Sunday, 25 April 2021

"You Learn" का हिंदी अनुवाद

मूल कवि: लुईस बोर्गस

अनुवाद: नीरज पाण्डेय 



वक़्त के साथ तुम समझोगे 

किसी का हाथ पकड़ने और 

उसकी रूह को क़ैद कर लेने के 

महीन फ़र्क़ को 


तुम सीखोगे कि प्रेम का अर्थ झुकने में नहीं होता

किसी का साथ होना 

नहीं होती किसी प्रकार की सुरक्षा

तुम समझोगे कि चुंबन नहीं होते अनुबंध

और तोहफ़े नहीं होते वादे 


तुम स्वीकार लोगे अपनी हार 

अपने झुके हुए सर और खुली हुई आँखों से 

किसी स्त्री की कोमलता के साथ,

ना कि किसी शिशु के दुःख की तरह 


तुम सीखोगे वर्तमान की सड़क पर चलना 

क्योंकि भविष्य का अनिश्चित धरातल 

अक्सर बीच में ही कहीं बिखर जाता है 


समय के साथ तुम सीखोगे 

ज़रूरत से ज़्यादा सूरज की रोशनी भी जला जाती है 

फिर तुम अपनी रूह को सजाने के लिए 

अपना बाग बसाओगे

बजाय उस इंतज़ार के कि 

कोई और लेकर आएगा तुम्हारे लिए फूल 


और तुम सीखोगे कि 

तुम सह सकते हो 

तुम हो ताक़तवर

है तुम्हारी भी क़ीमत 

और तुम सीखते जाओगे 

सीखते जाओगे 

हर अलविदा के साथ 

तुम  सीखते जाओगे

Tuesday, 20 April 2021

एक ख़ुश आधा दिन

 कल मैं ख़ुश था। काफ़ी हल्का महसूस कर रहा था शाम में। यह ख़ुशी एक लहर की तरह पसरी हुई थी और बीच में आकर हिट करती। मुझे रुक रुक कर एहसास होता कि मैं ख़ुश था। मैं दिन से ख़ुश नहीं था। दिन में तो सब आदत सा चला जा रहा था। थोड़ा जीता और उस जीने से ढेर सारा बचा हुआ पड़ा रहता। ऐसी हालत कुछ दिनों से थी। अभी कुछ दिनों पहले ही कहीं लिखा था कि "या तो इच्छाएँ कम देते या दिन में अड़तालीस घंटे देते।" मुझे पता है मैं किसी ईश्वर से बात नहीं कर रहा था पर यह ऐसे ही आया तो इसे ऐसे ही लिख दिया। एक दिन का ना जी पाना दूसरे दिन में प्रवेश करता है और उसपर अपना भार बढ़ा देता है। मैं दिन को कई हिस्सों में बाँट कर रखता हूँ कि अब ये और तब वो। पर "ये" और वो "भी" "अब" और "तब" से सरककर कहीं और चले जाते हैं। मैंने पाया है मेरे अंदर एक तरह की क्रूरता है जिसका शिकार मैं ख़ुद हूँ। जल्दी सोने और जल्दी उठने के क्रम में मैंने सब बाँध रखा है। पर या बाँधा हुआ दिन आँखों के सामने सड़ने लगता है जैसे किसी खलिहान में किसी फ़सल का बोझा बाँध कर छोड़ दिया गया है। हर गुज़रता दिन यह बताता है कि मैं क्या नहीं जी पाया। नहीं जिए हुए की छाया में सारा अच्छा जिया हुआ भी निरर्थक लगने लगता है। ऐसे में किसी भी ख़ुशी के क्षणों की प्रतीक्षा होती है। और कल कुछ ऐसा ही हुआ था। 

दिनभर एक ही जगह बैठे बैठे कुछ पढ़ता रहा। लिखने से थोड़ी दूरी बना ली थी कि मेरी एक कहानी अटकी हुई है। उसके पास थोड़ी देर बाद जाऊँगा तो शायद उसे बेहतर समझ पाउँगा। बड़े दिनों से किसी भी तरह की exercise नहीं करी थी। शरीर भी एक तरह के ढेर में बदलता जा रहा था। अब दौड़ने जा नहीं पाता हूँ कि एक तो फिर से lockdown लग गया है, और दूसरी तरफ़ जिस सड़क पर दौड़ता था वो सड़क भी BMC वालों ने खोद दी है। पर कल मैंने शाम में थोड़ी देर योगा किया और मुझे शुरू करते हुए यह बिल्कुल पता नहीं था की उसका असर ये होगा। मेरे शरीर का मलबा उससे साफ़ हो गया था। मैं सच में ख़ुश था। अचानक से सब हल्का हो गया था। मैंने इस ख़ुशी के बारे में अपनी बहन को कई बार बताया। वो मेरी ख़ुशी देखकर ख़ुश थी। 

