Thursday, 21 February 2019

आदत ख़राब है।

आदत बदलनी है। धीरे धीरे ही सही पर बदलनी तो है। पिछले महीने भर से ब्रेक पर था। थोड़ा ट्रैवल किया थोड़ा काम। इससे पहले ऐसा लग रहा था जैसे कुछ नया नहीं सोच पा रहा, काम करने की भगम भाग में लगने लगा था कि बस काम ही हो रहा है, कुछ नया सीख नहीं रहा हूँ। Calendar बताता था अब ये कर लो, अब ये, अब यहाँ चले जाओ और अब तुम्हें इस चीज़ को वक़्त देना है। मुंबई का ट्रैफ़िक अलग, शोर अलग। तो मैंने सोचा ज़रा रुकते हैं, आराम से चलते हैं, वैसे भी सब तो हो ही रहा है जो मैं चाहता हूँ। तो लगभग चार शहर घूमने के बाद मैं वापस मुंबई में हूँ। एक फ़िल्म पर काम चल रहा है, जो ब्रेक लेने से पहले से चल रहा है उसके लिए गाने लिख रहा हूँ तो अपने वक़्त में यह काम कर सकता हूँ, रोज़ कहीं किसी के पास जाना नहीं होता। पर ब्रेक लेने के दौरान मैंने अपना सारा रूटीन बदल दिया। अब रूटीन ऐसा बदला है कि सही होने का नाम नहीं ले रहा। रात में दो बजे सोता हूँ, सुबह दस बजे उठता हूँ, कॉफ़ी बनता हूँ और लैप्टॉप और मोबाइल के सामने बैठ कर कुछ कुछ टाइम पास करता रहता हूँ। तीन किताबें एक साथ पढ़ तो रहा हूँ पर वो भी ज़्यादा पढ़ नहीं पा रहा और इस ब्लॉग का याद किया तो याद आया कि इधर भी कई महीनों से कुछ नहीं लिखा। हाँ सोचा कई बार कि ये वाली बात लिख लेनी चाहिए पर लिखा नहीं। और फ़ोन पर बिज़ी रहने के कई सारे बहाने तो हैं ही, बाक़ी सफ़िया (मेरी बिल्ली) बचीखुचि कसर पूरी कर देती है। ख़ुद को इतना बिगड़ा हुआ देख कर लगा कि आदत ठीक करनी पड़ेगी। 

पिछले एक हफ़्ते में एक बात जो ठीक हुई है वो ये कि स्टैंडअप फिर से शुरू हो गया है। कल अचानक ही आदित्या ने मेसिज कर के पूछा कि बांद्रा में ओपन माइक करना है तो आ जाओ। मैं चला गया। जाते हुए मन अजीब सा ही था, लग रहा था क्यूँ जा रहा हूँ,  तैयारी तो ओपन माइक की भी नहीं है। वहाँ जाऊँगा जोक्स चलेंगे नहीं तो और बुरा लगेगा। ‘प्रोडक्टिव क्या कर रहे हो पाण्डेय?' का सवाल मन में कई बार आया। पर फिर भी मैं बांद्रा चला ही गया, अच्छी बात ये थी कि ओपन माइक उम्मीद से बेहतर हुआ। कई सारे जोक्स तो वहीं स्टेज पर ही आए, लोग हँसे तो अच्छा भी लगा। पर आदत में धीरे धीरे सुधार करना है वाली बात अभी भी चल ही रही थी। तो घर आकर फ़ोन हॉल में ही रख दिया और आजकल मैं रोल ढाल की 'मटिल्डा' पढ़ रहा हूँ तो उसे लेकर अपने बेड रूम में चला गया। (डिस्ट्रैक्शन: अभी अभी यह लिखते हुए फ़ोन बजा, देखा तो एक काम का मेसिज था, उसे रिप्लाई करने गया तो चार और मेसिज दिख गए। सोचा उनका भी रिप्लाई कर दूँ। फिर पता नहीं कैसे, वट्सऐप से इंस्टा पर चला गया। और कुल दो-तीन मिनट डिस्ट्रैक्ट होने के बाद यहाँ आया हूँ। कितनी टफ़ है इस एज में एक राइटर की ज़िंदगी। बकवास) ख़ैर मैं अपनी बात पर वापस आता हूँ। फ़ोन हॉल में रखा क्योंकि अगर पास में फ़ोन होता तो मैं किताब कम पढ़ता और फ़ोन ज़्यादा देखता। मैंने सोचा कि क्या मैं घर में रहते हुए अपने मोबाइल का इस्तेमाल लैंडलाइन की तरह नहीं कर सकता? जीवन में हर चीज़ की तरह इसे भी कर के देखने में कोई नुक़सान नहीं था। तो पूरे टाइम फ़ोन रिंगर पर पड़ा हुआ हॉल में रखा रहा। मैंने मटिल्डा के कुछ तीस पेजेज़ पढ़ कर ख़त्म किए। अच्छा लगा कि कुछ तो किया। रात के बारह बज चुके थे और आज का दूसरा टारगेट था कि थोड़ा जल्दी सोना है। रात के दो बजे सो सो कर ऐसा लग रहा है जैसे शरीर फैलने लगा हो, कुछ दिनों से सुस्ती महसूस कर रहा हूँ। तो कमरे की लाइट बंद करी और पुराने वक़्त को याद करता हुआ आँखें बंद कर लीं, जब मुझे सुबह उठकर ऑफ़िस जाना होता था। नींद भी जल्दी आ गयी। आज सुबह दस बजे नहीं पर नौ बजकर तीस मिनट पर उठा। यह एक छोटी सी अचीव्मेंट है मेरे लिए।

