर रोक सकता हूँ। धत्तमुझे यह भी पता नहीं था। उसके बाद मैंने चार गोल होने से रोके। थोड़ी देर बार बाहर से ग्राउंड कीपर ने सीटी बजा कर बताया कि हमारा टाइम ख़त्म हो चुका है। हमने पाँच मिनट और माँगे और उसके बाद खेल ख़त्म हुआ। हमने कुल चार गोल किए और विपक्षी टीम ने पाँच। काश मैंने वो गोल हाथ लगा कर रोक लिया होता।

पर अब कोई बात नहीं। सबकी टीशर्ट पसीने से गीली थी। हम सब बैठ कर पानी पी रहे थे और मैच को लेकर एक दूसरे की टाँग खींच रहे थे। पूरा कॉलेज के दोस्तों वाला माहौल था। मुझे भी बड़े दिनों बाद कुछ ऐसा कर के मज़ा आया।और हाँ मैंने गोल भी तो किया था। 

हम सब थोड़ी देर बाद वहाँ से निकल लिए। मैं उत्कर्ष के घर आया थोड़ी देर बैठाबातचीत करीअपने कपड़े बदले और रात के पौने एग्यारह बजे वहाँ से ये सोचते हुए निकला कि  अब कोशिश करूँगा कि फ़ुट्बॉल रेग्युलर खेल जा सके। उत्कर्ष बता रहा था ये सब लोग हफ़्ते में तीन दिन खेलने जाते हैं। मैं घर वापस लौटते हुए यही सोच रहा था कि जो काम करते हुए या करने के बाद अच्छा लगे उसे अक्सर करना चाहिएहफ़्ते में तीन घंटे की ही तो बात है.और शायद थोड़े दिन लगातार खेलने से बॉल और गोलपोस्ट एक साथ नज़र आने शुरू हो जाएँ

Thursday, 15 March 2018

आज मौसम बदला (लास्ट पोस्ट से जुड़ा हुआ)

पिछली पोस्ट में ही लिखा था कि कैसे मुझे बारिश का इंतज़ार है और कैसे इस ख़ुशनुमा मौसम की तलाश में मैं देहरादून जाने वाला हूँ। कल देहरादून के लिए निकल रहा हूँ। पहले दिल्ली जाऊँगा फिर वहाँ से निखिल की कार में रोड के रस्ते देहरादून। 
आज कल सोते हुए काफ़ी देर हो जाती है और वही मेरे देर से उठने का बहाना भी है। मुझे यह पसंद नहीं, ऐसा लगता है जैसे दिन का एक हिस्सा बिना जीए बिना कुछ किए ही बीत गया। कल सुबह उठते हुए भी दस से ज़्यादा बज गए थे।यह कोई  बहुत अच्छा एहसास नहीं है।आदत ठीक करने की कोशिश जारी है...  जब दिन सुस्त शुरू होता है तो उसकी ऊँगली पकड़े हुए बाक़ी का दिन भी वैसे ही सुस्ताता सा रहता है। कल तो बाहर जाने का मन भी नहीं था। मीटिंग्स कैन्सल कर दी थीं और घर पर ही कुछ लिख पढ़ रहा था।पर कल घर पर ही रहने से एक अच्छी बात यह हुई कि मेरा पास्पोर्ट का पोलिस वेरिफ़िकेशन हो गया जो बहुत टाइम से पेंडिंग पड़ा हुआ था। कुछ डॉक्युमेंट्स जो  Police Station में देने हैं उसके लिए भागदौड़ भी की क्योंकि मुझे ये सब ठीक से निबटाकर कल देहरादून के लिए निकलना है। बीच में एक बार ऐसा भी लगा था कि शायद यह ट्रिप कैन्सल करनी पड़े पर ऐसा नहीं है।

पर आज भी मैं दस बजे के आसपास ही खुली। दिमाग़ में दूसरा ख़याल यही आया कि Police Station का काम कराना है। तो आज बिना नहाए धोए सारे डॉक्युमेंट्स लेकर Police Station ही गया।पर आज मन में देर से उठने का चिड़चिड़ापन नहीं था। वजह ये थी कि इस सारी भागदौड़ के बीच मौसम काफ़ी ख़ुशनुमा था। हल्के हल्के बादल छाये  हुए थे (अभी भी हैं) और माहौल की ठंडक बैंगलोर के मौसम की याद दिला रही थी। ख़याल आया कि 'बताओ हम मौसम ढूँढने कल देहरादून जा रहे हैं तब जाकर यहाँ का मौसम बदला है।'  भर की ताज़गी अंदर की तरफ़ अपना रुख़ कर रही थी।

Police Station के दो चक्कर लगे, थोड़ी भाग दौड़ हुई पर सब आराम से हो गया। शुक्रिया टू द मौसम। सोच रहा हूँ देहरादून में अगले दो दिन मौसम के साथ पहाड़ भी होने पर जो लोग किंहि वजहों से मुंबई से बाहर नहीं जा पा रहे उनके लिए तो यह एक सुकून होगा ही। बीच बीच में ऐसा मौसम होना चाहिए। अब देखते हैं देहरादून का मौसम कैसा होता है,  मैं पहली बार जा रहा हूँ कुछ सोच कर ना ही जाऊँ तो बेहतर होगा। कल को कल में ही खुलने के लिए छोड़ना बेहतर है। जब पहली बार बैंगलोर भी गया था तो बैंगलोर ने चकित किया था। वो चकित होने जगह छोड़ कर रखना ही ठीक है।