इसीबीच मुझे एक बात समझ आयी। मैंने अपनी बहन को बुलाया और उससे पूछा कि क्या उसे भी ऐसा ही लगता है। दरअसल, मैं अति वाला आदमी हूँ। जो करना है वो अति में करना है। अगर सुबह छः बजे उठना है और अगर मैं छः बजकर दस मिनट पर भी उठा तो ख़ुद को कोसने लगता हूँ। अलग रात दस बजे के बाद मुझे काम नहीं करना तो मैं किसी दरबान की तरह दस बजे पर खड़ा होकर सबकुछ दस बजे से पहले ही रोक दूँगा।  अब बेचारे बचे हुए ख़याल भी वहीं कहीं कोने में खड़े सुबह होने का इंतज़ार करते रहते हैं। फिर जब कभी नींद देर से आती है तो एक ख़याल ये भी चलता रहता है कि कल सुबह देर से होगी और अगर नहीं हुई तो एक ना सो पाने की थकान पूरे दिन शरीर से चिपकी रहेगी। फिर आता है अगला दिन। सही वक़्त से शुरू हो गया तो ठीक और ना हुआ तो समझो ऐसा लगता है किसी ने जेब काट ली। कटी जेब का मलाल पूरे दिन साथ चलता है।

अब इतने सारे समीकरणों में मैं इन समीकरणों की वजह भूल जाता हूँ। यह नियम इस वजह से बने थे कि मैं अपने अंदर फूटने वाली सम्भावनाओं को बेहतर जी सकूँ, पर होता इसका उल्टा है। मैं प्रवाह में बने रहने की बजाय उसे साधने की कोशिश में लगा हूँ और यह थका देने वाला काम है। कल जब योगा किया और थोड़ा आराम मिला और एक ख़ुशी का फूल रह रहकर खिलता रहा और उसकी ख़ुशबू मुझतक आती रही। मैंने अपनी इस क्रूरता की बात अपनी बहन से की। और उसने मेरी बात में हामी भरी। मैं जीवन को जीने की बजाय उसे सम्भालने और उसकी दिशा तय करने की कोशिश में लगातार लगा हुआ था। अभी भी मैं यही कोशिश करता हूँ। ख़ुद के लिए रह रहकर एक नया किरदार गढ़ता हूँ और उसे के अंदर क़ैद हो जाता हूँ, यह जानते हुए कि किरदार हो जाना मेरा होना नहीं है। 

कल से बड़ी इच्छा थी कि इस अद्भुत पल और इस ऊहापोह को लिख लूँ। यहाँ भी बहुत दिनों से नहीं लिखा क्योंकि यह भी एक काम लगने लगा था जो कभी काम की तरह शुरू नहीं हुआ था। कोशिश रहेगी उन सारे किरदारों को तोड़ने की जो मैंने ख़ुद अपने मन में ख़ुद के लिए बना लिए हैं और मैं जिनमें गाहे बगाहे क़ैद होता जाता हूँ। 

वैसे कल की ख़ुशी आज के दिन में छलक कर हल्की सी गिर पड़ी है। और मैं तबियत नासाज़ होने के बावजूद काफ़ी अच्छा महसूस कर रहा हूँ। 

Thursday, 5 November 2020

जल्दी-जल्दी

किस बात का कितना असर हमपर किस तरह होता है क्या हम कभी थोड़ी देर रुक कर सोच पाते हैं? दुनिया रोज़ चली जा रही है, हम भी उसके साथ चल रहे हैं। इसी रास्ते में कई लोग मिले उन्होंने बताया कि "ये ठीक है" तो वो ठीक लगने लगता है, फिर वही बोलते हैं कि "ये ठीक नहीं है।" और हम उस चीज़ से दूर होते जाते हैं। दुनिया में लगने वाला बाज़ार जो कभी बंद नहीं होता इस बात को जानता है और लगातार अपनी माया गढ़ता रहता है। हमें लगता है हम choose कर रहे हैं। Free Choice, पर वह कितनी free है. क्या हम सच में वही चुन रहे हैं जो हम चाहते हैं

मैंने इसपर कुछ प्रयोग करने शुरू किया हैं, अपने जीवन में ही, इसकी निरार्थकता को जानते हुए। हमारे आस पास कितनी सारी documentaries हैं यह बताने के लिए कि हमें किस तरह से manipulate किया जा रहा है। हम क्या खाएँ, क्या पहने या फिर किससे प्यार करें। उसपर बात करूँगा तो कोई नहीं बात नहीं होगी। जैसे एक डर हुआ या किसी तरह से vulnerable व्यक्ति किसी अंधविश्वास की तरफ़ मुड़ जाता है एक सहारा ढूँढते हुए। वैसे ही हम सारे लोग एक दूसरे से मिलने वाले validation की तरफ़ मुड़ चुके हैं और बाज़ार को यह बात पता है। दरअसल हम इतने डरे हुए लोग हैं कि हम कोई "Whatsapp Group" भी छोड़ने से पहले कई बार सोचते हैं और उसमें हमेशा के लिए फँस कर रह जाते हैं।