दूसरी तरफ़ फ़ोन की अलग कहानी हैं। सौरव ने एक मोबाइल अडिक्शन ट्रैकिंग ऐप्प के बारे में बताया था कि वह डालने से पता चलता रहेगा कि मैं फ़ोन का इस्तेमाल कितना कर रहा हूँ। उसकी डिफ़ॉल्ट सेट्टिंग जोकि 50 बार फ़ोन unlock करने देती है और डेढ़ घंटे का टाइम फ़ोन के इस्तेमाल के लिए देती है, वो इतने वक़्त को अड्डिकटेड की श्रेणी में रखती है। मैंने परसों अपना फ़ोन 184 बार अन्लॉक किया था और कुल चार घंटे से ऊपर इस्तेमाल किया था। मतलब मैंने अडिक्शन के लेवल से भी दो तीन लेवल ऊपर हूँ। हद है। कल मैंने अपना फ़ोन 134 बार और साढ़े तीन घंटे इस्तेमाल किया। परसों के मुक़ाबले यह थोड़ा कम है पर accidentle है और कहीं से भी healthy नहीं है। काम के साथ distraction का तो आप पूछो ही ना।

मेरी बहन निधि को मैंने अपनी इस हालत के बारे में बताया तो वो आश्चर्य कर रही थी। कहने लगी ‘इतना फ़ोन कैसे इस्तेमाल करते हो भाई तुम?' मैंने उसके फ़ोन में भी वो ऐप्प डाला। पता चला का उसने अपने फ़ोन को 118 बार अन्लॉक किया था और पाँच घंटे से ज़्यादा इस्तेमाल किया था। यह देखकर मैंने तो उसे छेड़ा पर वो भी आश्चर्य में थी। कह रही थी 'यार पता ही नहीं चलता पाँच-पाँच मिनट कर के कैसे इतना टाइम हो जाता है। मैं ध्यान रखूँगी।' 

मेरे फ़ोन में भी वह ऐप्प चल रहा है और मैं वैसे भी ध्यान में रख रहा हूँ कि अगर चार काम हैं फ़ोन पर तो एक बार में निबटा लिया जाए। सुबह उठकर पहले कुछ लिख लिया जाए। अपनी कहानी, अपना ब्लॉग, कुछ पढ़ लिया जाए। नहीं तो आस पास डिस्ट्रैक्शन बहुत हैं। जैसे अभी यह लिखते हुए ही बार बार कॉफ़ी पीने का मन कर रहा है। पर घर में कॉफ़ी ख़त्म है। अब सोच रहा हूँ नीचे दुकान से लेकर आऊँ या अभी रहने दूँ। आज के वक़्त में हेमलेट होता तो इसी कशमकस में ‘To Be Or Not To Be’ पूछ रहा होता।

पर अभी आज अपनी कहानी पर काम करना बाक़ी ही  है। शाम पाँच बजे अंधेरी में म्यूज़िक डिरेक्टर से मीटिंग है। बुकोव्स्की का एक फ़ोटो भी कल फ़्रेम करने को दिया था वो भी लाना है, वो मैं मीटिंग से पहले जाते जाते ले लूँगा। उसके लिए अलग से जाऊँगा तो और टाइम ख़राब होगा।  मैं अपने दिमाग़ में दिन थोड़ा वैसे प्लान कर रहा हूँ। प्लान करना पड़ेगा नहीं तो समय से बड़ा जेबकतरा कोई भी नहीं। 

वैसे इसी बारे में लिखते लिखते आज कुछ लिख लिया। दिन की शुरुआत तो अच्छी हुई है। बाक़ी दिन भी अच्छा ही जाएगा।
पढ़ने के लिए शुक्रिया।




Monday, 1 October 2018

यही तो वजह है...