फ़िलहाल तो बाहर के काम निबटा कर, नहा धोकर, एक अच्छी सी चाय बनाकर अपनी वर्किंग डेस्क पर बैठा हूँ।  जाने से पहले कुछ लिखने का काम है जो आज रात तक निबटाना है। एक साफ़ साफ़ डेस्क है, जिसके बग़ल में एक हरा मनी प्लांट रखा हुआ है, दो किताबें जो मैं एक साथ पढ़ रहा हूँ वो हैं, ऊपर से पंखा अपनी हल्की हल्की हवा फेंक रहा है, मैंने खिड़की पूरी खोल ली है जहाँ से कबूरतों की आवाज़ और ठंडी हवा अंदर आ रही है और मैं लिखने बैठ गया हूँ..।

Tuesday, 6 March 2018

मुझे बारिश का इंतज़ार है


यह जो अभी लिखना शुरू किया है पहले भी लिख सकता था। अगर ढंग से देखें तो सब कुछ बंद कर के बस लिखना ही तो था। पर नहीं, इस बारे में सोचते हुए दो दिन निकल गए। जिस वक़्त इसे लिखने की ज़रूरत महसूस हुई उस वक़्त मैं सेट पर था। थोड़ा बहुत मोबाइल में लिखना शुरू ही किया था कि मेरा सीन शूट होने लगा। पूरे दिन काम किया और क्या डिमांडिंग शूट था यह। तेज़ गर्मी और कड़क धूप। ख़ैर शूट अच्छा रहा और मज़ा तो आया ही। सेट पर वैनिटी का AC, बाहर की कड़क गर्मी और धूप को मिला कर आज शाम ही सर्दी ने जन्म लिया है। बग़ल में नाक पोछने के लिए रुमाल रखा हुआ है और बाक़ी दिन के सारे काम निबटाकर या कहें तो छोड़ कर मैं इसे लिखने बैठ गया हूँ। इतना लिख लेने पर यह ख़याल आया कि सच में इसके लिए बस इतना ही तो करना था। धत्, ना चाहते हुए भी आदतन हाथ मोबाइल तक पहुँच ही गया।
दरअसल बात यह है कि मुंबई की गर्मी के इस मौसम में मुझे बारिश का इंतज़ार है। पिछले कुछ दस दिनों से मैं बारिश का इंतज़ार कर रहा हूँ। लगातार होने वाली नहीं, थोड़ी देर होकर आस पड़ोस के लैंड्स्केप को बदल देने वाली बारिश। ऐसा क्या है कि मुझे बारिश का इंतज़ार है? मुझे एक बात समझ आयी। दरअसल मुंबई में बारिश का होना मेरे मुंबई आने के पहले दिन से जुड़ा हुआ है। मुंबई से मेरी पहली पहचान से।  १२ June 2015 को मैं पहली बार मुंबई आया था। हाँ पहली बार... उससे पहले मैंने मुंबई सिर्फ़ क़िस्से-कहानियों और फ़िल्मों में देखा था। उस दिन सब कुछ ही नया था, मुंबई का रूप रंग, फ़िल्मस्टार्स की होर्डिंग्स, बिल्डिंग, सड़कें... सब कुछ ऐसा था जैसे किसी अपरिचित से मैं पहली बार मिल रहा हूँ। मुझे पता था उससे थोड़ी देर बाद बात होगी पर अभी तो शुरुआत की कुछ झिझक थी ही। स्टेशन से ऑटो लेकर शहर देखता हुआ मैं कांदीवली पहुँचा। कांदीवली का घर जो कि मेरे दोस्त गौरव ने दो हफ़्ता पहले आकर लिया था वो भी मेरी कल्पना से अलग था। तंग जगहों के क़िस्सों की मुंबई में यह घर बड़ा था। सिर्फ़ ख़ुद में ही बड़ा नहीं पर अब तक के दिल्ली और बैंगलोर के सारे घरों से बड़ा। मैं अभी भी उसी मकान में रहता हूँ, मेरे दोस्त मज़ाक़ में कहते हैं कि ‘मुंबई में कहीं जगह है तो तुम्हारे घर में।’ मेरे मकान मालिक काफ़ी नेक़ इंसान हैं। उस रात हम दोस्त (मेरा एक दोस्त अमित सिंह भी पहले से अपनी वाइफ़ पारुल के साथ मौजूद था) मुंबई घूमने निकले। 'वाह! नया शहर'। नज़रें रह रह कर किसी सिलेब्रिटी को ढूँढ रही थीं। गेट वे पर TVF में काम करने वाला इंटर्नेट सिलेब्रिटी दिखा भी। मैं जान लेना चाहता था कि जब ये शहर मुझसे बातचीत शुरू करेगा तो क्या कहेगा? क्या मेरी बात सुनेगा ये शहर? या फिर मेरी बातें इसे कैसी लगेंगी? अभी सोचता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे इस शहर को मेरे लिए ही शायद बारिश ने उसदिन धो दिया था। नयी गलियों और लोगों से होते हुए मैं मुंबई को देख रहा था कि कैसे शुरू करूँ इससे बात करना?