इसी बाज़ार ने हमारे viewing experience को भी एक competition में बदल दिया है। जिसे हमारा entertainment होना था वह भी अब एक दौड़ की तरह हो गया है। मैं इसको emotional laboured का नाम दूँगा। हर हफ़्ते और लगातार अलग अलग OTT platforms पर shows और films आती जाती हैं और हमारे friend circle की वजह से भी हमें इसे देखने का pressure बढ़ता जाता है, हमारी बातों का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर बात करने में जाता है कि किसने क्या देखा और क्या नहीं। इंसान थक जाता है। 

इसी बीच अपनी सेहत की वजह से मुझे थोड़ा वक़्त मिला। मुझे लगा कि जिस तरह आजकल हमारे क्रिटिक्स और influencers किस फ़िल्म या शो के बारे में बात करते हैं वो एक तरह का perception हमारे ऊपर ज़रूर बनाने लगा है। लोगों को कोई चीज़ अच्छी भी लगी हो और अगर उनके दोस्तों को नहीं लगी हो तो वो उसके बारे में बात करने से कतराते हैं। इसका साफ़ साफ़ उदाहरण मैंने अपने साथ देखा। मुझे मीरा नायर का काम बहुत पसंद है तो मैंने Netflix पर "A Suitable Boy" देखना शुरू किया। और इस बार सोचा था कि binge watch नहीं करूँगा। एक एपिसोड रोज़। पहला एपिसोड देखा, पसंद आया। मैंने उसकी तारीफ़ अंकिता से बात करते हुए की। अंकिता के हालाँकि शो देखा नहीं था पर उसने कहा कि उसने सुना है शो अच्छा नहीं बना। मैंने कहा कि मुझे तो पसंद आया पहला एपिसोड अब आगे देखेंगे कैसा है। अंकिता से बात होने के बाद मैंने कुछ एक रिव्यूज़ पढ़ने की कोशिश की, पर जल्द ही यह बात समझ गयी कि शो पूरा देखने के पहले किसी और के opinion का चश्मा लगा लूँगा तो शो को वैसे नहीं देख पाउँगा जैसे मुझे देखना चाहिए। मैंने रिव्यू पढ़ना बंद कर दिया। रोज़ एक एपिसोड देख रहा था और अगले दिन नया एपिसोड देखने की उत्सुकता लगातार बनी रही। पाँचवे एपिसोड तक पहुँचा तो सौरभ को भी यह बात बताई और फिर लगा कि शायद आख़िरी एपिसोड उतना अच्छा ना हो और शायद यही वजह रही हो कि critics ने उतनी अच्छी बातें नहीं लिखी शो के बारे में। 

अगले दिन आख़िर एपिसोड शुरू हुआ। थोड़ी देर बाद कई scenes पर मैंने ख़ुद को रोता हुआ पाया। कभी ख़ुश होता, कभी दुःखी , कभी ऐसा लगता कि भर गया और कभी कोई कसक सी उठ जाती। जब एपिसोड ख़त्म हुआ तो मैं शो के बारे में और उससे जुड़े पूर्वाग्रह के बारे में सोचने लगा कि कितना आसान था रिव्यू पढ़कर यह शो नहीं देखना। जबकि मुझे तो यह शो बहुत पसंद आया। उसके dialogues मूलतः English में थे पर मैंने तो हर किरदार के एहसास से जुदा महसूस कर रहा था और बाक़ी चीज़ें बहुत secondary हो गयी थीं। मुझे इस बात से फ़र्क़ नहीं पद रहा था कि कौन क्या और कैसे बोल रहा है मुझे इस बात से फ़र्क़ पड़ रहा था कि उस किरदार का दुःख क्या है और वो क्या पाना चाहता है। और शायद यहीं "A Suitable Boy" मेरे लिए काम कर जाती है। 

अगले दिन शाहरुख़ का B'Day था। मैंने Instagram इंस्टॉल किया और उनको wish किया। साथ ही  "A Suitable Boy"को लेकर भी एक स्टोरी डाली कि "ये शो बहुत पसंद आया, क्रिटिक्स तो कुछ भी बोलते हैं।...Binge watch मत करना फ़ास्ट फ़ूड नहीं है।" शायद मुझे थोड़ा बेहतर जीने के लिए भी entertainment को entertainment की तरह जीने की ज़रूरत है competition की तरह नहीं।