एक सुंदर दिन... जिसका नशा चढ़ना बस शुरू ही हुआ है। पिछले हफ्ते भर से नींद में भी काम कर रहा हूँ। दो काम एक साथ एक ही पड़ाव पर अपनी डेडलाइन ताक रहे हैं। दिन जल्दी शुरू हो जाते हैं और काम पूरे दिन का हर हिस्सा निचोड़ लेता है। रोज़ की तरह आज का दिन भी जल्दी शुरू हो गया था। पहला सेशन अंधेरी में चल रहा है और दूसरा बांद्रा में... आज पहला सेशन 9 से 2:30 तक चला... उसके बाद मैं ऑटो लेकर बांद्रा भागा और वहाँ 3:45 से काम शुरू किया। पहले सेशन में काफ़ी मज़ा आया था पर दूसरे सेशन को लेकर काफी तनाव भी था कि पता नहीं आज जितना तय किया है, उतना काम हो पाएगा या नहीं? आगे की कहानी क्या है? टाइम की कमिटमेंट थी जिसे लाँघना मुझे खुद से भी नाराज़गी से भर देता है।

मेरी को-राइटर और मैंने काम शुरू किया और धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे... बीच में मेरे मन में बार बार यह खयाल आया कि ये कैसे हो पायेगा? नींद भी पूरी नहीं हुई है और आज कोई स्पेशल फीलिंग भी नहीं आ रही कि आगे की कहानी क्रैक कर लूंगा... पर काम बीच में छोड़ कर खुद को किनारे कर लेना या बाद में कर लूँगा का बहाना करने के लिए भी वक़्त नहीं था। ये तो उसी वक़्त होना था। हमनें लगातार बात करना और लिखना जारी रखा... चाय पी, खाखरा खाया और एक दूसरे की मदद करते हुए काम करते रहे... और वाह! काम 6:30 तक हो गया था। मैं उस कमरे में इस उम्मीद से तो नहीं घुसा था।

इसबात का एहसास कि 'वो सबकुछ अब पेपर पर है, जो आज होना था' बहुत खूबसूरत था। कुछ तो ऐसा था जिसकी वजह से मैं शीशे के सामने नाच रहा था... यह बात भी मेरी को-राइटर ने ही मुझे बताई 'look at your mood now! You are dancing...' हाँ मैं नाच ही तो रहा था। जवाब में मैंने भी कहा 'YES! WE DID IT!' वो भी खुश थी... अब थकान जा चुकी थी... ऐसा लग रहा था जैसे सुबह सुबह एक सुंदर नींद के बाद आँख खुली हो... फ्रेश हो गया था मैं... डेडलाइन अभी भी वहीं है... अभी भी खूब सारा लिखना है... पर कई बार बस लिख देने के सुख का एहसास भी जीवित करने वाला है। आज की रात कल की सुबह को अपनी पीठ पर लाद कर नहीं लायी है, जबकि कल का दिन भी उतना ही व्यस्त होने वाला है... पर मुझे यह पता है कि आज नींद अच्छी आएगी... शायद यही वो सुख है जिसके लिए हमसब लिखना शुरू करते हैं। यह खुद में सम्पूर्ण है। मुझे खुशी है कि इस काम ने मुझे चुना है और मैं लिख पा रहा हूँ... 

Saturday, 18 August 2018

अटल जी के जाने पर...