अगले दिन वरुण(ग्रोवर) भाई का एक शो था कैन्वस लाफ़ क्लब में, उसके लिए मुझे उन्होंने इन्वाइट किया। तारीख़ थी १३ जून, २०१५। शो के बाद हम दोनों को लोवर परेल से लोकल लेनी थी। रात के कुछ ११ या १२ बज चुके थे। प्लैट्फ़ॉर्म पर लोकल आकर रुकी, डब्बे में अंदर कुछ १०-१२ लोग ही थे। मैं आगे खड़ा था और मेरे पीछे वरुण। मैंने एक पैर हवा में उठाया कि मैं डब्बे में चढ़ जाऊँ पर वो पैर तब तक हवा में ही रहा जब तक वरुण ने टोका नहीं कि 'क्या हुआ चढ़ो अंदर'। मैं चढ़ गया और हम दोनों बातें करते हुए कांदीवली तक आए। मेरी लोकल में फट्ट कर के ना चढ़ने की झिझक उससे पहचान ना होने की ही थी क्योंकि उसके बाद कभी ऐसा नहीं हुआ। अब तो लोकल ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुकी है।

शुरू के एक साल अलग अलग जगहों पर मैं गूगल मैप देखकर जाता था, अलग अलग ठिकानों पर। शहर की कई सारी जगहें मैंने किसी बिंदू की तरह ढूँढी है। नयी जगह पर जाना कुछ नया मिल जाने सा था। मुंबई आकर ही मुझे समझ आय कि  मुझे रंग और काँच के सामान बहुत पसंद हैं। मेरी सारी पसंदीदा जगहें मुझे एक छोटा सा मेले सी लगती थीं। अब शहर के क़रीब क़रीब हर वेन्यू से पहचान हो गयी है। वहाँ पर्फ़ॉर्म भी कर लिया है। अब जब वापस उन्हीं जगहों पर बार बार जाना होता है तो रास्ते समझ आते हैं मैं उन सारे बिंदुओं को जोड़ कर अपने दिमाग़ में एक रास्ता बना पाता हूँ। जो लोग अब रास्ता पूछते है उनको बता देता हूँ और फिर सोचता हूँ यह कैसे हो गया धीरे धीरे। इस शहर से इतनी जान पहचान हो गई। कभी कहीं यूँ ही घूमते हुए दोस्त मिल जाते हैं और फ़ेसबुक वाले दोस्त भी, तो लगता है कि  शहर अपना सा है। पर इसी बीच एक बात हुई है कि भटकना कम हो गया है। भटकने में कुछ मिल जाना आश्चर्य है। वो आश्चर्य धुँधले हो रहे हैं। उनकी जगह नए आश्चर्यों ने ले ली है। बारिश को आने में भी अभी तीन महीने हैं। बैंगलोर में दोस्तों के साथ रात में घूमना और सुंदर भविष्य के सपने भी भटकना था। मुझे उस भटकने की जगह रखनी पड़ेगी अपने अंदर यह समझ आ रहा है। उस भटकाव ने साहित्य और सिनेमा के नए दरवाज़े खोले थे। वहाँ से एक रस निकल आत था। चाय से भी पहले वाला स्वाद ग़ायब है, कभी चीनी ज़्यादा हो जाती है तो कभी चायपत्ती... पर मुझे यक़ीन है एक हल्की बारिश के साथ सब वापस आ जाएगा। पूरी तरह से नहीं पर टूकड़ों में ही। जैसे सिगरेट पीने वाले दिनभर टूकड़ों में अपना सुकून ढूँढते हैं मैं वो बारिश में ढूँढ रहा हूँ। हल्का ठंडा मौसम, चाय, किताबें और काग़ज़ पर उतरता हुआ मनचलापन।

मुंबई में अभी तो बारिश मुमकिन नहीं इसीलिए अगले हफ़्ते देहरादून जा रहा हूँ कुछ दोस्तों के साथ। बारिश ना सही पहाड़ ही सही। होटल भी रस्किन बॉंड के घर के बग़ल में बुक किया है। वहाँ जाकर भटकेंगे थोड़ी देर।  ख़ैर घड़ी १२ बजकर ११ मिनट का वक़्त बता रही है। सड़कें ख़ाली होंगी और मौसम में रात की एक ताज़गी। सोच रहा हूँ थोड़ी देर भटक आऊँ। मम्मी पूछेंगी कि सर्दी हुई पड़ी है तुम्हें और इतनी रात में घूमने निकल रहे हो? पर अब ठीक है उनको समझ आ जाएगा। वैसे भी भटकने के बाद अक्सर नींद अच्छी आती है।