साल ठीक ठीक याद नहीं पर शुरुआती 2002 या 2003 के आस पास की बात रही होगी। कविता लिखते हुए कुछ साल तो हो गए थे। कुछ 25 से 30 कविताएँ लिखीं थी और बाल पत्रिकाओं में उन्हें छपने के लिए कई बार डाक से भेजा करता था। एक कविता छप भी गई थी एक पत्रिका में... उसी दौरान पापा की अलमारी में एक किताब मिली, किताब का नाम था 'मेरी इक्यावन कविताएँ'। मैंने वो किताब पढ़नी शुरू की और उसे पढ़ते पढ़ते मेरे मन में भी अपनी कविताओं की किताब छपवाने की इच्छा जन्म लेने लगी। तो मैंने पापा की दी हुई डायरी में अपने हाथ से अपनी किताब का प्रारूप बनाना शुरू किया। मैंने सोचा इक्यावन ना सही मैं इक्कीस कविताएँ तो डाल ही सकता हूँ। और मैं अपनी किताब का नाम रखूँगा 'मेरी इक्कीस कविताएँ'... वैसे भी बाल कवि के लिए इतनी कविताएँ काफी हैं। ये सब मेरे मन में चल रहा था।
उसी किताब की देखा देखी मैंने पहले पन्ने पर 'बड़े भाई आशु के लिए' लिखकर वो किताब शुरू की...(ये बात उसे आज तक पता नहीं)। दूसरे पन्ने पर अपना 'जीवन परिचय' लिखा और फिर किताब की भूमिका... आखिरकार किताब ऐसी ही तो होती है... फिर बाकी के पन्नों पर अपनी कविताएँ अपनी सबसे ख़ूबसूरत राइटिंग में लिखने की कोशिश करने लगा। यह सब करते हुए मेरी कोशिश यह थी कि 'मेरी इक्यावन कविताएं' जैसी अपनी भी एक किताब आये जिसके मेन पेज पर अपनी वैसी ही फ़ोटो हो जैसी 'अटल जी' की उस किताब पर थी। शहर में एक साइबर कैफ़े वाला था। उसने बताया कि ऐसी फ़ोटो 40 रुपये में खिंच जायेगी और फ्लॉपी में डालकर वो दे देगा। फिर जब भी मेरी किताब आएगी मैं फ्लॉपी से वो फ़ोटो लेकर कवर के लिए प्रिंट करा सकता हूँ। फ़ोटो खिंचवा ली गयी। शहर में दो प्रिंटिंग प्रेस थे जहाँ मैं अपनी किताब के लिए बात करने वाला था। पापा भी तैयार थे क्योंकि प्रिंटिंग प्रेस वाले उन्हें जानते थे। मेरे पास किताब को बुक स्टॉल और बुक स्टॉल से पाठकों तक कैसे पहुंचानी है का पूरा प्लान था। मेरे दिमाग में एक किताब की कीमत सात रूपये थी, जिसमें से 5 रुपये दुकानदार के और दो रुपये मेरे हिस्से में आने थे। मैं खुश था कि मेरी किताब भी आ सकती है, लोग उसे पढ़ेंगे और मेरी कविताओं के बारे में स्कूल के बाहर भी लोग जानेंगे।
एक दोस्त भी था जिसके घर पर कंप्यूटर था उसको कुछ पेपर भी दिए मैंने टेस्ट प्रिंटिंग के लिए... पर देवनागरी में टाइप ना कर पाने की वजह से वो कविताएँ मैं देख नहीं पाया। साल 2004 में मैं वो शहर हमेशा के लिए छोड़ कर दिल्ली आ गया था। वो डायरी वहीं छूट गयी। वो फ्लॉपी पता नहीं कहाँ है। पर लिखकर अपना नाम बनाने का सपना कहीं ना कहीं अटक गया था। इसमें उस किताब का इतना तो योगदान था ही।
मैं कई जगहों पर अटल जी से राजनीतिक मतभेद रखता हूँ। उनकी कुछ बातों के तो मैं सरासर ख़िलाफ़ हूँ पर आज शायद वो दिन नहीं है कि उन बातों पर बात की जाए। आज अपने हिस्से की कहानी में मैं उन्हें इस तरह से याद कर पाता हूँ। आज भी अपने लिए कविताएँ लिख रहा हूँ पर अब कोई कवितओं की किताब छपवाने की इच्छा नहीं है। अब किताब का आना या ना आना बहुत मायने नहीं रखता। वो लड़कपन का खेल था जिसमें मैं पूरी तरह से लगा हुआ था और मैंने उस प्रक्रिया को एक बार जी लिया है।
अगर कभी किताब आएगी तो उसका महत्व सिर्फ व्यावसायिक होगा।
पर ये सब लिखते हुए एहसास हुआ कि उस सपने में कितना भरोसा था अपना... जैसे इस जीवन में मुझे अभी है। दोनों को ही एक दिन खत्म होना है और बात इतनी सी है कि जब सब घट रहा था तो हम उस वक़्त कितने ज़िन्दा थे।

Monday, 16 July 2018

बुकोव्स्की और मेरे बीच

चार्ल्स बुकोव्स्की मुझे कितने पसंद हैं इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक वक़्त पर मैं सोचता था कि बूढ़ा होने पर बुकोव्स्की बनूँगा। पर हर रिश्ते की तरह मेरे और बुकोव्स्की के रिश्ते में भी कुछ उतार चढ़ाव आए। इसकी शुरुआत तब हुई जब मैंने उनकी कविता ‘So You Want to Become a Writer’ पढ़ी। अगर आपने वह कविता पढ़ी है तो आपको पता होगा कि यह कविता सिर्फ़ लिखने की बात करती है, बिना किसी और प्रलोभन के। मुझे इससे एतराज़ इस बात का था कि फिर एक नया लड़का जो मुझ जैसा है, जो सीखना चाहता है लेखन को, वो क्या करे? क्या यही सोच कर बैठा रहे कि जब ‘फ़ील’ आएगी या ‘मूड’ बनेगा तब लिखूँगा। शायद एक दो बार मूड में आकर कुछ लिख दिया जाए पर जब रोज़ लिखना होगा, काम की तरह, तब? इस बात को लेकर मेरी बुकोव्स्की से एक लम्बे वक़्त तक नाराज़गी रही है। मैं इस कविता में उन्हें हारता हुआ देखना चाहता था। कई और वजहों के साथ साथ मेरा शराब पीना पूरी तरह बंद कर देने की एक वजह यह भी थी कि मैं बिना किसी के इन्फ़्लूयन्स को बहाना बनाए लिखना चाहता था। देखना चाहता था कि इसके बिना क्या होता है? क्योंकि मेरे आसपास एक ऐसी भीड़ भी दिखी जो ख़ाली इस बात पर शराब पिए जा रही थी कि बुकोव्स्की भी पीते थे, और वो बहुत बढ़िया लेखक थे। आख़िर अच्छे लेखन का रास्ता शराब, चरस और दुःख-दर्द से होकर ही तो जाता है। मैं इस वजह से भी बुकोव्स्की से नाराज़ था। फिर सोचा क्यूँ ना उसे ज़रा और बेहतर तरीक़े से जाना जाए। आख़िर प्यार तो दादाजी से है ही मुझे।


पिछले महीने बुकोव्स्की की ‘On Writing’ पढ़ना शुरू किया। यह किताब उनके पत्राचार की किताब है। 1945 से लेकर 1993 तक के सारे पत्र हैं इसमें जो बुकोव्स्की ने अपने लेखक और दोस्तों को लिखे थे। इनको पढ़कर ऐसा लगता है जैसे बुकोव्स्की से उनके बग़ल में बैठ कर बातचीत हो रही हो। वहीं उनके टाइपराइटर के पास। यह किताब पढ़ते उनकी कविता ‘So You Want to Become a Writer’ की नींव समझ में आ ही गयी। पहली बात यह कि बुकोव्स्की कभी ‘Professional Writer’ नहीं बनना चाहते थे। मेरी और बुकोव्स्की की आधी लड़ाई तो यहीं ख़त्म हो जाती है, क्योंकि मेरा सफ़र भी उनसे अलग है। अपने पोस्ट ऑफ़िस के काम से बोर हो चुके बुकोव्स्की ने लिखने को अपना ज़रिया बनाया जहाँ वो ख़ुद को व्यक्त करने के लिए कहानी और कविताएँ लिखने लगे। अपने डिप्रेशन की वजह से लगातार पीते रहते और जब जो दिल में आता लिखते। एक जगह वो लिखते हैं कि शायद उन्हें लिखने से ज़्यादा टाइपराइटर की आवाज़ पसंद है। जब पन्ने पर एक एक शब्द मिल कर एक लाइन बनाते हैं वो बहुत ही सुंदर एहसास होता उन्हें।
Lafayette Young को लिखे एक पत्र में वो हेमिंवे के बारे में लिखते हैं “…But Popeye knew when to move. So did Hemingway, until he started talking about ‘discipline.’ ”। इसे और इसके बाद के कई सारे पत्रों को पढ़ने पर साफ़ साफ़ समझ आता है कि बुकोव्स्की को किसी भी तरह के लेखन से जुड़े नियमों ये दिक़्क़त थी। William Packard को लिखे एक लम्बे लेटर में वह लिखते हैं “NOW THEY TEACH POETRY. THEY TEACH HOW TO WRITE POETRY. Where did they get the idea that they ever knew anything about it? This is mystery to me. How did they get so wise so fast and so dumb so fast?” लिखना बुकोव्स्की के लिए सिगरेट पीने जैसा था। तलब लगी और हो गए शुरू। पर कुछ ही पन्नों बाद उन्होंने अपने पत्रों में ‘राइटर्स ब्लॉक’ से जूझने की भी बात की और लिखा है कि ‘…but writing takes discipline like everything else. The hours go by very fast, and even when I’m not writing, I’m jelling, and that’s why I don’t like people around bringing me beer and chatting.- I can understand why Hemingway needed his bull ring. It was quick action trip to rest his sights…’
आज बुकोव्स्की की पॉप्युलैरिटी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग चाहे बुकोव्स्की को पढ़े या ना पढ़ें उनके बारे में महफ़िलों में बात ज़रूर करते हैं। पर क्या बुकोव्स्की ने कभी ऐसे मशहूर होना चाहा था? उनके पत्रों को पढ़कर इसका जवाब ‘ना’ में ही आता है। एक जगह वो लिखते हैं ‘The process of writing is reward in itself’. बुकोव्स्की को इस बात की ख़ुशी है कि वो अपनी जवानी के दिनों में अपने काम के लिए नहीं जाने गए। और इसी वजह से वो लगातार काम कर पाए। जबकि बाक़ी के लेखक जिनको बहुत जल्दी प्रसिद्धि मिली, उन्होंने लिखने के अलावा बाक़ी की हर तरह की बात में अपना वक़्त ज़ाया किया। बुकोव्स्की के बारे में इतना क़रीब से पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने ‘So you want to become a writer’ क्यूँ लिखी। उन्हें भी ख़ुद से वही सारी शिकायतें हैं जो मुझे उनसे हैं। यहाँ आकर हमारे बीच का मनमुटाव थोड़ा कम होता है।
बुकोव्स्की को अपने लेखनकाल में बहुत सारी रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। एक पब्लिशर दोस्त को बुकोव्स्की लिखते हैं ‘मैं आजकल कहानियाँ नहीं लिख पा रहा हूँ, वो आ ही नहीं रहीं। और यह भी जानता हूँ कि कविताएँ लिखकर मैं रेंट तक नहीं दे पाउँगा।’ बुकोव्स्की ख़ुद को कभी भी महान लेखक नहीं मानते पर उन्होंने अपने वक़्त में कला और कविता के नाम पर हो रहे छिछोरेपन पर खुलकर कठोर शब्दों में लिखा। बुकोव्स्की का लेखन ईमानदार था।
एक लेखक के तौर पर बुकोव्स्की की बहुत सी बातें मुझे समझ में आती हैं और पर मैं सबके साथ सहमति नहीं रख सकता क्योंकि उनका वक़्त और तरीक़ा कुछ और था। एक और बात जो मैं कभी बुकोव्स्की से मिलता तो ज़रूर पूछता कि ‘कला और दुःख का क्या कनेक्शन है भाई? हिंदुस्तान का युवा दुःख तलाशने में मरा जा रहा है कि उससे इसके बिना कला नहीं हो पा रही। कलम उठाने से पहले आदमी यहाँ लम्बा कुर्ता और चरस का बंदोबस्त करने लगता है। बुकोव्स्की बाबा आप इसपर क्या बोलते हो?’ यह पूछने के लिए बुकोव्स्की से बेहतर आदमी नहीं हो सकता क्योंकि वो आदमी लगातार डिप्रेस्ड था, लगातार पिये जा रहा था और लगातार लिखे जा रहा था। बुकोव्स्की 6 नवम्बर 1988 को Carl Weissner को लिखे गए पत्र में इसपर साफ़ साफ़ लिखते हैं “I’d much rather prefer to write from a happy state of mind and do so when that rare and lucky bit arrives. I don’t believe in pain as a pusher of art. We can breathe without it. If it will let us.”
बुकोव्स्की की इस किताब से जो बात मैं समझ पाया वो बस इतनी सी है कि आपका रास्ता चाहे जो भी हो एक लेखक के तौर पर ईमानदार होना पहली शर्त है। हम समाज का आइना होने की बात करते हैं पर क्या हम ख़ुद का आइना बन पाते हैं? क्या हम चरस या शराब पीते हुए इतने ईमानदार हो सकते हैं कि हम यह कह पाएँ कि ‘ये तो मैं इसलिए कर रहा हूँ कि मुझे ये करने में मज़ा आता है। मेरे लेखन का इससे कोई लेना देना नहीं।’ यह काम बुकोव्स्की ने अपने जीवन में लगातार किया है। अगर हम (मेरे जैसे और भी लेखक) बुकोव्स्की को एक मानक मानते हैं या उनसे प्रभावित हैं तो हमें उनसे अपने प्रति ईमानदारी सीखनी होगी। लेखन के आसपास रचे सारे आडंबरों को स्वाहा करना होगा और बस लिखना होगा। चाहे फ़ील आए या ना आए। क्योंकि चाह हम सबको प्रफ़ेशनल लेखक बनने की ही है।

और आख़िरी बात बुकोव्स्की के लिए लिखना कभी काम नहीं था। लिखना प्यार था उनके लिए। बुकोव्स्की शब्दों और उनसे बनते वाक्य के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे अपनी आँखों के सामने अपने बच्चे को बड़ा होते देख रहे हों। उनके सारे पत्र पढ़ कर इस बात का एहसास होता है कि शायद हम कभी अपने लेखन से उतना प्यार ना कर पाएँ जितना उन्होंने किया। क्योंकि हम बस लिखने के लिए ना तो लिखते हैं और ना ही पीने के लिए बस पीते हैं। हमें दोनों तरफ़ ईमानदार होने की ज़रूरत है।


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Tuesday, 12 June 2018

तीन साल मुम्बई और एक छोटी सी बात

आज ही के दिन तीन साल पहले पहली बार मुंबई आया था। बारिश होकर बस रुकी ही थी। फिल्में और कहानियों में पढ़ी हुई मुम्बई को ट्रेन की खिड़की से देख रहा था। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाई-वे पर भागते हुए ऑटो में यह तलाश कर रहा था कि इस शहर में मेरी जगह कहाँ होगी? अब तक का जिया हुआ सब पीछे हो गया था और अब एक नई डायरी पर नई कहानी लिखनी थी... हाथ काँप रहे थे। पिछले तीन सालों का सफर काफी उतार चढ़ाव से भरा पर उम्मीद से ज़्यादा मजेदार रहा है। इस शहर में सबके अनुभव अलग होते हैं, पर मेरे अनुभव के हिस्से में यह बात आती है कि आजतक कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने किसी से मदद माँगी और उसने मना किया हो। इस शहर के संघर्ष में लोग कभी संघर्ष नहीं हुए। कई सारे खूबसूरत दोस्त दिए हैं इस शहर ने जो अपनी व्यस्तताओं के बावजूद मेरे लिए तैयार खड़े होते हैं, हौसला बढ़ाते हैं। और मैं इस बात से खुश रहता हूँ कि ये सब मेरे दोस्त हैं... मुंबई ने छोटी छोटी खुशियों को बटोरना सिखाया, काम करना सिखाया और शुरूआती दिनों में कुछ निराशाएँ देकर यह भी सिखाया है कि 'निराशा' हमेशा रहने वाली चीज़ नहीं है। 

इसी शहर ने 'सॉरी' और 'थैंक यू' बोलना सिखाया और बोला कि "Don't be a lazy writer, अपने दुःख से बाहर भी देख, एक बड़ी दुनिया है लिखने के लिए..." काम को लेकर अलग अलग तरह के एक्सपेरिमेंट करने का मौका बस यही शहर दे सकता था। सो किया और कर रहा हूँ... दिल्ली से बैंगलोर जाना और बैंगलोर से मुंबई आना मेरी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण यात्राएँ हैं। 

आज फिर बारह जून है, आज फिर मैं ट्रेन से वापस मुम्बई आ रहा हूँ, आज फिर बारिश के आसार हैं। मुंबई लौटना अब घर लौटने जैसा लगता है। कहानी तो अभी भी चल रही है पर अब हाथ नहीं काँपते, अब संधर्ष यह है कि जो भी लिखूँ पूरी ईमानदारी से लिख पाऊँ। पहली बार जब लोकल की टिकट ली थी तो कुछ सोचकर वो संभाल कर रख ली थी। वह सिलसिला अभी भी चल रहा है। आज तीन साल बाद इन टिकटों में मेरी इस शहर की सारी यात्राएँ मौजूद हैं और इनके अंदर इतनी कहनियाँ, जिसको सोचो तो लगता है कई जीवन जी लिये हों। उम्मीद है यह शहर उन सारी यात्राओं का मौका देगा जिसकी मुझे उम्मीद नहीं पर ज़रूरत ज़रूर है।

Tuesday, 15 May 2018

राज़ी: लगा दे दाँव पर दिल.


पसंद आयी फ़िल्मों की ख़ास बात यह होती है कि उनका एक टुकड़ा फ़िल्म के ख़त्म होने के बाद भी साथ चलता रहता हैइस बार भी ऐसा ही हुआवैसे तो जैसा कहते हैं कि ‘कलेजा मूँह में आ गया’ वैसी फ़ीलिंग तो राज़ी देखते हुए कई सीन में हुई पर एक सीन ऐसा था जो अभी तक साथ चल रहा है। वह सीन जहाँ इक़बाल और सेहमत दोनों आमने सामने एक दूसरे का सच जानने के बाद मिलते हैं। दोनों एक दूसरे से प्यार तो करते हैं पर दोनों की नज़र में ही वतन पहले आता है। यहाँ विकी का किरदार इक़बाल सेहमत से पूछता है कि “क्या अब तक जो हमारे बीच था उसमें कुछ भी सच था?” यह किसी भी इंसान के होने पर सवाल है। उसकी मान्यताओं पर सवाल है। उसके जीए हुए पर सवाल है। हम जो जी लेते हैं हमारी पहचान का हिस्सा होता जाता है। हमारी मान्यताएँ, हमारी बेवक़ूफ़ियाँ, हमारे प्रेम, हमारी नफ़रतें... सबकुछ। फ़र्ज़ करें हमें एक दिन यह पता चले कि जो भी हमने जिया वह सिर्फ़ इसलिए कि कोई ऐसा चाहता था कि हम वैसा ही जिए या महसूस करें जैसा वो चाहता है। क्या वह हमारे होने पर सवाल नहीं है।

मैं एक भारतीय हूँ और देशभक्ति की थोड़ी समझ भी है। बचपन में देशभक्ति गाने सुन कर रोयें खड़े होते आए हैं और स्कूल में बड़े ज़ोरों शोरों के साथ १५ अगस्त और २६ जनवरी की तैयरियाँ करी हैं। पर अब तक जहाँ मुझे फ़िल्म देखते हुए बार बार सेहमत की बेहतरी की चिंता थी कि इसे कुछ ना हो, वह उस सीन में आकर पलट गयी। यहाँ पर आकर मैंने ख़ुद को इक़बाल के साथ खड़ा पाया। दोनों मुल्कों की लड़ाई में खिंची हुई लकीर इक़बाल और सेहमत के बीच खिंच गयी थी। यह लक़ीर जितनी बाहर थी उतनी ही दोनों के अंदर तक उतरती गई। इक़बाल के लिए ज़्यादा बुरा इसलिए भी लगा क्योंकि शायद वो इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। कम से कम सेहमत को अपना मोहरा होने का पता था। इक़बाल ने तो बस भरोसा किया था सेहमत का अपने रिश्ते पर भरोसा कर के।
“क्या अब तक जो उनके बीच था उसमें कुछ भी सच था?” बार बार कानों में गूँजता हुआ अंदर तक उतरता रहा। ऐसे सवाल तो हमने भी कई बार अपनी ज़िंदगी की कहानियों को लेकर किए हैं ना...? एक दौर जी लेने के बाद पीछे पलट कर देखा है और यह सवाल गूंजा है कि “जो जी लिया वो कितना सच था”। कितना मुश्किल होता है यह मान लेना या इस बात का एहसास होना कि हम एक झूठ को सच मान रहे थे। शायद इसी वजह से हमारे पास अलग अलग वक़्त पर हमारे जी जिए हुए सच के अलग अलग संस्करण होते हैं, जिसे हम यह सोचकर तैयार करते हैं कि जो जिया गया वो जीने लायक था। यह हमारी ख़ुद से एक अरेंज्मेंट है। पर इक़बाल को अपनी कहानी के और संस्करण तैयार करने का मौक़ा भी नहीं मिला।


प्यार सेहमत को भी था, यह हमें एक दर्शक के नज़रिए से पता है पर इक़बाल की ज़िंदगी एक सच, झूठ और जाने क्या के बीच लटकती हुई ख़त्म हो जाती है। उसकी कहानी ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होती।

राज़ी दो मुल्कों की कहानी नहीं है। मेरे लिए यह कहानी एक दो ऐसे लोगों के क़रीबी रिश्ते की कहानी है जिसमें राजनीति दख़ल देती है। एक हिंदुस्तानी होने के नाते यह अच्छा लगता है कि पाकिस्तान की हमारे मुल्क पर हमले का मनसूबा कामयाब नहीं होता पर एक इंसान के नाते मैं चाहता था कि काश, इक़बाल और सेहमत के रिश्ते में वो वक़्त ना आया होता जहाँ इक़बाल को यह पूछना पड़ा कि ““क्या अब तक जो हमारे बीच था उसमें कुछ भी सच था?”